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जंगल बचाने के नाम पर 22 करोड़ का खेल: मौके पर न तार मिले, न गड्ढा; मलाई खा गए अफसर, 3.5 लाख का वसूली का नोटिस रिटायर्ड कर्मचारी को?

Forest department ANR fund scam investigation in Mahasamund Chhattisgarh
तस्वीर: The Rural Press फाइल / सौजन्य
खास बातें (Key Highlights)
  • Mahasamund Forest Department ANR Fund Scam: छत्तीसगढ़ के महासमुंद वनमंडल में जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगे पौधों की सुरक्षा के नाम पर करोड़ों रुपए की गड़बड़ी का मामला सामने आया है।
  • करीब 22 करोड़ रुपए की इस गड़बड़ी का खुलासा तब हुआ, जब पूरे काम का भुगतान होने की जानकारी मुख्यालय तक पहुंची।
  • अब इस मामले में बड़े स्तर पर जिम्मेदारी तय होने के बजाय निचले स्तर के कर्मचारियों को वसूली के नोटिस दिए जाने का विवाद खड़ा हो गया है।
  • रिटायर्ड कर्मचारी को नोटिस मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले साल सेवानिवृत्त हो चुके एक डिप्टी रेंजर को भी साढ़े तीन लाख रुपए की वसूली का नोटिस भेज दिया गया।

Mahasamund Forest Department ANR Fund Scam: छत्तीसगढ़ के महासमुंद वनमंडल में जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगे पौधों की सुरक्षा के नाम पर करोड़ों रुपए की गड़बड़ी का मामला सामने आया है। वर्ष 2024-25 में ANR (Assisted Natural Regeneration) फंड से कराए गए कामों में कागजों पर गड्ढे खोदने, पौधों के आसपास सुरक्षा घेरा बनाने और फेंसिंग लगाने का दावा किया गया, लेकिन मौके पर न तार मिले और न ही काम शुरू करने की सामग्री।

करीब 22 करोड़ रुपए की इस गड़बड़ी का खुलासा तब हुआ, जब पूरे काम का भुगतान होने की जानकारी मुख्यालय तक पहुंची। अब इस मामले में बड़े स्तर पर जिम्मेदारी तय होने के बजाय निचले स्तर के कर्मचारियों को वसूली के नोटिस दिए जाने का विवाद खड़ा हो गया है।

रिटायर्ड कर्मचारी को नोटिस

मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले साल सेवानिवृत्त हो चुके एक डिप्टी रेंजर को भी साढ़े तीन लाख रुपए की वसूली का नोटिस भेज दिया गया। जबकि फील्ड में तैनात डिप्टी रेंजर, वनरक्षक और चौकीदार जैसे कर्मचारियों के पास खरीदी, टेंडर और वित्तीय स्वीकृति का अधिकार नहीं होता। इनका काम मैदानी स्तर पर होता है, जबकि खरीद और भुगतान की प्रक्रिया जिला स्तर के अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में आती है।

जांच में जंगल से गायब मिले सुरक्षा के इंतजाम

जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगे पौधों को सुरक्षित रखने के लिए वन विभाग को हर साल ANR फंड से करोड़ों रुपए का बजट मिलता है। महासमुंद वनमंडल में इसी मद से मिले बजट के इस्तेमाल पर सवाल उठे हैं। करीब तीन महीने पहले मामला सामने आने के बाद वन विभाग के मुख्यालय ने दो स्तर पर जांच कराई। पहली जांच के लिए महिला एपीसीसीएफ को महासमुंद भेजा गया। उन्होंने उन स्थानों का निरीक्षण किया, जहां कागजों में काम पूरा होने का दावा किया गया था। मैदानी निरीक्षण के दौरान वहां फेंसिंग का तार नहीं मिला। गड्ढे खोदने और सुरक्षा घेरा बनाने के काम के भी निशान नहीं थे। यहां तक कि काम शुरू करने के लिए जरूरी बुनियादी सामग्री भी मौके पर मौजूद नहीं थी। इससे कागजों में किए गए दावों और वास्तविक स्थिति के बीच बड़ा अंतर सामने आया।

दूसरी जांच से पहले शुरू हुई लीपापोती की कोशिश

प्रारंभिक जांच में गड़बड़ी के संकेत मिलने के बाद पीसीसीएफ कौशलेंद्र कुमार के नेतृत्व में दूसरी उच्चस्तरीय जांच कमेटी बनाई गई। आरोप है कि इस टीम के महासमुंद पहुंचने से पहले ही कुछ स्थानों पर आनन-फानन में झाड़ियों की सफाई और कटाई शुरू करवा दी गई। हालांकि, इसके बावजूद जांच में अनियमितताओं की परतें सामने आती रहीं। दूसरी जांच रिपोर्ट में भी करोड़ों रुपए की गड़बड़ी के संकेत मिले। रिपोर्ट पीसीसीएफ कार्यालय में पेश होने के बाद आगे की कार्रवाई के लिए सीसीएफ रायपुर तक पहुंची।

बड़े अधिकारियों के बजाय छोटे कर्मचारियों को वसूली के नोटिस

जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद अब इस मामले में जिम्मेदारी तय करने को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। विभागीय व्यवस्था के मुताबिक खरीदी, टेंडर और वित्तीय स्वीकृति की जिम्मेदारी जिला स्तर पर डीएफओ और एसडीओ की होती है। दूसरी ओर, फील्ड में काम करने वाले डिप्टी रेंजर, वनरक्षक और चौकीदार के पास इन वित्तीय फैसलों का अधिकार नहीं होता। इसके बावजूद महासमुंद के डीएफओ की ओर से निचले स्तर के कर्मचारियों को वसूली के नोटिस जारी किए गए। कर्मचारियों के पद के हिसाब से वसूली की रकम तय किए जाने की बात भी सामने आई है। सबसे चौंकाने वाला मामला एक ऐसे डिप्टी रेंजर का है, जो पिछले साल ही सेवानिवृत्त हो चुके हैं। उन्हें भी साढ़े तीन लाख रुपए जमा करने का नोटिस दिया गया है।

विरोध बढ़ा तो नोटिस सार्वजनिक नहीं करने का आदेश

वसूली के नोटिस मिलने के बाद मैदानी कर्मचारियों में विरोध बढ़ने लगा। इसके बाद आनन-फानन में ऐसे आदेश जारी किए गए कि वसूली के नोटिस सार्वजनिक नहीं किए जाएं। इससे कर्मचारियों के बीच असमंजस और बढ़ गया। वे कार्रवाई के डर से खुलकर सामने आने से बच रहे हैं। सवाल यह है कि जब खरीदी और भुगतान की जिम्मेदारी उच्च स्तर के अधिकारियों के पास थी, तो कथित गड़बड़ी की पूरी जवाबदेही निचले स्तर के कर्मचारियों पर कैसे तय की जा रही है?

तत्कालीन डीएफओ बोले- 22 नहीं, 12 करोड़ का मामला

महासमुंद के तत्कालीन डीएफओ पंकज राजपूत ने इस मामले में 22 करोड़ रुपए की गड़बड़ी के दावे पर अलग आंकड़ा बताया। उनका कहना है कि यह ANR फंड से जुड़ा मामला है और उन्होंने विभाग को अपना जवाब दे दिया है। उनके मुताबिक, मामला 12 करोड़ रुपए का था। जांच के बारे में उन्होंने कुछ भी कहने से इनकार किया। कर्मचारियों से वसूली के सवाल पर उन्होंने कहा कि वे कर्मचारियों के साथ हैं और उनके साथ खड़े रहेंगे। वहीं, वसूली के नोटिस जारी करने के सवाल पर उन्होंने फिलहाल टिप्पणी नहीं की। उनका कहना है कि मामले की नए सिरे से जांच की जा रही है।

Rverma
लेखक / पत्रकार:

Rverma

विशेष संवाददाता (Special Correspondent)

वरिष्ठ न्यूज़ रिपोर्टर, The Rural Press

The Rural Press के लिए निष्पक्ष और निर्भीक रिपोर्टिंग।

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