नई दिल्ली/गाजियाबाद।
देश की सबसे बड़ी अदालत ने बुधवार को एक ऐसा ऐतिहासिक और भावुक फैसला सुनाया है, जो ‘सम्मान के साथ मौत’ के अधिकार को नई परिभाषा देता है। सुप्रीम कोर्ट ने 31 साल के हरीश राणा को ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति दे दी है। हरीश पिछले 12 सालों से कोमा में थे और केवल मशीनों के सहारे उनकी सांसें चल रही थीं।

पिता की 12 साल लंबी लड़ाई और ‘मौत की गुहार’


बता दें कि गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा साल 2013 में अपने घर की चौथी मंजिल से गिर गए थे। इस हादसे में उनके सिर पर गंभीर चोटें आईं और तब से वे बिस्तर पर थे। 12 सालों तक अपने बेटे को बेजान हालत में देखने के बाद, थक हारकर पिता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने अपने बेटे के लिए ‘मौत की गुहार’ लगाई थी ताकि वह इस असहनीय पीड़ा से मुक्त हो सके। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने इस दर्दनाक स्थिति को समझते हुए फैसला सुनाया।

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“जीना या न जीना”: शेक्सपियर और थोरो के शब्दों का जिक्र


दरअसल, फैसला सुनाते समय जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच काफी दार्शनिक नजर आई। उन्होंने मशहूर विचारक हेनरी डेविड थोरो को याद करते हुए कहा, “ईश्वर किसी मनुष्य से यह नहीं पूछता कि वह जीवन को स्वीकार करता है या नहीं, जीवन उसे लेना ही पड़ता है।” कोर्ट ने विलियम शेक्सपियर के प्रसिद्ध संवाद— ‘To be, or not to be’ (जीना या न जीना)— का भी जिक्र किया। कोर्ट ने कहा कि जब अदालतों के सामने यह सवाल आता है कि क्या किसी को मरने का विकल्प चुनने का अधिकार है, तो यह विधिक से ज्यादा एक मानवीय विमर्श बन जाता है।

मेडिकल बोर्ड ने कहा- ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं


हैरानी की बात यह है कि फैसले से पहले सुप्रीम कोर्ट ने दो अलग-अलग मेडिकल बोर्ड गठित किए थे। दोनों बोर्डों ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कर दिया था कि हरीश के ठीक होने की कोई संभावना नहीं है और वह पूरी तरह ‘वेजिटेटिव स्टेट’ में हैं। इसी आधार पर कोर्ट ने 2018 के कॉमन कॉज फैसले को लागू किया, जिसमें ‘गरिमापूर्ण मृत्यु’ के अधिकार को मान्यता दी गई थी। यह भारत में न्यायिक रूप से लागू होने वाला इच्छामृत्यु का पहला बड़ा मामला है।

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AIIMS को निर्देश: सम्मान के साथ हटाया जाए लाइफ सपोर्ट


सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली एम्स (AIIMS) को निर्देश दिया है कि हरीश को पैलिएटिव केयर में भर्ती किया जाए। कोर्ट ने साफ कहा कि मेडिकल ट्रीटमेंट और लाइफ सपोर्ट को एक खास और गरिमापूर्ण योजना के तहत वापस लिया जाए ताकि हरीश की मृत्यु सम्मान के साथ हो सके।