बिलासपुर। आम जनता के लिए बने सामुदायिक भवन को पैतृक संपत्ति बताकर ढहाने का गंभीर मामला सामने आया है। यहां सिटी मजिस्ट्रेट ने मालिकाना हक के दस्तावेज जांचे बिना भवन तोड़ने का आदेश जारी कर दिया। जब तक लोगों को भवन के सरकारी होने का पता चला, आधे से ज्यादा हिस्सा ढह चुका था।

हाउसिंग बोर्ड ने बनवाया था भवन

नेहरू नगर में हाउसिंग बोर्ड ने सार्वजनिक उपयोग के लिए सामुदायिक भवन बनवाया था। जबकि मोहम्मद अली नामक शख्स ने इसे अपना निजी मकान बताकर ढहाने के लिए सिटी मजिस्ट्रेट रजनी भगत के सामने आवेदन लगाया।

बिना जांच के दी रिपोर्ट, दे दिया आदेश

सिटी मजिस्ट्रेट ने तहसीलदार और पटवारी से रिपोर्ट मांगी। राजस्व अमले ने रिपोर्ट में सिर्फ लिखा कि भवन जर्जर है, खिड़की-दरवाजे नहीं हैं और यहां नशे का अड्डा बन गया है। लेकिन मालिकाना हक के दस्तावेज नहीं जांचे। इसी अधूरी रिपोर्ट पर मजिस्ट्रेट ने BNSS की धारा 152 के तहत भवन तोड़ने का सशर्त आदेश दे दिया।

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पार्षद ने पकड़ी गड़बड़ी

आदेश मिलते ही तोड़फोड़ शुरू हो गई। वार्ड पार्षद कार्तिक यादव की नजर पड़ी तो उन्होंने हाउसिंग बोर्ड को सूचना दी। अधिकारी मौके पर पहुंचे और तोड़फोड़ रुकवाई, लेकिन तब तक 50% से ज्यादा हिस्सा टूट चुका था। आरोपी खिड़की-दरवाजे तक निकाल ले गया। मौके पर मलबा और लोहे की छड़ों का ढेर लगा है।

80 साल पुराना मकान बताकर गुमराह किया

आरोपी ने सिटी मजिस्ट्रेट के कोर्ट में दावा किया था कि कुदुदंड के खसरा नंबर 362/73, रकबा 0.169 हेक्टेयर पर उसका 80 साल पुराना मकान है। मुख्य मार्ग पर होने से स्कूली बच्चे और राहगीर गुजरते हैं। जर्जर होने के कारण कभी भी गिर सकता है।

आरोपी के खिलाफ FIR दर्ज

सरकारी बिल्डिंग को पैतृक बताने वाले कुदुदंड निवासी मोहम्मद अली के खिलाफ सिविल लाइन थाने में FIR दर्ज हुई है। हाउसिंग बोर्ड के सब-इंजीनियर सन्नी घोरे की शिकायत पर शासकीय संपत्ति को नुकसान और धोखाधड़ी का केस बना है।

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मजिस्ट्रेट पहले भी विवादों में

इस मामले में आदेश देने वाली सिटी मजिस्ट्रेट रजनी भगत पहले भी विवादों में रही हैं। अधिवक्ता संघ ने उन पर आरोप लगाया था कि वह स्टाफ के जरिए प्रतिबंधात्मक धाराओं में जमानत के एवज में प्रति व्यक्ति 5 हजार रुपए रिश्वत मांगती हैं। पैसे देने वालों को जमानत मिलती है, बाकी को दस्तावेज पूरे होने पर भी जेल भेज दिया जाता है। वकीलों ने उग्र प्रदर्शन भी किया था।

बिलासपुर में सामने आया यह मामला केवल एक भवन का नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता का है। यदि सरकारी रिकॉर्ड, स्वामित्व सत्यापन और विभागीय अनुमति जैसी मूलभूत प्रक्रियाएं ही नजरअंदाज होने लगें, तो सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है।