रायपुर। छत्तीसगढ़ में चुनावी कामकाज संभालने वाले कर्मचारियों के भविष्य पर संकट के बादल मंडरा गए हैं। मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय ने प्रदेश के सभी जिला निर्वाचन कार्यालयों में कार्यरत कर्मचारियों की सेवाओं को लेकर बड़ा फैसला लिया है। इसके तहत अब नियमित भर्ती की जगह एजेंसी और प्लेसमेंट के जरिए नियुक्ति की जाएगी।
इस आदेश से सबसे ज्यादा झटका उन 31 अस्थाई कर्मचारियों को लगा है जो पिछले 17-18 सालों से लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकाय चुनावों में दिन-रात काम कर रहे थे। वहीं 59 संविदा कर्मियों की सेवा अवधि 1 साल के लिए बढ़ा दी गई है।
18 साल की सेवा के बाद सेवा समाप्ति का फरमान:
कर्मचारी नेता विजय कुमार झा के अनुसार प्रदेशभर के जिला निर्वाचन कार्यालयों में करीब 90 तृतीय और चतुर्थ वर्ग के कर्मचारी लंबे समय से काम कर रहे थे। इनमें से आधे को संविदा और आधे को अस्थाई कर्मचारी घोषित किया गया था। पिछले 18 वर्षों में इन्होंने हर चुनाव में 24 घंटे काम कर निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारियों को संभाला है।
फरवरी के बाद से इन कर्मचारियों की सेवा वृद्धि का आदेश नहीं आया। पिछले 4 महीने से कई कर्मचारी बिना वेतन के इसी उम्मीद में काम कर रहे थे कि उनकी सेवा नियमित होगी। लेकिन अब CEO कार्यालय ने संविदा कर्मियों की सेवा 1 मार्च से 1 साल के लिए बढ़ा दी है, जबकि अस्थाई कर्मियों की सेवाएं अप्रत्यक्ष रूप से समाप्त कर उन्हें प्लेसमेंट एजेंसी के माध्यम से रखने का निर्णय लिया है।
प्लेसमेंट प्रथा पर उठे सवाल:
कर्मचारी संगठनों ने इस फैसले का कड़ा विरोध किया है। विजय कुमार झा ने कहा कि जिस प्लेसमेंट ठेका प्रथा का विरोध विपक्ष में रहते हुए किया गया था, आज वही व्यवस्था लागू की जा रही है। उनके मुताबिक ठेकेदार के माध्यम से भर्ती होने पर वेतन कम मिलेगा, नौकरी की सुरक्षा नहीं रहेगी और पुराने कर्मचारियों का अनुभव बेकार चला जाएगा।
उन्होंने मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी छत्तीसगढ़ से मांग की है कि इस आदेश को तत्काल वापस लिया जाए और 18 साल से सेवा दे रहे कर्मचारियों को नियमित या संविदा पर यथावत रखा जाए।
अब क्या होगा आगे?
CEO के आदेश के बाद 59 संविदा कर्मचारियों को 1 मार्च से अगले 1 साल तक राहत मिल गई है। लेकिन 31 अस्थाई कर्मचारियों को अब प्लेसमेंट सेवा प्रदाता कंपनी के जरिए ही काम मिलेगा, अगर कंपनी उन्हें रखती है तो इससे उनकी सैलरी, पीएफ और अन्य सुविधाओं पर सीधा असर पड़ेगा।
चुनाव आयोग का तर्क है कि यह कदम शासकीय प्रक्रिया को सरल बनाने और मानव संसाधन प्रबंधन को पारदर्शी बनाने के लिए उठाया गया है। लेकिन कर्मचारियों का कहना है कि इससे स्थायित्व खत्म हो जाएगा और चुनाव जैसे संवेदनशील काम में अनुभव की कमी आएगी।



