शुक्र है कवर्धा में कबीर अभी जिंदा हैं….

उचित शर्मा

संत कबीर की कर्मस्थली कवर्धा यानि कबीरधाम छत्तीसगढ़ ही नहीं देश और विदेशों में संत कबीर के नाम से पहचानी जाती है, इसी कवर्धा में बीते 3 अक्टूबर को जो कुछ हुआ उसे देखकर सचमुच कबीर रोए बिना ना रहे होंगे। छत्तीसगढ़ की इसी धरती पर संत कबीर हिन्दू धर्म व इस्लाम को न मानते हुए धर्म एक सर्वोच्च ईश्वर में विश्वास का पाठ विश्व को पढ़ाया, उन्होंने सामाज में फैली कुरीतियों की निंदा की और सामाजिक बुराइयों की कड़ी आलोचना करते रहे। उसी धरती पर दो अलग अलग समुदाय के युवक अपना धार्मिक झंडा लगाने के मुद्दे पर भिड़ गए। कबीर की सीख भुला दी गई,उस पर राजनीति करने वालों ने तो आग में घी डालने में देर नहीं दिखाई और कबीर की नगरी सात दिनों तक जातिगत तनाव में झुलसती रही।

कवर्धा में पनपे धार्मिक तनाव के पीछे छिपे मुददों पर भी गौर किया जाना जरूरी जिसने शांति का टापू कह जाने वाले छत्तीसगढ़ को सुर्खियों पर ला दिया। दरअसल नवरात्रि और मुस्लिम नव वर्ष की तैयारी के दौरान 3 अक्टूबर को कवर्धा के लोहारा नाका चौक पर भिन्न-भिन्न समुदाय के युवक अपना धार्मिक झंडा लगाने के मुद्दे पर भिड़ गए। बात इतनी बढ़ी कि एक पक्ष के लोगों ने दूसरे पक्ष के युवक की जमकर पिटाई कर दी। इस विवाद ने सांप्रदायिक रूप से लिया और दोनों समुदाय आमने-सामने आ गए। इस दौरान पत्थरबाजी और तोड़फोड़ की घटना हुई। हालात इस कदर बिगड़े कि जिले में धारा 144 लागू कर दी और बाद में शहर में कर्फ्यू लगा दिया।

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बात यहीं खत्म हो जाती हो इस ला एंड आर्डर का मामला माना जा सकता था, मगर जब तक जिला प्रशासन जागता बहुत देर हो चुकी थी, आग की तरह फैली इस खबर ने राजनीतिकजीवी को सक्रिय कर दिया और कथित बाहरी लोगों ने कवर्धा में आकर इस तनाव को और भड़का दिया, अगर ये सब सच है तो जिला प्रशासन क्या कर रहा था, इस पर गौर किए बिना कवर्धा की घटना को नहीं समझा सकता। बाद में 3 अक्टूबर से अब तक सिटी कोतवाली में 7 अलग-अलग एफआईआर में कुल 93 लोगों की गिरफ्तारी हुई। शांति समिति की बैठक भी हुई.. क्या ये पहले नहीं हो सकती थी?

कवर्धा की घटना ने साबित कर दिया कि अगर जिला प्रशासन अपनी जवाबदेही पूरा करने में देर नहीं करता तो इस घटना को उसी दिन रोका जा सकता था जिस दिन ये घटना हुई थी। ये तो शुक्र है कि कवर्धा के शांतिप्रिय लोग अब भी संत कबीर में जीते हैं, घटना के बाद शांति के प्रयास में मुस्लिम जमात के लोगों जिस तरह से दुर्गा पंडालों में तोरण लगाने पहुंचे और जिस तरीके से हिन्दू समाज ने उनका स्वागत किया उसे संत कबीर की वाणी से ही समझा जा सकता है…

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कबिरा खड़ा बाजार में सबकी मांगे खैर…ना कॉहू से दोस्ती ना कॉहू से बैर।

कुल जमाबात ये है कि जिस मुददे को प्रशासन नहीं सुलझा सका उसे कवर्धा की जनता ने भाईचारे का संदेश देकर खुद ही सुलझा लिया। शुक्र है कवर्धा में कबीर अभी जिंदा हैं..

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रंजना वर्मा पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया से जुड़ी अनुभवी न्यूज राइटर हैं। उन्होंने देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर से मास्टर ऑफ मास कम्युनिकेशन की शिक्षा प्राप्त की है। रायपुर के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम करते हुए उन्होंने छत्तीसगढ़ और देश से जुड़े समसामयिक मुद्दों के साथ राजनीति, शिक्षा, सरकारी योजनाओं, कारोबार, तकनीक और लाइफस्टाइल जैसे विषयों पर लेखन किया है। समाचार लेखन के साथ SEO आधारित कंटेंट तैयार करने में भी उनकी अच्छी पकड़ है। सरल भाषा में तथ्यों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना और पाठकों तक विश्वसनीय जानकारी पहुंचाना उनकी लेखन शैली की प्रमुख विशेषता है।