Rasgulla History: पारंपरिक रूप से फटे हुए दूध को अशुभ माना जाता था, लेकिन बंगाल ने इस परंपरा को बदलकर देश को रसगुल्ला जैसी लोकप्रिय मिठाई दी। इतिहास के अनुसार, 16वीं शताब्दी में जब पुर्तगालियों ने सेरमपुर में अपना डेरा डाला, तब उनके खानपान में पनीर और चीज को देखकर बंगालियों ने दूध में एसिड या नींबू का रस डालकर छेना बनाना सीखा।
साल 1868 में नबिन चंद्र दास ने सबसे पहले रसगुल्ला तैयार किया, जिसके बाद उन्हें रसगुल्ले का कोलंबस कहा जाने लगा। आज यह मिठाई बंगाल की पहचान बन चुकी है, हालांकि ओडिशा भी इसके इतिहास और उत्पत्ति को लेकर अपने दावे पेश करता रहा है।
16वीं सदी में पुर्तगालियों से बंगालियों ने सीखी छेना बनाने की कला
प्राचीन काल में वैदिक परंपरा के तहत फटे दूध को अच्छा नहीं माना जाता था। लेकिन बंगाल इस मामले में एक बड़ा अपवाद साबित हुआ। कहा जाता है कि 16वीं शताब्दी में जब पुर्तगालियों का संपर्क बंगालियों से बढ़ा, तब उनके भोजन में चीज और पनीर शामिल हुआ करते थे। पुर्तगालियों के खानपान के तौर-तरीकों को देखकर ही बंगाल के लोगों ने दूध फाड़कर छेना बनाने की तकनीक सीखी और यहीं से रसगुल्ले के आविष्कार का रास्ता खुला।
साल 1868 में नबिन चंद्र दास ने बनाया था पहला रसगुल्ला
बंगाल में रसगुल्ले के इतिहास की बात करें तो इसकी विधिवत शुरुआत साल 1868 में हुई थी। मशहूर हलवाई नबिन चंद्र दास ने सबसे पहले रसगुल्ला तैयार किया था। इस बेहतरीन आविष्कार के कारण उन्हें ‘रसगुल्ले का कोलंबस’ कहा जाने लगा। उनके द्वारा शुरू की गई इस परंपरा को आगे चलकर उनकी बेटी केसी दास ने भी संभाला और इसे और आगे बढ़ाया।
ओडिशा के दावे और भगवान जगन्नाथ से जुड़ा इतिहास
पश्चिम बंगाल के अलावा ओडिशा भी रसगुल्ले की उत्पत्ति पर अपना दावा ठोकता आया है। ओडिशा का तर्क है कि जगन्नाथ पुरी में 12वीं शताब्दी से ही भगवान को अर्पित किए जाने वाले भोग में छेना शामिल रहा है। इसके अलावा, इतिहास का यह भी तर्क दिया जाता है कि जब बंगाल के सूबे में बिहार और ओडिशा शामिल थे, तब गरीब ओडिशा के लोग रईस बंगालियों के घरों में रसोइया बनकर काम करते थे और वहीं से इस मिठाई का जन्म हुआ।
बंगाल और ओडिशा, दोनों को मिल चुका है जीआई टैग
रसगुल्ले पर अपने-अपने दावों को लेकर बंगाल और ओडिशा के बीच लंबी बहस रही है, लेकिन कानूनी रूप से दोनों राज्यों को अपनी-अपनी विशेषता के लिए जीआई (Geographical Indication) टैग मिल चुका है। नवंबर 2017 में पश्चिम बंगाल को सबसे पहले ‘बंग्लार रसोगुल्ला’ के नाम से जीआई टैग मिला। इसके बाद जुलाई 2019 में ओडिशा को भी ‘ओडिशा रसगोला’ के नाम से जीआई टैग प्रदान किया गया।
5 FAQs
बंगाल में रसगुल्ले का इतिहास कब से शुरू हुआ माना जाता है?
साल 1868 में नबिन चंद्र दास ने सबसे पहले रसगुल्ला बनाया था, जिसके बाद से इसका आधुनिक इतिहास माना जाता है।
बंगालियों ने छेना बनाने की कला किससे सीखी थी?
कहा जाता है कि 16वीं शताब्दी में सेरमपुर में पुर्तगालियों के संपर्क में आने के बाद बंगालियों ने छेना बनाना सीखा था।
ओडिशा रसगुल्ले पर क्या दावा पेश करता है?
ओडिशा का तर्क है कि 12वीं सदी से जगन्नाथ पुरी के भोग में छेना शामिल है और रसगुल्ले की उत्पत्ति उनके यहां से जुड़ी है।
बंगाल के रसगुल्ले को जीआई टैग कब मिला था?
पश्चिम बंगाल के रसगुल्ले को नवंबर 2017 में ‘बंग्लार रसोगुल्ला’ के नाम से जीआई टैग मिला था।
ओडिशा के रसगुल्ले को जीआई टैग कब दिया गया?
जुलाई 2019 में ओडिशा के रसगुल्ले को ‘ओडिशा रसगोला’ के नाम से जीआई टैग प्रदान किया गया था।


