Socialist thinker Raghu Thakur objects to the term ‘Gen-Z’
Socialist thinker Raghu Thakur objects to the term ‘Gen-Z’

बिलासपुर। लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी (लोसपा) के संस्थापक, राष्ट्रीय संरक्षक एवं समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर ने ‘जेन-जी’ जैसे विदेशी शब्दों के चलन पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि आज जन आंदोलनों और विमर्श में विदेशी सहयोग और नैरेटिव हावी हो रहे हैं।

बिलासपुर प्रेस क्लब में ‘जन आंदोलन : दशा और दिशा’ विषय पर पत्रकारों से चर्चा करते हुए रघु ठाकुर ने कहा कि जिस तरह कांग्रेस पार्टी अंग्रेजों के जमाने में भारत में बनी थी, उसी तरह आज ‘कॉकरोच पार्टी’ अमेरिका में बनी है। उन्होंने कहा कि आज के दौर में जो आंदोलन हो रहे हैं, वे स्वतः स्फूर्त होने के बजाय प्रायोजित प्रतीत होते हैं।

उन्होंने कहा कि आंदोलनों के लक्ष्य सीमित होने के कारण उनका कोई व्यापक असर व्यवस्था पर नहीं पड़ता और गंभीर मुद्दों को छोड़कर केवल सतही बातों को उठाया जा रहा है। हालांकि, हालिया आंदोलनों से सरकार कुछ झेंपी अवश्य है और नई पीढ़ी के लोग आंदोलन में आगे आए हैं।​

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ठाकुर ने दिल्ली के आंदोलन में पीएम को गाली देने, तोड़फोड़, और खराब भाषा को लेकर असहमति जताई।

ठाकुर ने कहा कि आज सारी दुनिया के देशों में जो एजेंडे गढ़े जा रहे हैं, उनके पीछे विदेशी ताकतों का हाथ है। फ्रांसिस फुकुयामा की पुस्तक ‘द एंड ऑफ हिस्ट्री’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया से समानता, समाजवाद और बराबरी के विचार को समाप्त कर केवल पूंजीवाद और असमानता को ही एकमात्र व्यवस्था के रूप में थोपने की साजिश की गई। आज वास्तविक सामाजिक व आर्थिक विषमता को मिटाने के बजाय लोगों को मजहबी और सांस्कृतिक टकरावों में उलझाया जा रहा है।

रघु ठाकुर ने स्पष्ट किया कि किसी भी सच्चे जन आंदोलन में पाँच मूल तत्व होने चाहिए। इसे ​स्वतः स्फूर्त होना चाहिए। आंदोलन विदेशी फंडिंग या कॉर्पोरेट के बजाय जनता के अपने साधनों पर चले। इसका उद्देश्य तात्कालिक लाभ तक सीमित न होकर व्यवस्था परिवर्तन का होना चाहिए। आंदोलन में गाली-गलौज, पथराव और तोड़फोड़ जैसी हिंसा के लिए कोई स्थान न हो।अभिव्यक्ति की शैली तार्किक, संयमित और लोकतांत्रिक होनी चाहिए।

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उन्होंने 2010–11 के अन्ना आंदोलन को प्रायोजित बताते हुए कहा कि इससे सत्ताएं तो बदलीं, लेकिन व्यवस्था नहीं बदली। NEET पेपर लीक का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि मई में जब कोटा में 21 छात्रों ने अवसाद में आत्महत्या की, तब बड़े नेता विदेश दौरों पर थे। अब महीनों बाद सड़क पर उतरना वास्तविक जनहित नहीं, बल्कि प्रायोजित राजनीति का हिस्सा लगता है।

​रघु ठाकुर ने महाराष्ट्र में गैर-मराठी व हिंदी भाषियों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार को दुर्भाग्यपूर्ण बताया।

रघु ठाकुर ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत हिंदी को अनिवार्य भाषा के रूप में शामिल करने के बाद स्थानीय दलों के विरोध पर महाराष्ट्र सरकार ने निर्णय वापस ले लिया। ​उन्होंने आरोप लगाया कि तमिलनाडु सरकार द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति का विरोध करने पर केंद्र ने समग्र शिक्षा का लगभग 2,000 करोड़ का अनुदान रोक दिया, लेकिन महाराष्ट्र सरकार के फैसले पर केंद्र चुप रहा। उन्होंने पुणे के एक छात्र द्वारा हिंदी बोलने पर प्रताड़ित होकर आत्महत्या करने की घटना का उल्लेख करते हुए इसे ‘नया भाषाई साम्राज्यवाद’ करार दिया।

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इस प्रेस वार्ता में वरिष्ठ साहित्यकार रामकुमार तिवारी, जावेद उस्मानी के साथ रघु ठाकुर के समर्थक उपस्थित थे।