टीआरपी डेस्क। ग्रेटर नोएडा की प्रसिद्ध गलगोटिया यूनिवर्सिटी (Galgotias University) इस समय एक अनोखे विवाद को लेकर सुर्खियों में है। दिल्ली में आयोजित एक एआई समिट (AI Summit) में प्रदर्शित किए गए एक ‘रोबो डॉग’ को लेकर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। जहाँ एक तरफ इस तकनीक की चर्चा है, वहीं दूसरी ओर यूनिवर्सिटी के संस्थापक सुनील गलगोटिया के संघर्ष और सफलता की कहानी भी लोगों को प्रेरित कर रही है।
क्या है एआई डॉग (Robo Dog) विवाद?
हाल ही में दिल्ली में आयोजित एआई समिट में गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने एक रोबो डॉग प्रदर्शित किया। दावा किया गया कि इसे यूनिवर्सिटी के छात्रों ने तैयार किया है। हालांकि, सोशल मीडिया पर यह आरोप लगा कि यह प्रोडक्ट चीन में बना (Made in China) है। विवाद इतना बढ़ा कि दावा किया गया कि समिट से यूनिवर्सिटी का स्टॉल हटा दिया गया है। फिलहाल, इस मामले पर यूनिवर्सिटी प्रबंधन की ओर से किसी आधिकारिक स्पष्टीकरण का इंतजार है।
किताबों की दुकान से शुरू हुआ ‘शिक्षा साम्राज्य’
यूनिवर्सिटी के चांसलर सुनील गलगोटिया का पारिवारिक बैकग्राउंड शिक्षा और किताबों से जुड़ा रहा है। 1930 में उनके परिवार की दिल्ली के कनॉट प्लेस में ‘ईडी गलगोटिया एंड संस’ नाम से एक छोटी सी किताबों की दुकान थी। सुनील गलगोटिया ने सेंट कोलंबा स्कूल और फिर मशहूर श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (SRCC) से पढ़ाई की।
9,000 रुपए का उधार और पहली जीत
सुनील गलगोटिया का कारोबारी सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। 1980 के दशक में उन्होंने गलगोटिया पब्लिकेशंस की नींव रखी। उन्होंने 9,000 रुपये उधार लेकर अपनी पहली किताब ‘पावर सिस्टम कंट्रोल एंड स्टैबिलिटी’ छपवाई।उन्हें बैरन्स (Barron’s) की SAT, TOEFL और GRE जैसी अंतरराष्ट्रीय किताबों के भारत में डिस्ट्रीब्यूशन राइट्स मिले, जिसने उनके कारोबार की दिशा बदल दी।
साल 2000 में उन्होंने मात्र 40 छात्रों के साथ अपने पहले संस्थान की नींव रखी।
आज 40,000 से ज्यादा छात्र और 3000 करोड़ का टर्नओवर
साल 2011 में गलगोटिया यूनिवर्सिटी की स्थापना हुई। आज उनके बेटे ध्रुव गलगोटिया (CEO) के साथ मिलकर वे इस ग्रुप को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह ग्रुप आज करीब 3,000 करोड़ रुपये का एजुकेशन साम्राज्य बन चुका है। यहां 40 से अधिक देशों के 40,000 छात्र पढ़ते हैं और 1 लाख से ज्यादा एलुमनाई दुनिया के 96 देशों में काम कर रहे हैं।



