वन संरक्षण कानून में संशोधन मसौदा तैयार करने का ठेका कॉर्पोरेट कंपनियों को : किसान सभा ने किया विरोध
वन संरक्षण कानून में संशोधन मसौदा तैयार करने का ठेका कॉर्पोरेट कंपनियों को : किसान सभा ने किया विरोध

रायपुर। छत्तीसगढ़ किसान सभा ने केंद्र की मोदी सरकार द्वारा भारतीय वन कानून, 1927 में संशोधन मसौदा तैयार करने का ठेका कॉर्पोरेट कंपनियों को देने के लिए ‘रूचि की अभिव्यक्ति’ आमंत्रित करने की तीखी आलोचना करते हुए इसका विरोध किया है। किसान सभा ने कहा है कि अब यह सरकार के निजीकरण की शुरूआत है, जो कानून बनाने का काम भी कॉर्पोरेट कंपनियों को सौंप रही है।

क्या है इस EOI में..?

केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन तथा जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने इस रूचि की अभिव्यक्ति का आमंत्रण 22 जून को जारी किया, और इसकी अंतिम तिथि 02 जुलाई थी। इसके तहत भारतीय वन कानून, 1927 में किस तरह के संशोधन किये जायें, इसको लेकर EOI मंगाए गए थे। आज यहां जारी एक बयान में छत्तीसगढ़ किसान सभा के अध्यक्ष संजय पराते तथा महासचिव ऋषि गुप्ता ने कहा है कि वन और वन संपदा के उपयोग का मामला भारतीय संविधान की समवर्ती सूची का हिस्सा है और यह राज्य के अधिकार क्षेत्र का मामला है। राज्य की स्वीकृति के बिना केंद्र सरकार वन भूमि का अन्य प्रयोजनों के लिए उपयोग तक नहीं कर सकती। इसलिए राज्यों से सलाह-मशविरा किये बिना इस विषय पर कोई भी कानून बनाना संघवाद के खिलाफ होगा।

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किसान सभा नेताओं ने कहा कि जिस कॉर्पोरेट क्षेत्र की बुरी नजर इस देश के जल, जंगल, जमीन, खनिज व अन्य प्राकृतिक संपदा पर गड़ी हुई है, उसे ही कानून बनाने के लिए कहा जा रहा है। यह चोरों को ही चौकीदारी का जिम्मा देने के समान है। मोदी सरकार के इस कदम से वन संरक्षण, वनों में रहने वाले समुदायों की आजीविका और उनके अधिकार, जैव-विविधता आदि सभी खतरे में पड़ गए हैं और वास्तव में यह वन संरक्षण कानून को कमजोर करने और राज्यों के अधिकार हड़पने के लिए किया जा रहा है।

छत्तीसगढ़ किसान सभा ने कहा है कि किसी कानून का मसौदा तैयार करना राज्य का संप्रभु और सार्वभौमिक अधिकार है और यह काम किसी कॉर्पोरेट कंपनी को नहीं सौंपा जा सकता, इसलिए मोदी सरकार अपनी ‘रूचि की अभिव्यक्ति’ के आमंत्रण को तुरंत वापस लें।

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