Bemetara/Dhamtari: आईटी के इस दौर में भी छत्तीसगढ़ के कई इलाकों में रूढ़िवादिता और सामाजिक प्रताड़ना के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। आलम यह है कि प्रशासन और पुलिस चाहकर भी कठोर कार्रवाई करने की बजाय समझाइश देकर मामलों को सुलझाने में लगी हुई है। इस बीच छत्तीसगढ़ में सामाजिक बहिष्कार के दो गंभीर मामले सामने आए हैं, जिसने मानवता और सामाजिक न्याय पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पहला मामला बेमेतरा जिले के ग्राम काचरी का है, जहां 4 परिवारों का हुक्का-पानी बंद कर दिया गया, वहीं दूसरा मामला धमतरी के तर्रागोंदी गांव का है, जहां 31 सदस्यों वाले एक परिवार का दो साल से सामाजिक बहिष्कार किया जा रहा है।

Cases of social boycott in Chhattisgarh: बेमेतरा के ग्राम काचरी से सामाजिक उत्पीड़न का मामला सामने आया है। बताया जा रहा है कि सावन मास में शिव मंदिर में आयोजित रुद्राभिषेक कार्यक्रम के कारण गांव की बैठक में शामिल न हो पाने पर 4 परिवारों – अर्जुन साहू, मनोज साहू, रमेश साहू और कलाराम वर्मा का हुक्का-पानी बंद कर दिया गया। सभी पीड़ितों ने पुलिस से मदद की गुहार लगाते हुए आवेदन दिया है।

बातचीत की तो लगेगा 10 हजार का जुर्माना

आरोप है कि बीते रविवार गांव की बैठक में फरमान जारी किया गया कि यदि कोई भी व्यक्ति इन परिवारों से बातचीत करेगा या दुकान से सामान देगा तो उस पर 10,000 रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। वहीं नियम तोड़ने वालों की सूचना देने वाले को 2500 रुपये का इनाम देने की घोषणा की गई। पीड़ित पक्ष के अनुसार उनके द्वारा कलेक्टर कार्यालय, एसपी कार्यालय व साजा थाने में आवेदन दिया गया है।

पीड़ित परिवारों की दिनचर्या प्रभावित

सामाजिक बहिष्कार के कारण पीड़ित परिवारों का जीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है। गांव की पारंपरिक पोनी प्रथा की सारी व्यवस्था रोक दी गई है और नाई तथा अन्य सेवाएं बंद कर दिए जाने से इनके पूजा-पाठ सहित सभी आवश्यक धार्मिक व दैनिक कार्य ठप हो गए हैं। जुर्माने के डर से गांव का कोई भी व्यक्ति उनसे संपर्क करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है।

विवाद की जड़ में चोरी की घटना

इस गांव में विवाद की मुख्य जड़ 24-25 मई की दरमियानी रात को रेखा बाई साहू के घर हुई चोरी से जुड़ी है। वारदात में लगभग 7 लाख रुपये के जेवर और 5 हजार रुपये नकदी चोरी हुए थे। पुलिस पूछताछ में संदेही भोजराम साहू ने अपराध स्वीकार किया था, लेकिन ठोस कार्रवाई न होने से पीड़ित परेशान थे। इसके बाद संदेही पक्ष की ओर से बुलाई गई पहली बैठक में पीड़ित पक्ष से ही बदसलूकी की गई। जब पीड़ित परिवार सावन पूजा के कारण रविवार को आयोजित दूसरी बैठक में नहीं पहुंच पाए तो ग्रामीणों ने एक तरफा फैसला सुनाते हुए चारों परिवारों का हुक्का-पानी बंद कर दिया।

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पीड़ितों का ये है दर्द

पीड़ित रमेश साहू और अर्जुन साहू का कहना है कि चोरी की शिकायत करने की सजा उन्हें इस रूप में भुगतनी पड़ रही है। बुजुर्ग कलाराम वर्मा ने कहा कि उम्र के इस पड़ाव में इस दर्दनाक स्थिति की पीड़ा को वे शब्दों में व्यक्त नहीं कर पा रहे हैं।

धमतरी के तर्रागोंदी में 31 लोगों का बहिष्कार

इसी तरह धमतरी जिले के तर्रागोंदी गांव में भी सामाजिक बहिष्कार का मामला सामने आया है। यहां के निवासी धनेश्वर साहू के परिवार का कहना है कि उनके परिवार में करीब 31 सदस्य हैं। परिवार अपनी पुश्तैनी जमीन पर मकान का निर्माण करा रहा था, जिसे कुछ ग्रामीणों ने अतिक्रमण बताते हुए रोक लगा दी।

दुकान से सामान नहीं, मवेशियों को चराने से इंकार

पीड़ितों के मुताबिक, जमीन विवाद के बाद उनके परिवार को गांव में सामाजिक रूप से अलग-थलग कर दिया गया है। ग्रामीण उनसे बातचीत और लेन-देन से परहेज कर रहे हैं, छोटे बच्चों को दुकानों से सामान नहीं दिया जा रहा, मवेशियों को चराने से चरवाहे ने इनकार कर दिया है। दो साल से यह स्थिति बनी हुई है। पीड़ित परिवार ने कलेक्टर से शिकायत कर न्याय की मांग की है।

पुलिस का क्या है कहना..?

इस मामले में अनुविभागीय अधिकारी पुलिस रुचि गर्ग ने कहा कि मेरे कार्यालय तक अभी तक लिखित में कोई जानकारी नहीं आई है। जानकारी आते ही इस पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

क्या है टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम 2005..?

ऐसा नहीं है कि छत्तीसगढ़ में समाज में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ कोई कानून नहीं है। यहां सामाजिक बहिष्कार को लेकर तो नहीं, लेकिन जादू-टोना और अन्धविश्वास को लेकर कानून जरूर बनाया गया है। समाज में अंधविश्वास व कुरीतियों को हटाकर व्यक्ति को जीवन जीने के लिए स्वस्थ्य वातावरण व विधिक सुरक्षा प्रदान करने हेतु छत्तीसगढ़ टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम 2005 को अधिनियमित किया गया है।

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यह अधिनियम सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ में दिनांक 30 सितम्बर 2005 से लागू है। इसके परिभाषा खण्ड (धारा 2) में टोनही, पहचानकर्ता, ओझा व हानि को परिभाषित किया गया है। जिसके अनुसार-

टोनही- इस अधिनियम के अनुसार, किसी व्यक्ति की पहचान इस प्रकार की जाये कि वह किसी अन्य व्यक्ति अथवा समाज, पशु, अथवा जीवित वस्तुओं को काला जादू, बुरी नजर या अन्य रीति से नुकसान पहुंचाता हो चाहे वह डायन, टोनही अथवा किसी अन्य नाम से जाना जाता हो।

पहचानकर्ता- इस अधिनियम के अनुसार, कोई व्यक्ति किसी भी व्यक्ति को टोनही के रूप मे पहचान करता है, या अन्य व्यक्ति को पहचान करने के लिए प्रेरित करता हो,या अपने शब्द, कार्य, भाव-भंगिमा, व्यवहार से पहचान करने मे मदद करता हो, या जानबूझकर ऐसा कार्य करता हो, जिससे ऐसी पहचान के आधार पर उस व्यक्ति को क्षति पहुंचाता हो।

ओझा- ऐसा व्यक्ति जो यह दावा करता है कि उसमें झाड़फूंक, टोटका, तंत्र मंत्र या अन्य द्वारा टोनही या टोनही द्वारा प्रभावित व्यक्ति, पशु या जीवित वस्तुओं को नियंत्रित, उपचारित, शक्तिहीन करने की क्षमता है।

हानि- इसमें शारीरिक, मानसिक तथा आर्थिक नुकसान तथा प्रतिष्ठा को नुकसान शामिल हैं।

इस अधिनियम की धारा 4 से धारा 8 तक दंड का प्रावधान किया गया है। जिसके अनुसार, यदि व्यक्ति किसी भी माध्यम से टोनही के रूप मे पहचान करता है, तो वह तीन वर्ष का कठिन कारावास तथा जुर्माने से दंडित किया जाएगा। वही धारा 5 के तहत कोई व्यक्ति किसी को टोनही के रूप में पहचान कर उसे शारीरिक या मानसिक रूप से नुकसान पहुंचाता है, तो उसे पांच वर्ष का कठिन कारावास तथा जुर्माने से दंडित किया जाएगा। इसके अलावा कुछ अन्य धाराओं में भी दंड के भी प्रावधान हैं।

सदन में पेश नहीं हो सका सामाजिक बहिष्कार का कानून

बताते चलें कि छत्तीसगढ़ में पूर्व में भाजपा के शासनकाल में सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ कानून का प्रारूप तैयार कर लिया गया था, मगर समाज के कथित ठेकेदारों ने ही इसका विरोध शुरू कर दिया। इनका तर्क था कि इसके खिलाफ कानून लाये जाने से किसी भी समाज में बनाये गए नियम-कायदों का किसी तरह का उल्लंघन करने पर संबंधितों पर अंकुश नहीं लगाया जा सकेगा। तात्कालिक तौर पर विरोध और आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए सरकार ने इस प्रस्तावित विधेयक को ठन्डे बस्ते में डाल दिया। हालांकि अंध श्रद्धा निर्मूलन समिति और कुछ अन्य संगठनों के लोग आज भी सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ कनून लाने के लिए प्रयासरत हैं, मगर प्रदेश भर से चुने हुए जनता के प्रतिनिधि याने विधायक और सांसदों की और न ही सरकार में इसमें रूचि दिखाई दे रही है। पूर्व के सत्र में सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ अलग से विधेयक लाने का प्रयास एक विधायक द्वारा किया गया, मगर सरकार ने गंभीरता नहीं दिखाई और इसे पेश नहीं किया जा सका।

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FAQ: सामाजिक बहिष्कार का दंश

सवाल 1. बेमेतरा में हुक्का-पानी बंद का मामला कहां का है?

यह मामला बेमेतरा जिले के साजा ब्लॉक के ग्राम काचरी का है, जहां अर्जुन साहू, मनोज साहू, रमेश साहू और कलाराम वर्मा के 4 परिवारों का सामाजिक बहिष्कार किया गया है।

सवाल 2. हुक्का-पानी बंद करने का क्या कारण बताया जा रहा है?

पीड़ित परिवार सावन में शिव मंदिर के रुद्राभिषेक के कारण गांव की बैठक में शामिल नहीं हो पाए थे, जिसके बाद गांव वालों ने एकतरफा फैसला लेते हुए उनका बहिष्कार कर दिया।

सवाल 3. बहिष्कार करने वालों ने क्या फरमान जारी किया है?

फरमान जारी किया गया है कि जो भी व्यक्ति इन 4 परिवारों से बात करेगा या सामान देगा, उस पर 10,000 रुपये का जुर्माना लगेगा और सूचना देने वाले को 2500 रुपये इनाम मिलेगा।

सवाल 4. धमतरी का मामला क्या है?

धमतरी के तर्रागोंदी में धनेश्वर साहू के 31 सदस्यों वाले परिवार का पुश्तैनी जमीन पर मकान बनाने को लेकर विवाद के बाद 2 साल से सामाजिक बहिष्कार किया जा रहा है।