Tattoo Art

रायपुर। आदिवासी समाज में गोदना गुदवाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। हालांकि इसकी प्रक्रिया काफी तकलीफदेह होती है, मगर इस कार्य में लगे युवा अब इसकी आधुनिक कला Tattoo Art सीखने में लगने हुए हैं, जो आगे चलकर इनकी आय का जरिया बनेगा।

विश्व भर में मशहूर बस्तर में पिछले साल ही बादल (BASTAR ACADEMY OF DANCE, ART & LITERATURE) नामक केंद्र का शुभारंभ प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने किया था। प्राचीन आदिवासी परंपरा, कला एवं संस्कृति को बचाये रखने और नई पीढ़ी से इसे अवगत कराने के लिए खोले गए इस केंद्र में प्राचीन गोदना कला को आधुनिकता से जोड़ने के लिए भी कार्य किया जा रहा है। यहां के जो युवा बस्तर आर्ट में पारंगत हैं, उन्हें राजधानी की एक संस्था द्वारा Tattoo Art सिखाया जा रहा है। इस काम में लगभग पारंगत हो चुके ये युवा इन दिनों राज्योत्सव में आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। राज्योत्सव स्थल के बस्तर कला केंद्र में बस्तर के इन युवाओं से Tattoo बनाते देखने के लिए लोगों की भीड़ जुट रही है। लोग बड़े शौक से इनसे Tattoo बनवा भी रहे हैं।

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राजधानी रायपुर के शंकर नगर में Tattoo Studio चला रहे शैलेन्द्र श्रीवास्तव “शैली” ने बताया कि उनके द्वारा बादल केंद्र में 20 युवाओं के एक बैच को Tattoo का प्रशिक्षण दिया जा चुका है। इन्हीं में से 4 युवाओं को राज्योत्सव में आमंत्रित किया गया है। शैली के मुताबिक गोदना गुदवाने की कला में काफी समय लगता है, इसमें जिस द्रव्य का इस्तेमाल होता है, उसे लगाते समय काफी तकलीफ भी होती है, वहीं एक ही उपकरण से कइयों के शरीर में गोदना लगाया जाता है। इसके मुकाबले में Tattoo की कला काफी सुविधाजनक होती है। इसमें अच्छी फिनिशिंग आती है, इसके निडिल का इस्तेमाल एक ही बार होता है, ताकि दूसरों को Tattoo लगते समय इंफेक्शन का कोई खतरा नहीं रहे, वहीं इससे कोई तकलीफ भी नहीं होती।

बढ़ेगी युवाओं की आय

किसी भी व्यवसाय के बारे में कहा जाता है कि अगर आप समय के साथ नहीं चले तो आप नुकसान में जा सकते हैं। यही सीख इन युवाओं पर भी लागू होती है। चूंकि वर्तमान में Tattoo Art का चलन बढ़ा है, ऐसे में इस कला में इन युवाओं का पारंगत होना इनके लिए वाकई में फायदेमंद होगा। बस्तर की कलाकृति को Tattoo Art में उभारना इन युवकों के लिए फायदेमंद साबित हो रहा है। ऐसे में यह इनकी आय का जरिया भी बन गया है।

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जानिए “बादल” एकेडमी के बारे में

जनजातीय संस्कृति के केन्द्र के रुप में प्रसिद्ध बस्तर के लोक नृत्य, स्थानीय बोलियां, साहित्य एवं शिल्पकला के संरक्षण और संवर्द्धन के लिए शुरू किया गया है बादल (BASTAR ACADEMY OF DANCE, ART & LITERATURE), बस्तर में इस केन्द्र की स्थापना 5 करोड़ 71 लाख रुपए की लागत से की गई है, जो करीब 5 एकड़ भूभाग में फैला हुआ है।

बादल एकेडमी के जरिए बस्तर की विभिन्न जनजातीय संस्कृतियों को एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी तक हस्तान्तरण करना, बाकी देश-दुनिया को इनका परिचय कराना, शासकीय कार्यों का सुचारु सम्पादन के लिए यहां के मैदानी कर्मचारी-अधिकारियों को स्थानीय बोली-भाषा का प्रशिक्षण देने की भी योजना है। बस्तर की गौरवशाली संस्कृति की गूंज हिंदुस्तान ही नहीं देश दुनिया में सुनाई देती है, बादल एकेडमी के जरिये बस्तर की संस्कृति को नई पहचान मिलेगी। 

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