बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रायपुर की फास्ट ट्रैक पॉक्सो कोर्ट द्वारा सुनाई गई 20 साल की सजा को निरस्त कर आरोपी को बरी कर दिया है। खंडपीठ ने कहा कि गर्भस्थ भ्रूण की DNA रिपोर्ट में आरोपी के पिता न होने की पुष्टि हुई, जिससे अभियोजन की पूरी कहानी संदेह के घेरे में आ गई।

क्या था पूरा मामला..?

24 मई 2022 को रायपुर डीडी नगर क्षेत्र की 17 वर्ष 3 माह की छात्रा घर से लापता हो गई थी। पिता की शिकायत पर अपहरण का केस दर्ज हुआ। 

31 मई 2022 को युवती को MP के छिंदवाड़ा से बरामद किया गया। जांच में पता चला कि राजस्थान के फलौदी निवासी 30 वर्षीय लक्ष्मीनारायण उर्फ लक्ष्मण उसे रायपुर से नागपुर, जोधपुर होते हुए छिंदवाड़ा ले गया था। मेडिकल में युवती गर्भवती पाई गई और AIIMS रायपुर में गर्भपात कराया गया।

इन आधारों पर रायपुर की विशेष पॉक्सो अदालत ने 27 सितंबर 2024 को आरोपी को 20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।

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DNA रिपोर्ट बनी टर्निंग पॉइंट

हाईकोर्ट में अपील के दौरान बचाव पक्ष के वकील बी.पी. सिंह ने दलील दी कि युवती अपनी मर्जी से आरोपी के साथ गई थी। सफर में उसने कहीं विरोध या मदद नहीं मांगी।

सबसे अहम सबूत गर्भपात के बाद हुई DNA जांच थी। राज्य FSL की रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ कि आरोपी गर्भस्थ भ्रूण का जैविक पिता नहीं है। कोर्ट ने माना कि इससे अभियोजन के दावे पर गंभीर संदेह होता है और इसका लाभ आरोपी को मिलेगा।

अपहरण का आरोप भी नहीं हुआ साबित

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि 17 वर्ष से अधिक की किशोरी सही-गलत समझने में सक्षम होती है। रिकॉर्ड से साफ है कि वह लंबी दूरी तक स्वेच्छा से आरोपी के साथ रही। अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि आरोपी ने उसे बहला-फुसलाकर अभिभावकों की अभिरक्षा से बाहर निकाला। इसलिए IPC की धारा 363 और 366 के तहत अपहरण के आरोप भी सिद्ध नहीं हुए।

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अंत में हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन आरोपों को “संदेह से परे” साबित करने में विफल रहा और फास्ट ट्रैक कोर्ट का दोषसिद्धि आदेश निरस्त कर आरोपी को बरी कर दिया।