बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा काट रहे एक बंदी की दया याचिका वर्षों से लंबित रहने और मामले का मूल रिकॉर्ड गायब होने पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने इस गंभीर प्रशासनिक लापरवाही को न्याय व्यवस्था के लिए चिंताजनक बताते हुए रायपुर के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश को तलब किया है। साथ ही एक सप्ताह के भीतर रिकॉर्ड खोजकर पेश करने या फिर इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ की गई कार्रवाई की विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है।

क्या है पूरा मामला..?

High Court News : मामला नवाब खान उर्फ डैनी उर्फ बाबा खान का है। वर्ष 2011 में उसे हत्या के मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत आजीवन कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई गई थी। उसकी सजा के खिलाफ दायर अपील पहले हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट भी खारिज कर चुके हैं।

इसके बाद बंदी ने सजा में छूट के लिए आवेदन किया, लेकिन मूल न्यायालयीन रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने के कारण उसकी याचिका पर आगे की प्रक्रिया ही शुरू नहीं हो सकी।

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सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट को बताया गया कि जेल अधीक्षक ने जब रायपुर जिला एवं सत्र न्यायालय से संबंधित रिकॉर्ड मांगा, तब वहां के सक्षम अधिकारी ने लिखित रूप से जवाब दिया कि मामले का मूल रिकॉर्ड खोजने के बावजूद नहीं मिल रहा है। यह जानकारी सामने आने के बाद मामला हाईकोर्ट के संज्ञान में लाया गया।

हाईकोर्ट के सख्त निर्देश

High Court News : हाईकोर्ट ने रायपुर के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश को निर्देश दिया है कि वर्ष 2011 में हुए फैसले के इस प्रकरण का रिकॉर्ड आखिर कैसे गायब हुआ, इसकी जानकारी दें। अदालत ने एक सप्ताह के भीतर रिकॉर्ड खोजने का प्रयास पूरा करने और अगली सुनवाई 29 जुलाई तक रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा है। यदि रिकॉर्ड नहीं मिलता है तो इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई, इसका पूरा विवरण भी अदालत में पेश करना होगा।

अदालत ने साफ कहा कि न्यायिक अभिलेखों के संरक्षण में लापरवाही को गंभीरता से लिया जाएगा, खासकर तब जब किसी बंदी के वैधानिक अधिकार उस पर निर्भर हों।

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एक तरफ कैदी 16 साल से सजा काट चुका है, दूसरी तरफ प्रशासनिक लापरवाही से उसकी रिहाई की उम्मीद अटकी है। अब सबकी निगाहें हाईकोर्ट की अगली सुनवाई और रिकॉर्ड की तलाश पर टिकी हैं।

आजीवन कारावास की सजा कितने साल की होती है ?

High Court News : जब कोई अदालत किसी अपराध के लिए किसी को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाती है तो विधि के समक्ष इस सज़ा की अवधि का अर्थ सज़ा पाने वाले व्यक्ति की अंतिम सांस तक होता है। अर्थात वह व्यक्ति अपने शेष जीवन के लिए जेल में रहेगा। यही आजीवन कारावास का अर्थ है जिसकी व्याख्या सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसलों में की है।

सजा कम करने का क्या प्रावधान होता है ?

High Court News : कई बार यह देखने में आया है कि आजीवन कारावास पाए गए व्यक्ति को 14 साल या 20 साल की सजा काटने के बाद रिहा कर दिया जाता है। हालांकि उसे आजीवन कारावास के रूप में अपना पूरा जीवन कारावास में बिताने की सजा मिली थी, लेकिन समुचित सरकार निश्चित मापदंडों पर किसी व्यक्ति की सजा कम करने की शक्ति रखती है। यहां समुचित सरकार से तात्पर्य ऐसी सरकार से है जिसके अंतर्गत मामला आता है। जैसे केंद्र सरकार या राज्य सरकार।

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