Congress launches signature campaign: जिला कांग्रेस कमेटी ने जेलों में बंद आदिवासियों की रिहाई की मांग को लेकर हस्ताक्षर अभियान की शुरुआत की है। जिला कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष हरीश कवासी लखमा ने कोंटा जनपद क्षेत्र के ग्राम पंचायत मिलमपल्ली के आश्रित ग्राम तिम्मापुरम से इस अभियान का शुभारंभ किया।
सर्व आदिवासी समाज के प्रदेश उपाध्यक्ष बेको हूंगा ने कहा कि नक्सल मामलों में बंद आदिवासियों के प्रकरणों की निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए। निर्दोष पाए जाने वाले व्यक्तियों को शीघ्र न्याय और रिहाई मिलनी चाहिए, ताकि उनके परिवारों को हो रही आर्थिक व सामाजिक समस्याओं से राहत मिल सके।
‘गंभीर आरोप सिद्ध नहीं तो रिहाई हो’
जिला कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष ने कहा — जिन आदिवासियों के विरुद्ध गंभीर आरोप सिद्ध नहीं हुए हैं, उनके मामलों की समीक्षा कर उन्हें रिहा किया जाना चाहिए। उन्होंने घोषणा की कि यह हस्ताक्षर अभियान विभिन्न गांवों में आयोजित कर जनसमर्थन जुटाया जाएगा तथा इस मुद्दे को शासन के समक्ष उठाया जाएगा।
गांव-गांव चलेगा अभियान
आयोजकों के अनुसार तिम्मापुरम से शुरू किया गया यह अभियान जिले के अन्य गांवों में भी चलाया जाएगा और हस्ताक्षरों के माध्यम से मांग पत्र शासन को सौंपा जाएगा।

बस्तर की जेलों में 1200 से अधिक नक्सल बंदी
माओवादियों के साथ संगठन में काम करने के दौरान गिरफ्तार किए गए सैकड़ों नक्सल बंदी वर्तमान में बस्तर की जेलों में निरूद्ध हैं। इनमें अधिकांश बंदी केन्द्र सरकार के नक्सलमुक्त भारत के अभियान शुरू करने से पहले गिरफ्तार किए गए थे।
उधर समर्पण इधर रिहाई का इंतजार
एक ओर जहां हजारों की संख्या में शीर्ष नक्सल नेता व संगठन में विभिन्न कैडर के नक्सलियों ने समर्पण कर दिया और अब आजादी की सांस ले रहे हैं तो दूसरी ओर इनके ही साथी जिन्हें सुरक्षाबलों ने समर्पण के पहले गिरफ्तार किया था और जिनकी संख्या 12 सौ से अधिक है, वे जेल की सलाखों के पीछे कैद हैं। इन्हें आजादी की सांस लेने अपनी बारी का इंतजार करना पड़ेगा क्योंकि वे न्यायिक हिरासत में हैं। इनमें ज्यादातर विचाराधीन हैं।
नक्सल मामलो के बंदियों का जेलवार आंकड़ा
आकंड़ों की बात करें तो सर्वाधिक नक्सल मामले में बंदी सेंट्रल जेल जगदलपुर में निरूद्ध हैं। इनमें बस्तर एवं कोंडागांव जिले के 425 पुरुष व 98 महिला समेत कुल 523 विचाराधीन बंदी हैं। जबकि नक्सल मामले में 24 सजायाफ्ता बंदी भी जगदलपुर की सेंट्रल जेल में हैं। इनमें से कुछ को न्यायालय से आजीवन कारावास की सजा मिली है। इसके अलावा जिला जेल कांकेर के 41 पुरुष व 3 महिला बंदी, जिला जेल दंतेवाड़ा के 289 पुरुष बंदी, जिला जेल सुकमा के 172 पुरुष बंदी, उप जेल नारायणपुर के 68 पुरुष बंदी तथा उप जेल बीजापुर के 132 पुरुष बंदी समेत कुल 1252 सजायाफ्ता व विचाराधीन बंदी सेंट्रल जेल में निरूद्ध हैं।
रिहाई संभव नहीं है: एसपी शलभ कुमार
बस्तर एसपी शलभ कुमार सिन्हा के मुताबिक जेल में निरुद्ध बंदियों के संबंध में शासन की ओर से कोई अधिकारिक आदेश नहीं आया है। आगे जैसा निर्देश मिलेगा उस पर कार्रवाई करेंगे। नक्सल मामलों में जेल में निरुद्ध बंदियों की रिहाई के सवाल पर उन्होंने कहा कि जहां तक रिहाई की बात है, वो संभव नहीं है। सभी पर संगीन धाराओं के साथ यूएपीए एक्ट भी लगा हुआ है और सभी ज्यूडिशियल कस्टडी में हैं। ऐसे में न्यायालय के आदेश पर ही सब संभव है। उन्होंने कहा कि शासन स्तर पर विचाराधीन बंदियों की रिहाई का प्रयास हो रहा है। इसके लिए कानूनन सभी से राय लेकर निर्णय लेना पड़ेगा।
FAQ: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सवाल 1. अभियान किसने और कहां से शुरू किया?
जवाब: सुकमा जिला कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष हरीश कवासी लखमा ने कोंटा जनपद के मिलमपल्ली पंचायत के आश्रित ग्राम तिम्मापुरम से शुरू किया।
सवाल 2. मांग क्या है?
जवाब: नक्सल मामलों में जेल में बंद आदिवासियों के प्रकरणों की निष्पक्ष समीक्षा और निर्दोष पाए जाने वालों की शीघ्र रिहाई।
सवाल 3. बेको हूंगा ने क्या कहा?
जवाब: सर्व आदिवासी समाज के प्रदेश उपाध्यक्ष बेको हूंगा ने कहा — निर्दोषों को न्याय और रिहाई मिलनी चाहिए ताकि परिवारों की आर्थिक-सामाजिक समस्याएं दूर हो।
सवाल 4. अभियान आगे कैसे चलेगा?
जवाब: यह अभियान जिले के अन्य गांवों में भी चलाया जाएगा, जनसमर्थन जुटाकर हस्ताक्षरित मांग पत्र शासन को सौंपा जाएगा।
सवाल 5. कांग्रेस का तर्क क्या है?
जवाब: जिन आदिवासियों पर गंभीर आरोप सिद्ध नहीं हुए, उनके मामलों की समीक्षा कर रिहा किया जाना चाहिए।



