Modern medical ultrasound monitor and fetal heart monitoring equipment in a hospital room
Following the Karachi incident, discussions regarding the clinical examinations and ultrasound protocols required prior to C-sections have intensified.

Karachi Fake Pregnancy Case: पाकिस्तान के कराची में एक महिला का डिलीवरी के लिए ऑपरेशन किया गया, लेकिन उसके पेट में कोई बच्चा नहीं मिला। पुलिस जांच में खुलासा हुआ है कि महिला प्रेग्नेंट ही नहीं थी और उसने पारिवारिक दबाव में आकर 38 हफ्ते की फर्जी अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट बनवाई थी।

इस घटना के बाद महिला के परिवार ने अस्पताल पर गंभीर आरोप लगाए हैं, वहीं बिना क्लिनिकल जांच के सी-सेक्शन ऑपरेशन किए जाने पर मेडिकल तंत्र पर भी बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।

पुलिस जांच में सामने आई सच की वजह

कराची के अस्पताल में हुई इस घटना के बाद मामला पुलिस तक पहुंचा। जांच में सामने आया कि महिला पर बच्चा कंसीव करने का बहुत अधिक पारिवारिक दबाव था। इसी डर की वजह से उसने फर्जी रिपोर्ट तैयार करवाई। हालांकि, इस खुलासे के बाद भी यह सवाल कायम है कि केवल एक पुरानी या फर्जी रिपोर्ट के आधार पर डॉक्टरों ने ऑपरेशन का फैसला कैसे ले लिया।

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डिलीवरी से पहले अस्पताल में कौन-सी जांचें हैं जरूरी?

डिलीवरी से पहले होने वाली जरूरी जांचों पर गुरुग्राम के फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट की प्रसूति एवं स्त्री रोग निदेशक डॉ. नूपुर गुप्ता ने जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि जब कोई महिला डिलीवरी के लिए आती है, तो सबसे पहले उसकी पुरानी रिपोर्ट और अल्ट्रासाउंड देखे जाते हैं। यदि पुरानी रिपोर्ट न हों, तो मौके पर जरूरी जांचें की जाती हैं। इनमें प्रेग्नेंसी कितने हफ्ते की है, बच्चे की पोजिशन क्या है और उसकी हार्टबीट कैसी है, यह जांचना अनिवार्य होता है।

क्या केवल रिपोर्ट के आधार पर ऑपरेशन संभव है?

डॉ. नूपुर के अनुसार, प्रेग्नेंसी के आखिरी महीनों में सिर्फ एक अल्ट्रासाउंड के भरोसे फैसला नहीं लिया जा सकता। बच्चे की धड़कन जांचने के लिए डॉप्लर या इलेक्ट्रॉनिक फिटल मॉनिटरिंग की जाती है। नाइस (NICE) गाइडलाइन के मुताबिक, लेबर के दौरान जरूरत पड़ने पर लगातार सीटीजी (CTG) मॉनिटरिंग की जाती है, जिससे बच्चे की हार्ट रेट पर लगातार नजर रखी जा सके।

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ऑपरेशन से ठीक पहले अल्ट्रासाउंड के नियम

चिकित्सा नियमों के अनुसार, कुछ खास परिस्थितियों में ऑपरेशन से ठीक पहले भी अल्ट्रासाउंड किया जा सकता है। नाइस गाइडलाइन कहती है कि अगर बच्चा उल्टी स्थिति में है (ब्रीच प्रेजेंटेशन) या प्लेसेंटा और प्रेग्नेंसी की स्थिति को लेकर कोई सवाल है, तो सी-सेक्शन से ठीक पहले अल्ट्रासाउंड करके बच्चे की सही पोजिशन की पुष्टि की जानी चाहिए।

5 FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

Q1: कराची के अस्पताल में ऑपरेशन के दौरान बच्चा क्यों नहीं मिला?

उत्तर: पुलिस जांच में सामने आया कि महिला प्रेग्नेंट ही नहीं थी। उसने पारिवारिक दबाव के कारण 38 हफ्ते की फर्जी अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट बनवाई थी।

Q2: महिला ने फर्जी अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट क्यों बनवाई थी?

उत्तर: महिला पर बच्चा कंसीव करने का पारिवारिक दबाव था, जिसके डर से उसने यह फर्जी रिपोर्ट तैयार करवाई थी।

Q3: डिलीवरी के लिए अस्पताल आने पर डॉक्टर सबसे पहले क्या चेक करते हैं?

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उत्तर: डॉक्टर सबसे पहले महिला की पुरानी मेडिकल रिपोर्ट, अल्ट्रासाउंड, प्रेग्नेंसी के हफ्ते, बच्चे की स्थिति और उसकी हार्टबीट चेक करते हैं।

Q4: क्या ऑपरेशन से ठीक पहले भी अल्ट्रासाउंड किया जा सकता है?

उत्तर: हां, अगर बच्चे की पोजिशन (जैसे ब्रीच प्रेजेंटेशन), प्लेसेंटा या स्थिति को लेकर संशय हो, तो ऑपरेशन से ठीक पहले अल्ट्रासाउंड किया जाता है।

Q5: बच्चे की धड़कन जांचने के लिए डॉक्टर किन तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं?

उत्तर: बच्चे की धड़कन जांचने के लिए डॉक्टर डॉप्लर, इलेक्ट्रॉनिक फिटल मॉनिटरिंग या आवश्यकतानुसार सीटीजी (CTG) मॉनिटरिंग का इस्तेमाल करते हैं।