MMDR vs Jharkhand Government: केंद्र सरकार की ओर से खान और खनिज विकास एवं विनियमन में संशोधन किया गया है। इससे संबंधित संशोधन बिल संसद में पास भी हो गया है। वहीं, इसके पास होने के बाद से ही देश के कई राज्यों में इसका विरोध शुरू हो गया है। विरोध के सुर ऐसे हो गए हैं कि झारखंड सरकार ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का निर्णय लिया है। दरअसल, नियमों में हुए संशोधनों के बाद झारखंड को भारी आर्थिक नुकसान की आशंका है।
झारखंड सरकार का दावा है कि इससे सीधे तौर पर झारखंड सरकार को प्रतिवर्ष सेस और रॉयल्टी के जरिए लगभग 14,000 करोड़ रुपये का सीधा राजस्व नुकसान होने का अनुमान है। इस कटौती से ‘मंईयां सम्मान योजना’ और ‘अबुआ आवास योजना’ जैसी कई जनहित व विकास योजनाएं प्रभावित होने की भी संभावना जताई जा रही है। ऐसे में राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने के लिए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अनुमति के बाद कानूनी मसौदा भी तैयार कर लिया गया है और जल्द ही सुप्रीम कोर्ट में इस पर याचिका दायर की जाएगी।
छत्तीसगढ़ पर ऐसा होगा असर
एक्ट में संशोधन के बाद छत्तीसगढ़ जैसे खनिज-प्रधान राज्य सरकार के खनिजों और खनिज-युक्त भूमि पर अपने हिसाब से नए टैक्स या सेस लगाने के अधिकार सीमित हो जाएंगे। नए कानून में स्पष्ट है कि जो टैक्स या सेस राज्य ने पहले से वसूल लिए हैं, उन्हें वापस नहीं करना होगा। जिला खनिज न्यास (DMF) और प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना (PMKKKY) के तहत मिलने वाले फंड और स्थानीय विकास कार्य पहले की तरह चलते रहेंगे।
कांग्रेस छत्तीसगढ़ में कर रही है विरोध
छग में प्रदेश कांग्रेस कमेटी सीधे तौर पर इस संशोधन का विरोध कर रही है। प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा राज्या सरकार अब खनिज अधिकारों या खनिज वाली जमीन पर अतिरिक्त टैक्स, सेस या लेवी नहीं लगा पाएंगी। यह सीधे तौर पर राज्य के अधिकारों का अतिक्रमण है। इससे खनिज संपदा वाले राज्यों की अर्थव्यवस्था में खनन से मिलने वाले राजस्व में सीधे तौर पर कमी आएगी और इसका असर राज्य के राजस्व और वित्तीय स्वायत्तता पर पड़ सकता है। खनन से स्थानीय स्तर पर पर्यावरण और इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान होता है। इसकी भरपाई के लिए राज्यों को अपने स्तर पर संसाधन जुटाने का अधिकार होना चाहिए।
हसदेव से बैलाडीला तक खनन का विरोध
बैज ने कहा कि हसदेव, तमनार, धरमजयगढ़, रायगढ़, मैनपाट, बैलाडीला, बचेली, किरंदुल, कांकेर और बीजापुर जैसे क्षेत्रों में खनन को लेकर स्थानीय स्तर पर विरोध और ग्राम सभाओं की आपत्तियां सामने आती रही हैं। पांचवीं अनुसूची वाले क्षेत्रों में PESA के तहत ग्राम सभाओं के अधिकारों को भी कमजोर किया जा रहा है। कांग्रेस का आरोप है कि नए खनिज संशोधन के जरिए भी निजी खनन कंपनियों को फायदा पहुंचाने की कोशिश की जा रही है।
इन राज्यों में तेज हो रहे विरोध के सुर
झारखंड के अलावा छत्तीसगढ़, ओडिशा, कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों में इसका विरोध शुरू हो गया है। ओडिशा में बीजू जनता दल (BJD) और इंडिया ब्लॉक ने इस संशोधन को राज्य के अधिकारों पर हमला बताते हुए व्यापक विरोध प्रदर्शन और रैलियां शुरू कर दी हैं। छत्तीसगढ़ में प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने केंद्र सरकार के इस संशोधन को राज्य विरोधी और संघीय ढांचे के खिलाफ बताया है। वहीं, कर्नाटक के उप-मुख्यमंत्री और केरल के मुख्यमंत्री ने भी केंद्र सरकार से इस कानून को वापस लेने की मांग की है, क्योंकि यह राज्यों के कर लगाने के अधिकारों को सीमित करता है।
जानिए, क्या किया गया है संशोधन
करों पर नियंत्रण (धारा 9डी): राज्य सरकारें केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों और प्रतिबंधों के अलावा खनिज अधिकारों या खनिज-युक्त भूमि पर कोई नया कर, उपकर (सेस) या अन्य लेवी नहीं लगा सकेगी। यह राज्य के राजस्व संग्रहण के लिए हो सकती है घातक। इससे धारा-2 और धारा-3 में मिनरल वाली जमीन से राज्य सरकार का टैक्स, सेस या लेवी लगाने का अधिकार कमजोर होगा।
पूर्वव्यापी करों की समाप्ति: संशोधन के तहत पुराने या बकाया पूर्वव्यापी कर दावों को अमान्य कर दिया गया है, जिससे खनन क्षेत्र में दीर्घकालिक टैक्स निश्चितता आएगी।
पट्टे और क्षेत्र विस्तार: खनन पट्टों में एक बार में 10 प्रतिशत तक और मिश्रित लाइसेंसों में 30 प्रतिशत तक क्षेत्रफल का विस्तार किया जा सकता है।
बिक्री सीमा समाप्त: कैप्टिव खानों से खनिज बिक्री पर लगी सीमा को हटा दिया गया है।


