High Court Guidelines: प्रदेश की अदालतों की कार्यशैली, फैसलों की भाषा और पुलिस की एफआईआर (FIR) ड्राफ्टिंग में अब ऐतिहासिक और संवेदनशील बदलाव देखने को मिलेगा।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के परिपालन में हाई कोर्ट ने राज्य की न्यायिक प्रणाली और प्रशासनिक व्यवस्था के लिए विस्तृत ‘हैंडबुक और आदेश’ जारी कर दिए हैं। यह कदम न्याय प्रक्रिया को अधिक गरिमापूर्ण, भयमुक्त और पीड़ित-केंद्रित बनाने के उद्देश्य से उठाया गया है।
जिला अदालतों, गृह और महिला-बाल विकास विभाग को निर्देश जारी
हाई कोर्ट ने प्रदेश के सभी जिला एवं सत्र न्यायालयों, (या राज्य) स्टेट ज्यूडिशियल एकेडमी, राज्य व जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, मुख्य सचिव, गृह विभाग, डीजीपी (DGP) और महिला एवं बाल विकास विभाग को आदेश की प्रति भेजकर इस गाइडलाइन का तत्काल प्रभाव से पालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है। अब बंद कमरे (In-camera) में संवेदनशील केस सुने जाएंगे और गवाहों को ‘मेहमान’ की तरह गरिमा प्रदान की जाएगी।
इलाहाबाद हाई कोर्ट टिप्पणी के बाद सुप्रीम कोर्ट का स्वतः संज्ञान
यह ऐतिहासिक बदलाव इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक आपराधिक पुनरीक्षण मामले में की गई असंवेदनशील और आपत्तिजनक टिप्पणियों के बाद सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर स्वतः संज्ञान लेते हुए रिटायर्ड जस्टिस अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता में 5 सदस्यीय उच्चस्तरीय कमेटी का गठन किया था। कमेटी की रिपोर्ट “जजमेंट एंड जेंडर सेंसिटिविटी एंड कंपैशन इन राइटिंग जजमेंट” को आधार बनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पूरे देश की अदालतों और पुलिस प्रशासन में इसे अनिवार्य रूप से लागू करने का आदेश दिया।
पुराने और आपत्तिजनक शब्दों की जगह अब इस्तेमाल होंगे ये नए संवेदनशील शब्द
अदालतों के फैसलों और पुलिस एफआईआर से रूढ़िवादी व अपमानजनक शब्दों को हटाकर उनकी जगह न्यायसंगत और सम्मानजनक शब्दों को अनिवार्य किया गया है:
| पुराना/आपत्तिजनक शब्द | नया/संवेदनशील शब्द |
| प्रॉसिक्यूट्रिक्स | सर्वाइवर / विक्टिम / शिकायतकर्ता |
| लाचार महिला / बेबस औरत | सर्वाइवर / महिला |
| अस्मत / शील भंग करना | शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन / सेक्सुअल असॉल्ट |
| हवस | सेक्सुअल वायलेंस / साक्ष्य व कानून पर फोकस |
| चरित्रहीन / ईजी वर्चुअल महिला | साक्ष्य व कानून पर केंद्रित संदर्भ |
| कीप / रखैल | पार्टनर / महिला मित्र |
| वेश्या / कॉलगर्ल | सेक्स वर्कर |
| किन्नर / हिजड़ा | ट्रांसजेंडर / इंटरसेक्स |
| अनपढ़ / देहाती गवाह | विवेकशील / समझदार गवाह |
पीड़ितों का सम्मान और गरिमा बनाए रखने की विशेष पहल
निचली अदालतों से लेकर हाई कोर्ट तक यौन अपराधों के मामलों में वर्षों से चली आ रही पुरानी और असंवेदनशील भाषा पर अब पूरी तरह विराम लग जाएगा। पहले अदालतों और थानों में पीड़िता के कपड़ों, चरित्र या व्यक्तिगत जीवन पर सवाल उठाकर उसका मानसिक उत्पीड़न किया जाता था, जिससे कई पीड़ित शिकायत दर्ज कराने से कतराते थे। साथ ही, ‘हवस’ या ‘लाचार महिला’ जैसे शब्द अपराध की गंभीरता को कम करते थे। इस नई पहल से पीड़ित-केंद्रित न्याय प्रणाली स्थापित होगी।
(FAQs)
Q1. हाई कोर्ट द्वारा जारी नई गाइडलाइन का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर: इसका मुख्य उद्देश्य अदालतों के फैसलों और पुलिस एफआईआर से महिलाओं के प्रति अपमानजनक व रूढ़िवादी शब्दों को हटाकर न्याय प्रणाली को संवेदनशील, गरिमापूर्ण और पीड़ित-केंद्रित बनाना है।
Q2. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में किस कमेटी की रिपोर्ट को लागू करने का आदेश दिया है?
उत्तर: सुप्रीम कोर्ट ने रिटायर्ड जस्टिस अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता वाली 5 सदस्यीय उच्चस्तरीय कमेटी की रिपोर्ट “जजमेंट एंड जेंडर सेंसिटिविटी एंड कंपैशन इन राइटिंग जजमेंट” को लागू करने का आदेश दिया है।
Q3. अब एफआईआर और फैसलों में ‘रखैल’ और ‘प्रॉसिक्यूट्रिक्स’ की जगह किन शब्दों का इस्तेमाल होगा?
उत्तर: ‘रखैल’ की जगह ‘पार्टनर / महिला मित्र’ और ‘प्रॉसिक्यूट्रिक्स’ की जगह ‘सर्वाइवर / विक्टिम / शिकायतकर्ता’ शब्द का इस्तेमाल किया जाएगा।
Q4. किन-किन विभागों को इस गाइडलाइन का तत्काल पालन करने का आदेश दिया गया है?
उत्तर: सभी 24 जिला अदालतों, ज्यूडिशियल एकेडमी, मुख्य सचिव, गृह विभाग, डीजीपी, विधिक सेवा प्राधिकरण और महिला एवं बाल विकास विभाग को निर्देश जारी किए गए हैं।
Q5. अदालतों में गवाहों और संवेदनशील मामलों के लिए क्या बदलाव किए गए हैं?
उत्तर: गवाहों को ‘अनपढ़/देहाती’ की बजाय समझदार माना जाएगा, उन्हें गरिमा दी जाएगी और संवेदनशील मामलों की सुनवाई बंद कमरे (In-camera) में करने का प्रावधान मजबूत किया गया है।


