टीआरपी डेस्क। बुराई पर अच्छाई की जीत का महापर्व दशहरा (Dussehra 2025) इस वर्ष 2 अक्टूबर को मनाया जाएगा। यह त्योहार एकता, भाईचारे और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक बनकर देश के विभिन्न हिस्सों में मनाया जाता है। हर राज्य की अपनी खास परंपरा इस पर्व को और खास बनाता है। आइए जानते हैं, भारत के अलग-अलग हिस्सों में दशहरा कैसे मनाए जाते हैं।

छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में दशहरा का उत्सव भारत का सबसे लंबा दशहरा महोत्सव होता है, जो 75 दिनों तक चलता है। यह उत्सव देवी दंतेश्वरी की पूजा से शुरू होता है और इसमें आदिवासी परंपराओं, जैसे पाटा यात्रा, निशा यात्रा और मुरिया दरबार के आयोजन होते हैं।

दिल्ली में दशहरे की शुरुआत रामलीला के मंचन से होती है, जहां भगवान राम की जीवन गाथा का नाट्य रूपांतरण होता है। इस दौरान रावण, मेघनाथ और कुंभकर्ण के विशाल पुतले जलाए जाते हैं, जो बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक होते हैं। दिल्ली के प्रमुख स्थलों जैसे लाल किला, रामलीला मैदान और द्वारका में रावण दहन का आयोजन होता है, जो भारी भीड़ को आकर्षित करता है।

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कोलकाता में दशहरा का त्यौहार दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है। यहाँ हर गली और मोहल्ले में भव्य पंडाल सजाए जाते हैं और देवी दुर्गा की पूजा होती है। विजयादशमी के दिन, सिंदूर खेला की परंपरा होती है, जिसमें विवाहित महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। इसके बाद देवी दुर्गा की मूर्तियों का हुगली नदी में विसर्जन किया जाता है।

कुल्लू, हिमाचल प्रदेश में दशहरा महोत्सव एक ऐतिहासिक महत्व रखता है। इस महोत्सव की शुरुआत रघुनाथ जी की पूजा से होती है और आसपास के क्षेत्रों से देवी-देवताओं की पालकियाँ लाई जाती हैं। स्थानीय कलाकार इस दौरान नृत्य और संगीत प्रस्तुत करते हैं। इस वर्ष, महोत्सव को प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित लोगों को समर्पित किया गया है, और इसमें विदेशी दलों की भागीदारी नहीं हुई है।

मैसूर, कर्नाटक का दशहरा महोत्सव राज्य की सांस्कृतिक धरोहर को प्रदर्शित करने वाला एक प्रमुख आयोजन है। यहाँ के महल को जगमगाती रोशनी से सजाया जाता है और जंबो सवारी का आयोजन होता है, जिसमें हाथियों की सवारी और पारंपरिक नृत्य शामिल होते हैं। यह महोत्सव दस दिनों तक चलता है और राज्य की संस्कृति को दर्शाता है।

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उत्तर प्रदेश के वाराणसी, लखनऊ और कानपुर जैसे शहरों में दशहरा की शुरुआत रामलीला के मंचन से होती है। कलाकार रामायण के पात्रों का अभिनय करते हैं और अंत में रावण, मेघनाथ और कुंभकर्ण के पुतले जलाए जाते हैं, जो दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र होते हैं।