Independence Day special story on historic banyan tree and freedom struggle in Raipur
Independence Day Special: रायपुर की पुरानी बस्ती का ऐतिहासिक बरगद, जो आजादी की लड़ाई की बैठकों का गवाह रहा है।

Independence Day 2026: देश 15 अगस्त को आजादी का जश्न मनाएगा, लेकिन आजादी की इस कहानी के कुछ निशान आज भी हमारे आसपास मौजूद हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की पुरानी बस्ती में ऐसा ही एक ऐतिहासिक बरगद का पेड़ आज भी खड़ा है।

जैतूसाव मठ के पास मौजूद इस पेड़ की छांव में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बैठकर अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन की रणनीति बनाया करते थे। इतिहासकार डॉ. रमेंद्रनाथ मिश्र के मुताबिक, यह इलाका स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े कई प्रमुख लोगों की गतिविधियों का केंद्र रहा है।

याद आती है रायपुर की आजादी की कहानी

रायपुर की पुरानी बस्ती का जैतूसाव मठ स्वतंत्रता संग्राम के दौर की कई यादों को अपने भीतर समेटे हुए है। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, महंत लक्ष्मीनारायण दास, पंडित सुंदरलाल शर्मा, खूबचंद बघेल और ठाकुर प्यारेलाल जैसे नाम इस दौर से जुड़े रहे हैं।

बरगद की छांव में बनती थी आजादी की रणनीति

जैतूसाव मठ के पास मौजूद बरगद का पेड़ उस दौर की बैठकों का गवाह रहा है। इतिहासकार डॉ. रमेंद्रनाथ मिश्र के अनुसार, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी यहां बैठकर देश को आजाद कराने की रणनीति पर चर्चा करते थे। इसी बरगद के नीचे पंडित हलधर शास्त्री ने महंत लक्ष्मीनारायण दास को स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए शपथ दिलाई थी। यही वजह है कि यह पेड़ रायपुर की स्वतंत्रता संग्राम की विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

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जैतूसाव मठ बना था स्वतंत्रता सेनानियों का गढ़

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जैतूसाव मठ केवल धार्मिक गतिविधियों का केंद्र नहीं था। यह स्वतंत्रता सेनानियों और बुद्धिजीवियों के बीच संवाद का भी प्रमुख स्थान रहा। यहां आंदोलन से जुड़े विचारों और रणनीतियों पर चर्चा होती थी।

महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित हुए महंत लक्ष्मीनारायण दास

1920 में महात्मा गांधी पहली बार छत्तीसगढ़ आए थे। उनके विचारों से महंत लक्ष्मीनारायण दास प्रभावित हुए। इसके बाद उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ चलने वाले आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई। असहयोग आंदोलन के दौरान भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

अंग्रेज अधिकारी भी हलधर शास्त्री से पढ़ने आते थे

इतिहासकार के मुताबिक पंडित हलधर शास्त्री बड़े विद्वान और विचारक थे। अंग्रेज अधिकारी भी उनसे संस्कृत का ज्ञान लेने आते थे। बताया जाता है कि जब अंग्रेज अधिकारी संस्कृत पढ़ने उनके घर आते थे, तो वे बाहर तांगे में बैठे रहते थे और शास्त्री जी घर के छज्जे से उन्हें पढ़ाते थे।

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