आजादी के 78 साल बाद भी छत्तीसगढ़ में जारी है पलायन और बंधुआ मजदूरी का दर्द

Migration and Bonded Labour from Chhattisgarh: देश की आजादी के सालों बाद जब नए राज्य छत्तीसगढ़ का उदय हुआ तब यहां के लोगों ने सपना देखा था कि राज्य में खुशहाली आएगी और सुनियोजित विकास होगा। राजधानी से लेकर अन्य शहरों और गांवों में विकास के रूप में छोटे-बड़े निर्माण कार्य और सड़कों का जाल भी नजर आता है, मगर वास्तव में क्या यही विकास और खुशहाली का प्रतीक है, यह आज का अहम सवाल है। सरकार द्वारा गरीबों और जरूरतमंदों के लिए बड़े पैमाने पर चलाई जा रही योजनाओं के बावजूद आज छत्तीसगढ़ से लाखों ग्रामीणों का दूसरे प्रदेशों में पलायन हो रहा है। ये लोग ईंट भट्ठों और निर्माण संस्थानों में बंधुआ मजदूर की तरह काम कर रहे हैं, और इनकी सुध लेने वाला कोई भी नहीं है।

बंधुआ कानून ताक पर

दरअसल हम सामान्य तौर पर बंधक बनाकर जबरिया काम कराने को बंधुआ मजदूरी समझ लेते हैं, जबकि बंधुआ की और भी विस्तृत व्याख्या इसके कानून में दी गई है।

बंधुआ मजदूरी, जिसे ऋण बंधन भी कहा जाता है, उस स्थिति को संदर्भित करता है जहां कोई व्यक्ति ऋण, अग्रिम भुगतान, या विरासत में मिले सामाजिक दायित्वों के कारण जबरन कार्य करने के लिए मजबूर होता है, अक्सर बिना निश्चित सीमा या उचित वेतन के। छत्तीसगढ़ के कई जिलों से काफी संख्या में लोग दूसरे प्रदेशों में काम करने जाते हैं। दरअसल जब ये अपने गांव से काम के लिए रवाना होते हैं, तो परंपरा यही बन गई है कि जो सरदार या दलाल इन्हें लेकर जा रहा होता है उससे ये एक निश्चित रकम ले लेते हैं और उस रकम के एवज में संस्थानों में जाकर मजदूरी करते हैं। निश्चित रकम ही वह अग्रिम भुगतान है जो बंधुआ कानून के अंतर्गत आता है। इस कानून के उल्लंघन की शुरुआत यहीं से हो जाती है। हालांकि मजदूरी के लिए जा रहा परिवार इसी आशंका से एडवांस में रकम ले लेता है, कि पता नहीं जहां काम करने जा रहे हैं, वहां मजदूरी मिलेगी भी या नहीं।

बंधुआ मजदूरी का नया चेहरा: “एडवांस की रकम”

छत्तीसगढ़ से हर वर्ष बड़े पैमाने पर पलायन नहीं बल्कि मजदूरों की तस्करी होती है। दलालनुमा लोग गांवों में घूमते हैं और लोगों को बरगला कर अच्छी मजदूरी दिलाने का वादा कर ईंट भट्ठों या निर्माण स्थलों पर ले जाते हैं। मजदूर परिवार से इनका पहला सौदा एडवांस की रकम को लेकर होता है? रकम को मौके पर लेने के बाद ही परिवार रवाना होता है। बाद में मजदूरों और ठेकेदार के बीच अक्सर इसी रकम को लेकर विवाद होता है। अधिकांश ठेकेदार एडवांस की रकम पूरा चुकने के बाद ही मजदूरी देने की बात कहते हैं और इन्हे जबरिया रोककर रखते हैं। यही वजह है कि बंधुआ कानून में एडवांस की रकम देना ही अवैध माना गया है। मगर श्रम विभाग से जुड़े अफसर इसके बारे में किसी भी पक्ष को नहीं बताते हैं। सच तो यह है कि छत्तीसगढ़ के कई श्रम अफसरों को इस बात का पता ही नहीं है कि मजदूरों को इस तरह का एडवांस देना बंधुआ मजदूरी के कानून का उल्लंघन है।

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मानवाधिकारों की पैरवी करने वाले एडवोकेट विनोद कुमार सिंह का कहना है कि जब मालिक या ठेकेदार द्वारा मजदूरों को अग्रिम राशि दी जाती है और पूरा परिवार अग्रिम राशि चुकाने के लिए काम कर रहा होता है, तो यह धारा 2 के अनुसार स्पष्ट रूप से बंधुआ मजदूरी है। यह प्रथा ‘बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976’ का उल्लंघन है। मजदूरों को कर्ज देना, उनसे जबरन काम करवाना, उनकी आवाजाही पर रोक लगाना, उनके रोजगार या काम में स्वतंत्रता न होना बंधुआगिरी के लक्षण हैं।

किन राज्यों में मजदूरी करने जाते हैं छत्तीसगढ़ के लोग ?

देश के विभिन्न राज्यों में बंधुआ मजदूरों को छुड़ाने और उनको क़ानूनी और प्रशासनिक सहायता उपलब्ध कराने वाली संस्था NCCEBL याने “नेशनल कैंपेन कमिटी फॉर ईरेडिकेशन ऑफ बॉन्डेड लेबर” के संयोजक और मानवाधिकार कार्यकर्ता निर्मल गोराना ने टीआरपी न्यूज़ से बातचीत में बताया कि छत्तीसगढ़ के ज्यादातर मजदूर काम करने के लिए दिल्ली, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, मध्य प्रदेश, उड़ीसा और राजस्थान अदि राज्यों में जाते हैं।

निर्मल बताते हैं कि नेशनल कैंपेन कमिटी फॉर ईरेडिकेशन ऑफ बॉन्डेड लेबर देश के 21 राज्यों में सक्रिय रूप से कार्यरत है। इस संस्था ने विशेष रूप से छत्तीसगढ़ के लगभग 6000 से ज्यादा मजदूरों को देश के अलग अलग राज्यों जैसे मध्य प्रदेश, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, उड़ीसा और राजस्थान से मुक्त करवाकर छत्तीसगढ़ भेजा है। निर्मल गोराना छत्तीसगढ़ सरकार से मिलकर बंधुआ मजदूरों के मुक्ति एवं पुनर्वास के साथ प्रवासी मजदूरों के सुरक्षित पलायन पर चर्चा कर चुके है और उन्होंने एक एमओयू जम्मू कश्मीर और छत्तीसगढ़ सरकार के बीच हस्ताक्षर कराने की भी पहल की है।

बंधुआ श्रमिक प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 – सभी प्रकार की बंधुआ मजदूरी को अपराध घोषित करता है, ऋण दायित्वों को समाप्त करता है और जिला स्तर पर सतर्कता समितियों (DVCs) को प्रवर्तन की शक्ति देता है। इसके तहत जिलों में कलेक्टर्स को अधिकार दिए गए हैं कि वे ऐसे मजदूरों को बंधुआ से मुक्ति दिलाएं और नियम के तहत उनका पुनर्वास करें, मगर अधिकांश मामलों में ऐसा नहीं होता।

मजदूरों को बंधुआ मानने से बचता है प्रशासन

निर्मल गोराना का अब तक का अनुभव यह रहा है कि बंधुआ मजदूरों की सूचना मिलने पर संबंधित जिले की टीम कार्यस्थलों पर पहुँचती है और फंसे हुए मजदूरों को उनके बकाये का भुगतान करवाकर उन्हें वापस ले आती है। जबकि नियम यह कहता है कि संबंधित जिले के प्रशासन को जांच करके ऐसे मजदूरों को मुक्ति प्रमाण दिया जाये और इसके आधार पर मजदूर जिन जिलों के निवासी हैं, वहां के प्रशासन द्वारा बंधुआ कानून के तहत उनका पुनर्वास कराया जाये। मगर अधिकांश मामलों में कलेक्टरों द्वारा मजदूरों को बंधक मानने से परहेज किया जाता है। ऐसे में जो मजदूर अपने घर लौटते हैं, वे वापस रोजी रोटी के लिए ऐसे ही संस्थानों में दोबारा काम करने के लिए चले जाते हैं।

मानवाधिकार आयोग ने लिया संज्ञान

एक मामले का जिक्र करते हुए निर्मल गोराना बताते हैं कि छत्तीसगढ़ से क्षेत्रम, खोलबहरा और तिहारू नामक ग्रामीणों के परिवारों को फरीदाबाद, हरियाणा के ईंट भट्टे में तस्करी करके लाया गया। तीनों परिवारों को छत्तीसगढ़ वापस जाने नहीं दिया गया। 1 साल तक काम करने के बाद, जब छेत्रम के परिवार ने घर वापस जाने की जिद की, तो भूमिया भट्टा कंपनी के मालिक गुलाब सिंह और ठेकेदार ने उन्हें यह कहकर घर जाने से मना कर दिया कि जब दूसरे मजदूर आएंगे, तब आपको जाने दिया जाएगा।

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यहां, छेत्रम के साथ-साथ राजकुमार का परिवार एवं अन्य परिवार जिसमें 56 छत्तीसगढ़ी गरीब मजदूर लोग, बच्चे महिलाएं, सभी मानव तस्करी और बंधुआ मजदूरी के शिकार हुये। इन्हें खाने के खर्च के लिए केवल ₹3000 से 6,000/- रुपया प्रति माह दिया गया और उनका हिसाब-किताब भी मनमाने ढंग से किया गया।

इन तमाम 56 छत्तीसगढ़ी मजदूरों को जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे शामिल है, को फरीदाबाद प्रशासन ने न्याय देने के बजाय ईंट भट्टा मालिक एवं मानव तस्कर को बचाने के लिए एड़ी चोटी तक का जोर लगा दिया। तब नेशनल कैंपेन कमिटी फॉर ईरेडिकेशन ऑफ बॉन्डेड लेबर ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का दरवाजा खटखटाया तथा संघर्ष किया। वर्ष 2024 से लेकर आज तक का यह परिणाम रहा कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने न केवल इस एक मामले में बल्कि 86 अन्य मामलों को लेकर हरियाणा सरकार के प्रमुख सचिव, जिलाधिकारी फरीदाबाद हरियाणा, लेबर कमिश्नर हरियाणा को फटकार लगाते हुए बंधुआ मजदूरों को न्याय देने के निर्देश जारी किया और चार सप्ताह में आयोग के सम्मुख फाइनल रिपोर्ट पेश करने का ऑर्डर भी जारी किया।

मानवाधिकार आयोग के आदेश में निहित है कि यदि प्रशासन रिपोर्ट पेश करने में फेल होगा तो हरियाणा के प्रमुख सचिव को आयोग के सम्मुख हाजिर होना पड़ेगा। हालांकि तब लगा कि छत्तीसगढ़ के इन बंधुआ मजदूरों को न्याय मिलेगा जिसके अंतर्गत उनका उचित पुनर्वास हो पाएगा।

आयोग के आदेश पर गंभीरता नहीं

राष्ट्रिय मानवाधिकार आयोग ने छत्तीसगढ़ के 56 बंधुआ मजदूरों सहित अन्य दर्जनों ममलों में हरियाणा सरकार को आदेश तो जारी कर दिया मगर संबंधित जिलों के कलेक्टर्स और श्रम विभाग के अफसरों ने इसे भी गंभीरता से नहीं लिया। जिसकी वजह से मामला अब तक पेंडिंग है।

छत्तीसगढ़ की सरकार को करनी चाहिए पहल

बंधुआ मजदूरों को अदालती चक्कर से बचाने के लिए संबंधित जिले के जिलाधिकारी को कानून के तहत पावर दिया गया है किंतु प्रशासन भी मजदूरों के साथ अन्याय कर रहा है। निर्मल गोराना कहते हैं कि छत्तीसगढ़ की सरकार को ऐसे मामलों में स्वयं हाई कोर्ट में जाकर इन मामलों की पैरवी करनी चाहिए जो आज तक नहीं हुआ है। अगर इस अगस्त माह में छत्तीसगढ़ के बंधुआ मजदूरों को न्याय नहीं मिला तो निर्मल गोराना स्वयं पंजाब एंड हरियाण हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे।

पलायन के चैन को तोड़ना होगा

अब सवाल यह उठता है कि आखिर यहां से लोग मजदूरी के लिए दूसरे राज्यों में पलायन क्यों कर रहे हैं? स्वाभाविक है कि इसके पीछे सबसे प्रमुख वजह स्थानीय स्तर पर रोजगार की कमी का है। हालांकि मनरेगा जैसी योजनाएं चलीं मगर इसकी जटिलताओं और पर्याप्त मजदूरी नहीं मिलने के चलते लोग इसका लाभ उठाने की बजाय बाहर जाकर विपरीत परिस्थितियों में काम करना बेहतर समझते हैं। अब तक हजारों मजदूरों को ठेकेदारों के चंगुल से छुड़ा चुकी संस्था NCCEBL के संयोजक निर्मल गोराना कहते हैं कि पलायन के चैन को तोड़ने के लिए जरूरतमंदों को स्थानीय स्तर पर ही रोजगार मुहैया करना जरुरी होगा। सरकार को इनके लिए विशेष योजनाएं बनानी होंगी, ताकि इनका पलायन न हो।

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मजदूरों के सर्वे की है जरुरत

बता दें कि प्रदेश भर में जिन गांवों से लोग काम करने के लिए बाहर के प्रदेशों में जाते हैं, वहां की पंचायत में उनका लेखा जोखा होता है। इसमें मजदूरों को ले जाने वाले दलाल के साथ ही वे कहां पर काम करने जा रहे हैं, वहाँ की जानकारी भी दर्ज होती है। सरकार के श्रम विभाग के जिम्मेदार अफसरों को इस बात का पता लगाने की जरुरत है कि उनके जिले के ग्रामीण किन परिस्थितियों में काम कर रहे हैं, उन्हें कोई परेशानी तो नहीं है। इसके लिए संबंधित जिला प्रशासन से समन्वय स्थापित करके समय-समय पर सर्वे करने की भी जरुरत है। मगर जिम्मेदार विभाग के अफसर ऐसा करेंगे, यह सम्भव नजर नहीं आता।

जम्मू-कश्मीर में मजदूरों की हत्या ने डराया

हाल ही में जम्मू-कश्मीर के कुलगाम में छत्तीसगढ़ के दो मजदूरों की आतंकियों ने गोली मार कर हत्या कर दी। इसके बाद कुछ दिनों तक तहलका मचा, मजदूरों के परिजनों को मुआवजे की घोषणा कर दी गई और मामला शांत हो गया। मगर अब तक यह जानने की कोशिश नहीं की गई कि इनके साथ जो मजदूर वहाँ काम कर रहे हैं, उनकी क्या हालत है।
टीआरपी न्यूज़ को पता चला है कि संबंधित ईंट भट्ठे में छत्तीसगढ़ के लगभग 200 मजदूर काम कर रहे हैं, और वे काफी डरे हुए हैं। दरअसल इस हत्याकांड के बाद मजदूर वापस लौटना चाहते थे मगर भट्ठा मालिक ने डरा-धमका कर उन्हें जाने से रोक दिया। ये इतने डरे हुए हैं कि खुद से पहल करते हुए शिकायत भी नहीं करना चाहते, मजदूरों के हित में काम करने वाली संस्था ने इसके बारे में बताया।

टीआरपी न्यूज़ ने इनमें से एक महिला मजदूर से मोबाइल पर संपर्क कर जानने का प्रयास किया, मगर उसने इतना ही कहा कि पहले उन्होंने भय के चलते वापस जाने की बात कह दी थी मगर अभी हम जाना नहीं चाहते। बात जो भी हो सरकार और श्रम विभाग को टीम भेजकर इन मजदूरों की सुध तो लेनी ही चाहिए, अन्यथा वे डर के साये में इसी तरह फंसे रहेंगे।

बहरहाल छत्तीसगढ़ के गांवों में जो हालात हैं और जिसकी वजह से लोग पलायन कर रहे हैं, उस पर गहन चिंतन करते हुए सरकार को विशेष पहल करने की जरुरत है। सच तो यह है कि देश में पलायन के मामले में बिहार का नाम सबसे पहले लिया जाता है, मगर स्थिति इसके उलट है। छत्तीसगढ़ से पलायन का सही आंकड़ा अगर सामने आ जाये तो जिम्मेदार विभाग को कुछ जवाब देते भी नहीं बनेगा। आखिर में सवाल वही कि यहां के लोगों को पलायन और बंधुआ मजदूरी से कब मिलेगी आजादी ?