टीआरपी। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2026 के अवसर पर छत्तीसगढ़ की उन महान विभूतियों को याद करना जरूरी है, जिन्होंने अपनी प्रतिभा, अदम्य साहस और समाज सेवा के दम पर देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ हासिल किया है। इन महिलाओं ने न केवल छत्तीसगढ़ की लोक कला को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाई, बल्कि समाज की कुरीतियों के खिलाफ लड़कर लाखों महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बनीं।
छत्तीसगढ़ की इन महिलाओं की सफलता यह साबित करती है कि संसाधनों के अभाव के बावजूद, यदि संकल्प दृढ़ हो, तो गांव की गलियों से निकलकर राष्ट्रपति भवन तक का सफर तय किया जा सकता है। इनका जीवन राज्य की नई पीढ़ी की युवतियों के लिए स्वावलंबन और गौरव का प्रतीक है।
तीजन बाई: पंडवानी की ‘धाकड़’ आवाज जिसने छत्तीसगढ़ की लोक गाथा को सात समंदर पार पहुंचाया
छत्तीसगढ़ की माटी की बेटी और पंडवानी की विश्व प्रसिद्ध कलाकार तीजन बाई आज किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। उन्होंने अपनी बुलंद आवाज और अद्वितीय अभिनय शैली से महाभारत की कथाओं को घर-घर पहुंचाया। एक समय में समाज के विरोध का सामना करने वाली इस महिला ने अपनी कला के दम पर देश के तीनों सर्वोच्च नागरिक सम्मान—पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण—हासिल कर इतिहास रच दिया है।
दुर्ग जिले के गनियारी गांव से निकली तीजन बाई की सफलता छत्तीसगढ़ की हर उस महिला के लिए मिसाल है जो विपरीत परिस्थितियों में अपने सपनों को जीना चाहती हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ी बोली और संस्कृति को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सम्मान दिलाया, जिससे आज की युवा पीढ़ी अपनी जड़ों पर गर्व करना सीख रही है।

रूढ़ियों को तोड़कर चुनी ‘कापालिक’ शैली
तीजन बाई का जन्म दुर्ग जिले के एक साधारण परिवार में हुआ था। बचपन में ही उन्होंने अपने नाना से महाभारत की कहानियां सुनीं और उन्हें गाने लगीं। उस दौर में महिलाओं का पंडवानी गाना, खासकर ‘कापालिक’ शैली (खड़े होकर गाना) में, वर्जित माना जाता था। समाज ने उनका बहिष्कार किया, उन्हें घर से निकाल दिया गया, लेकिन तीजन बाई ने हार नहीं मानी। उन्होंने एक छोटी सी झोपड़ी बनाकर रहना शुरू किया, मजदूरी की, लेकिन अपना तंबूरा (एकतारा) कभी नहीं छोड़ा।
विश्व मंच पर छत्तीसगढ़ की पहचान
उनकी प्रतिभा को सबसे पहले हबीब तनवीर जैसे दिग्गजों ने पहचाना। इसके बाद तीजन बाई ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने फ्रांस, स्विट्जरलैंड, ब्रिटेन, और रूस जैसे दर्जनों देशों में अपनी कला का प्रदर्शन किया। जब वे मंच पर अपना तंबूरा उठाकर भीम या अर्जुन का अवतार लेती हैं, तो भाषा की दीवारें टूट जाती हैं और विदेशी दर्शक भी मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।
फूलबासन बाई: दो मुट्ठी अनाज से शुरू किया सफर, आज 2 लाख महिलाओं की ताकत बनी
छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के एक छोटे से गांव से निकलकर राष्ट्रपति भवन तक का सफर तय करने वाली फूलबासन बाई यादव आज महिला सशक्तिकरण की वैश्विक मिसाल हैं। गरीबी के कारण कभी कचरा चुनने और दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करने वाली फूलबासन ने अपनी मेहनत से ‘मां बम्लेश्वरी जनहित कार्य समिति’ खड़ी की, जिससे आज प्रदेश की लाखों महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो चुकी हैं।
फूलबासन बाई की सफलता केवल एक व्यक्ति की जीत नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में ‘स्वयं सहायता समूहों’ (SHGs) की शक्ति का प्रमाण है। उन्होंने साबित किया कि संगठित होकर ग्रामीण महिलाएं न केवल अपना घर चला सकती हैं, बल्कि समाज से शराबखोरी और बाल विवाह जैसी कुरीतियों को भी जड़ से मिटा सकती हैं।

मुट्ठी दान से शुरू हुई क्रांति
फूलबासन बाई की शादी महज 10 साल की उम्र में हो गई थी। भयंकर गरीबी के बीच उन्होंने तय किया कि वे अपनी और दूसरी महिलाओं की स्थिति बदलेंगी। उन्होंने शुरुआत ‘मुट्ठी दान’ से की, जिसमें हर घर की महिला रोज एक मुट्ठी अनाज बचाकर जमा करती थी। इस छोटी सी बचत ने धीरे-धीरे एक बड़े संगठन का रूप ले लिया।
आज उनकी संस्था से 2 लाख से अधिक महिलाएं जुड़ी हुई हैं। ये महिलाएं न केवल बचत करती हैं, बल्कि बकरी पालन, जैविक खेती और छोटे कुटीर उद्योग चलाकर अपने पैरों पर खड़ी हैं।
समाज सुधार की मशाल
फूलबासन बाई का काम सिर्फ आर्थिक मदद तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने और उनके समूह की महिलाओं ने मिलकर गांवों में:
• शराबबंदी: अवैध शराब के खिलाफ मोर्चा खोला और कई गांवों को नशामुक्त बनाया।
• शिक्षा: गरीब बच्चों की पढ़ाई के लिए आर्थिक सहायता और जागरूकता अभियान चलाए।
• स्वच्छता गांवों में साफ-सफाई और जल संरक्षण के लिए श्रमदान किया।
शमशाद बेगम: बालोद की वह ‘कमांडो’ जिसने लाठी के दम पर बदला समाज, नशा माफियाओं के लिए बनीं काल
छत्तीसगढ़ के बालोद जिले की शमशाद बेगम आज किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। उन्होंने खाकी वर्दी तो नहीं पहनी, लेकिन अनुशासन और साहस ऐसा कि बड़े-बड़े अपराधी भी उनके नाम से थर्राते हैं। ‘महिला कमांडो’ अभियान की प्रणेता शमशाद बेगम ने ग्रामीण अंचलों में शराबबंदी, सुरक्षा और शिक्षा के क्षेत्र में जो क्रांति लाई है, उसके लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया है।
छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में ‘घरेलू हिंसा’ और ‘अवैध शराब’ एक बड़ी समस्या रही है। शमशाद बेगम का मॉडल यह सिखाता है कि पुलिस के भरोसे बैठने के बजाय, यदि महिलाएं स्वयं संगठित हो जाएं, तो वे अपने गांव और परिवार को सुरक्षित रख सकती हैं। आज उनकी 80 हजार से अधिक महिला कमांडो पूरे प्रदेश में सक्रिय हैं।

गुलाबी साड़ी और हाथ में डंडा: अनुशासन की नई परिभाषा
शमशाद बेगम का सफर गुंडरदेही ब्लॉक के छोटे से गांव से शुरू हुआ। उन्होंने देखा कि शराब के कारण बिखरते परिवारों में सबसे ज्यादा प्रताड़ना महिलाओं को झेलनी पड़ती है। उन्होंने मुट्ठी भर महिलाओं को इकट्ठा किया, उन्हें गुलाबी साड़ी की ‘यूनिफॉर्म’ दी और हाथ में लाठी थमाकर रात में पहरा देना शुरू किया।
इन महिलाओं को ‘महिला कमांडो’ का नाम दिया गया। इनका काम केवल डराना नहीं, बल्कि समझाइश देना और अवैध गतिविधियों की सूचना पुलिस तक पहुंचाना था। आज यह अभियान एक विशाल संगठन बन चुका है।
शमशाद बेगम का योगदान केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं रहा:
• नशामुक्ति: हजारों परिवारों को शराब और जुए की लत से बाहर निकाला।
• शिक्षा: ‘साक्षरता अभियान’ के तहत हजारों ग्रामीण महिलाओं को अपना नाम लिखना और हिसाब-किताब करना सिखाया।
• सामाजिक बुराइयां, बाल विवाह और दहेज प्रथा के खिलाफ गांव-गांव में जन-जागरूकता फैलाई
ऊषा बारले: पंडवानी की सादगी भरी आवाज जिसने राष्ट्रपति भवन तक बिखेरी छत्तीसगढ़ी संस्कृति की महक
छत्तीसगढ़ की लोक कला पंडवानी को नई पहचान दिलाने वाली ऊषा बारले आज महिला सशक्तिकरण और सांस्कृतिक संरक्षण की मिसाल बन चुकी हैं। दुर्ग जिले के भिलाई से ताल्लुक रखने वाली ऊषा बारले ने अपनी कला के प्रति अटूट समर्पण दिखाते हुए वर्ष 2023 में देश का प्रतिष्ठित पद्मश्री सम्मान प्राप्त किया। उन्होंने यह साबित कर दिया कि यदि कला में ईमानदारी हो, तो वह किसी भी बाधा को पार कर वैश्विक मंच तक पहुंच सकती है।
पंडवानी छत्तीसगढ़ की पहचान है। तीजन बाई के बाद ऊषा बारले ने इस परंपरा को न केवल जीवित रखा, बल्कि इसमें अपनी विशिष्ट छाप छोड़ी। उनकी सफलता से प्रदेश के युवा कलाकारों को यह प्रेरणा मिलती है कि अपनी बोली-भाषा और लोकगीतों को सहेजकर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान पाया जा सकता है।

तीजन बाई से सीखी कला, बाबा साहेब के विचारों का प्रसार
ऊषा बारले ने महज 7 साल की उम्र से पंडवानी सीखना शुरू किया था। उन्होंने पंडवानी की विश्व प्रसिद्ध कलाकार तीजन बाई से इस कला की बारीकियां सीखीं। उनकी खासियत यह है कि वे पंडवानी के माध्यम से केवल महाभारत की गाथा ही नहीं सुनातीं, बल्कि बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के जीवन संघर्ष और उनके विचारों को भी बड़ी खूबसूरती से पिरोती हैं।
उन्होंने न्यूयॉर्क, लंदन और कई अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व किया है। वे दलित समुदाय और वंचित वर्ग की महिलाओं के लिए एक सशक्त आवाज बनकर उभरी हैं।
समाज सेवा और सांस्कृतिक चेतना
• सांस्कृतिक संरक्षण: नई पीढ़ी को निशुल्क पंडवानी और लोक संगीत का प्रशिक्षण देना।
• महिला सशक्तिकरण: ग्रामीण महिलाओं को जागरूक करने और उन्हें अपनी प्रतिभा पहचानने के लिए प्रोत्साहित करना।
• दलित उत्थान- समाज के अंतिम पंक्ति के लोगों की समस्याओं को अपनी कला के माध्यम से शासन-प्रशासन तक पहुंचाना।
बुधरी ताती: बस्तर के बीहड़ों में सेवा की ‘मशाल’
छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित और दुर्गम क्षेत्रों में जब सुविधाओं का अभाव था, तब एक महिला ने निस्वार्थ सेवा का संकल्प लिया। नाम है बुधरी ताती। बस्तर संभाग के आदिवासी अंचलों में स्वास्थ्य, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाली बुधरी ताती को उनके इन्ही मानवीय कार्यों के लिए भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया है।
बस्तर और दंतेवाड़ा जैसे क्षेत्रों में काम करना चुनौतियों से भरा होता है। बुधरी ताती ने साबित किया कि स्थानीय बोली और संस्कृति को समझते हुए यदि सेवा की जाए, तो सबसे कठिन रास्तों को भी सुगम बनाया जा सकता है। उनकी सफलता बस्तर की हर बेटी के लिए यह संदेश है कि सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है।

स्वास्थ्य और कुपोषण के खिलाफ लंबी लड़ाई
बुधरी ताती ने उस दौर में काम शुरू किया जब अंदरूनी गांवों में अंधविश्वास और बीमारियों का बोलबाला था। उन्होंने माताओं और बच्चों के स्वास्थ्य को अपनी प्राथमिकता बनाया। कुपोषण को जड़ से मिटाने के लिए उन्होंने घर-घर जाकर महिलाओं को जागरूक किया और स्थानीय खान-पान (जैसे रागी और वनोपज) के महत्व को समझाया।
उनके प्रयासों से न केवल शिशु मृत्यु दर में कमी आई, बल्कि आदिवासी महिलाओं में अपने अधिकारों और स्वास्थ्य के प्रति नई चेतना जागृत हुई।
आदिवासी संस्कृति और शिक्षा का संगम
समाज सेवा के साथ-साथ बुधरी ताती ने हमेशा जनजातीय परंपराओं के संरक्षण पर जोर दिया:
• शिक्षा का प्रसार: आदिवासी बच्चों को स्कूल से जोड़ने के लिए माता-पिता की काउंसलिंग।
• महिला समूह: स्थानीय महिलाओं को छोटे व्यवसायों और वनोपज संग्रहण के जरिए आर्थिक रूप से मजबूत बनाना।
•अंधविश्वास निवारण- स्वास्थ्य समस्याओं के लिए झाड़-फूंक के बजाय डॉक्टरी इलाज के प्रति लोगों का भरोसा जीतना।
सुनीता गोड़बोले: बस्तर के जंगलों में कुपोषण के खिलाफ ‘मौन क्रांति’ की प्रणेता
छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में स्वास्थ्य और कुपोषण की चुनौती किसी युद्ध से कम नहीं रही है। इस कठिन मोर्चे पर पिछले कई दशकों से डटी हुई हैं सुनीता गोड़बोले। आदिवासी अंचलों में बच्चों और गर्भवती महिलाओं के बेहतर स्वास्थ्य के लिए अपना जीवन खपा देने वाली सुनीता गोड़बोले को भारत सरकार ने उनकी निस्वार्थ सेवा के लिए पद्मश्री से अलंकृत किया है।
बस्तर जैसे क्षेत्रों में जहाँ भौगोलिक दूरियाँ और भाषा की बाधाएं स्वास्थ्य सेवाओं में बड़ी रुकावट हैं, वहाँ सुनीता गोड़बोले ने स्थानीय बोलियों में संवाद कर लोगों का भरोसा जीता। उन्होंने साबित किया कि कुपोषण जैसी समस्या का समाधान केवल दवाओं में नहीं, बल्कि सही पोषण और जागरूकता में है।

कुपोषण और अंधविश्वास पर प्रहार
सुनीता गोड़बोले ने उस दौर में काम शुरू किया जब बस्तर के सुदूर गांवों में बच्चों की मौत को ‘दैवीय प्रकोप’ माना जाता था। उन्होंने घर-घर जाकर ग्रामीणों को समझाया कि सही खान-पान और स्वच्छता से बच्चों की जान बचाई जा सकती है। उन्होंने स्थानीय वनोपज और मोटे अनाजों (जैसे कोदो-कुटकी और रागी) को आहार में शामिल करने की मुहिम छेड़ी।
उनके प्रयासों से न केवल बस्तर के कई गांवों में कुपोषण की दर में भारी गिरावट आई, बल्कि संस्थागत प्रसव (अस्पताल में डिलीवरी) के प्रति भी आदिवासी महिलाओं का रुझान बढ़ा।
सुनीता गोड़बोले का कार्य केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहा:
• गर्भवती महिलाओं की देखभाल: प्रसव पूर्व जांच और टीकाकरण के लिए ग्रामीण महिलाओं को प्रेरित करना।
• अंधविश्वास का खात्मा: झाड़-फूंक के बजाय आधुनिक चिकित्सा पद्धति पर ग्रामीणों का विश्वास जगाना।
• महिला सशक्तिकरण: आदिवासी महिलाओं को उनके कानूनी अधिकारों और स्वच्छता के प्रति जागरूक करना।



