Chhattisgarh High Court Defines Powers Of Commissions
Chhattisgarh High Court Defines Powers Of Commissions

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य के वैधानिक आयोगों की शक्तियों की सीमा को लेकर फिर से आगाह किया है। कोर्ट ने दो अलग-अलग मामलों में महिला आयोग और पिछड़ा वर्ग आयोग दोनों को दो टूक कहा – आप सलाह दे सकते हैं, सिफारिश कर सकते हैं, लेकिन कोर्ट बनकर फैसले नहीं सुना सकते।

कोर्ट ने राज्य महिला आयोग की शक्तियों पर बड़ी टिप्पणी की है। गैस पाइपलाइन के लिए जमीन उपयोग और मुआवजे के विवाद में आयोग के 3 आदेशों को कोर्ट ने सिरे से निरस्त कर दिया। हाईकोर्ट ने दो टूक कहा – महिला आयोग सलाहकारी और सिफारिशी संस्था है, कोर्ट नहीं। वह जमीन अधिग्रहण या मुआवजा तय करने का अधिकार नहीं रखता।

महिला आयोग का क्या है मामला..?

दरअसल गैस अथॉरिटी ऑफ इंडिया (GAIL) की रायपुर-भाठागांव पाइपलाइन के लिए जमीन उपयोग और मुआवजे का विवाद था। GAIL का कहना था कि अधिग्रहण और मुआवजा तय हो चुका है। इसके बावजूद महिला आयोग ने मुआवजा बढ़ाने, भुगतान करने, पाइपलाइन बिछाने का काम रोकने और GAIL के GM सुरेश बाबू व ज्वाइंट कलेक्टर रितु हेमनानी पर आपराधिक-दीवानी कार्रवाई की चेतावनी दे दी।

गेल का कहना था कि जमीन के उपयोग का अधिग्रहण संबंधी कार्य पूरा हो चुका है और मुआवजे की राशि भी निर्धारित की जा चुकी है। इसके बावजूद महिला आयोग ने मामले में हस्तक्षेप करते हुए मुआवजा बढ़ाने और उसका भुगतान करने के निर्देश जारी किए।

कार्रवाई की चेतावनी दी थी महिला आयोग ने

महिला आयोग ने गेल के अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक और दीवानी कार्रवाई शुरू करने की बात भी कही थी। साथ ही गैस पाइपलाइन बिछाने का काम रोकने के निर्देश दिए गए थे।

कोर्ट का फैसला?

हाईकोर्ट ने इन आदेशों को निरस्त करते हुए कहा कि महिला आयोग मूल रूप से सलाहकारी और सिफारिश करने वाली संस्था है। वह भूमि अधिग्रहण, मुआवजे की राशि अथवा निजी पक्षों के अधिकारों का न्यायिक निर्धारण नहीं कर सकता।

न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की बेंच ने 19 जून 2025, 6 जुलाई 2026 और 8 जुलाई 2026 के तीनों आदेश रद्द किए।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णय का भी उल्लेख किया, जिसके अनुसार महिला आयोग महिलाओं की शिकायतों के मामले में उचित कार्रवाई की मांग या सिफारिश कर सकता है, लेकिन वह पक्षकारों के कानूनी अधिकारों का अंतिम निर्धारण नहीं कर सकता।

पिछड़ा वर्ग आयोग ने की मुआवजा वसूलने की सिफारिश

मामला दुष्यंत प्रकाश नाग बनाम छत्तीसगढ़ राज्य से संबंधित है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की युगलपीठ ने मामले में एकलपीठ के आदेश को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी।

मामले के अनुसार दुष्यंत प्रकाश नाग ने हार्वेस्टर खरीदने के लिए 31 जुलाई 2020 को 30 हजार रुपये एडवांस दिए थे। इसके बाद 9 सितंबर 2020 को 20.70 लाख रुपये की शेष राशि का भुगतान किया गया।

दुष्यंत का आरोप था कि भुगतान के बावजूद उन्हें हार्वेस्टर नहीं दिया गया। मामले में पिछड़ा वर्ग आयोग ने संबंधित डीलर कमला मोटर्स के संचालक से मुआवजे की राशि वसूलने की सिफारिश की थी।

सिफारिश को हाई कोर्ट में दी चुनौती

कमला मोटर्स ने आयोग की कार्रवाई को हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट की युगलपीठ ने कहा कि पिछड़ा वर्ग आयोग की भूमिका मूल रूप से सलाहकारी और सिफारिश है। जांच के लिए उसे कुछ शक्तियां दी जा सकती हैं, लेकिन इससे उसे निजी पक्षों के बीच अधिकार और देनदारी तय करने वाली अदालत का दर्जा नहीं मिल जाता।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि किसी आयोग को सिविल कोर्ट जैसी कुछ जांच शक्तियां दिए जाने मात्र से वह सिविल कोर्ट नहीं बन जाता। इस आधार पर हाईकोर्ट ने एकलपीठ के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें आयोग की कार्यवाही को निरस्त किया गया था।

हाई कोर्ट ने इन मामलों के जरिये आयोगों को इस बात का अहसास करा दिया है कि उनकी क्या शक्तियां हैं और किस तरह के मामलों में वे सुनवाई करते हुए सिफारिश कर सकती हैं।

FAQ: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Q1. हाईकोर्ट ने क्या कहा?
A: आयोग सिफारिश कर सकते हैं, अंतिम फैसला नहीं दे सकते।

Q2. महिला आयोग का कौन सा आदेश रद्द हुआ?
A: GAIL पाइपलाइन में मुआवजा बढ़ाने और काम रोकने वाले 3 आदेश।

Q3. पिछड़ा वर्ग आयोग का मामला क्या था?
A: 21 लाख के हार्वेस्टर विवाद में निजी देनदारी तय करने का आदेश।

Q4. कोर्ट ने किस सिद्धांत का हवाला दिया?
A: सिफारिश को अदालत की शक्ति नहीं मिलती, आयोग कोर्ट नहीं बनता।

Q5. फैसले किस बेंच ने दिए?
A: महिला आयोग मामला जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद, पिछड़ा वर्ग मामला चीफ जस्टिस सिन्हा की युगलपीठ।