Global Food Crisis: ऊर्जा संकट के बीच अब वैश्विक रूप से खाने पीने की चीजों पर संकट मंडरा रहा है। आने वाले समय में खाद्य संकट की आशंका भी जताई जा रही है। ऐसा हम नहीं कह रहे हैं। खुद केंद्र सरकार के मंत्री एस जयशंकर ने इसकी आशंका जताई है। वहीं, इस संकट की वजह से करोड़ों लोग भुखमरी का भी शिकार हो सकते हैं।
दरअसल, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने एशिया सोसाइटी के कार्यक्रम में कहा कि अनाज की आपूर्ति, उर्वरक उपलब्धता और बदलते मौसम की स्थितियां एक साथ वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर दबाव बढ़ा रही हैं। उनका कहना था कि काला सागर क्षेत्र से अनाज की आपूर्ति में बाधा, पश्चिम एशिया और रूस में उर्वरक उत्पादन पर असर और मजबूत होते अल नीनो से हालात और चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। इस पर उन्होंने यह भी कहा कि देशों को अपने फैसलों के वैश्विक असर को ध्यान में रखना चाहिए। उनके मुताबिक, खाद्य सुरक्षा जैसी चुनौती से निपटने के लिए देशों के बीच सहयोग जरूरी है।
बड़े निर्यातकों का खाद्यान्न नहीं पहुंच रहा
जयशंकर ने कहा कि दुनिया ऐसी स्थिति देख रही है जहां कुछ बड़े अनाज निर्यातक अपना खाद्यान्न बाजार तक नहीं पहुंचा पाएंगे, खासकर काला सागर के रास्ते। साथ ही उर्वरक का जिक्र करते हुए कहा कि पश्चिम एशिया और रूस में उर्वरक उत्पादन प्रभावित होने का असर वैश्विक कृषि पर पड़ सकता है। वहीं, मजबूत होते अल नीनो के असर को देखते हुए इन सभी परिस्थितियों को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता।
जानिए, आखिर काला सागर क्यों है अहम
विश्व में रूस और यूक्रेन दुनिया के प्रमुख कृषि निर्यातकों में शामिल हैं। वहीं, काला सागर क्षेत्र में संघर्ष और परिवहन व्यवस्था में बाधा का असर अंतरराष्ट्रीय अनाज बाजार पर पड़ सकता है। गेहूं और दूसरे अनाज की वैश्विक आपूर्ति में इस क्षेत्र की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। ऐसे में बंदरगाहों, शिपिंग और निर्यात मार्गों में व्यवधान से आयात पर निर्भर देशों के लिए लागत और उपलब्धता दोनों प्रभावित हो सकती हैं। यही वजह है कि जयशंकर ने काला सागर से खाद्यान्न की आपूर्ति को लेकर चिंता जताई है। मौजूदा भू-राजनीतिक तनाव के बीच वैश्विक खाद्य आपूर्ति पहले से ही दबाव में है।
इसलिए बढ़ेगी उर्वरक संकट से मुश्किलें?
अनाज का उत्पादन सिर्फ जमीन और पानी पर निर्भर नहीं है। किसानों के लिए यूरिया, फॉस्फेट और दूसरे उर्वरक भी महत्वपूर्ण हैं। इनके उत्पादन और अंतरराष्ट्रीय परिवहन में बाधा आने पर खेती की लागत बढ़ सकती है और कुछ क्षेत्रों में उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। भारत सरकार ने 2026 में पश्चिम एशिया में समुद्री परिवहन से जुड़ी बाधाओं के बीच उर्वरक आपूर्ति बनाए रखने के लिए कदम उठाए हैं। रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के अनुसार, 15 उर्वरक और कच्चा माल ले जाने वाले जहाज होर्मुज स्ट्रेट से सुरक्षित होकर भारत पहुंचे और सरकार ने दूसरे देशों से भी आपूर्ति सुनिश्चित करने की कोशिश की।
अल नीनो के असर की भी चिंता
खाद्य संकट की तीसरी बड़ी कड़ी मौसम है। विश्व मौसम संगठन यानी WMO के मुताबिक 2026 में अल नीनो विकसित हो चुका है और इसके आने वाले महीनों में मजबूत होने का अनुमान है। इससे दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में गर्मी, सूखा, भारी बारिश और दूसरे चरम मौसम की घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है। यह आमतौर पर नवंबर से फरवरी के बीच चरम पर पहुंचता है। इसके प्रभाव अलग-अलग क्षेत्रों में अलग हो सकते हैं। कुछ जगहों पर बारिश बढ़ सकती है, जबकि दूसरे इलाकों में सूखे का खतरा बढ़ सकता है।
अल नीनो का खाद्य सुरक्षा पर समझें असर
अल नीनो का असर बारिश और तापमान के पैटर्न पर पड़ता है। इससे खेती प्रभावित होने की स्थिति बन सकती है। WFP के मुताबिक मौजूदा अल नीनो 2026 में मजबूत होने और 2027 तक असर डालने की आशंका है। संगठन के विश्लेषण के अनुसार, 45 देशों में 2027 के अंत तक 27.4 करोड़ लोग गंभीर खाद्य असुरक्षा की स्थिति में हो सकते हैं। यह संख्या मौजूदा अनुमान से करीब 4.9 करोड़ अधिक है। इसका अर्थ यह नहीं है कि इतने लोग निश्चित रूप से भुखमरी के शिकार होंगे। यह खाद्य असुरक्षा का पूर्वानुमान है और वास्तविक असर मौसम, फसल उत्पादन, कीमतों, सरकारी नीतियों और मानवीय सहायता जैसे कई कारकों पर निर्भर करेगा।
भारत के लिए क्या चुनौती है?
भारत के लिए अल नीनो की चुनौती केवल मौसम तक सीमित नहीं है। अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उर्वरक या ऊर्जा की आपूर्ति प्रभावित होती है, तो कृषि लागत पर दबाव बढ़ सकता है। वहीं, वैश्विक अनाज बाजार में आपूर्ति बाधित होने पर आयात करने वाले देशों की लागत बढ़ने का जोखिम रहता है। भारत सरकार ने भी 2026-27 के लिए खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य पिछले अनुमानित उत्पादन से कम रखा है। कृषि मंत्रालय के अनुसार 2026-27 के लिए 37.393 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है, जबकि 2025-26 का अनुमानित उत्पादन 37.656 करोड़ टन है। सरकार ने साथ ही बताया कि रबी सीजन के लिए शुरुआती उर्वरक स्टॉक 163 लाख मीट्रिक टन है।
क्या खाने-पीने की चीजें महंगी होंगी?
वैश्विक खाद्य कीमतों पर तीन चीजों का सीधा असर पड़ सकता है-उत्पादन, परिवहन और इनपुट लागत। यदि किसी बड़े उत्पादक देश में फसल प्रभावित होती है या किसी महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग में लंबे समय तक बाधा रहती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों पर दबाव बन सकता है। लेकिन किसी खास खाद्य वस्तु की कीमत कितनी बढ़ेगी, यह अभी निश्चित तौर पर कहना संभव नहीं है। इसके लिए आने वाले महीनों में फसल उत्पादन, मौसम, व्यापारिक प्रवाह और सरकारी फैसलों की स्थिति देखना जरूरी होगा।
युद्ध खत्म हो और रास्ते खुलें, यही उपाय
अनाज, उर्वरक, ऊर्जा और समुद्री व्यापार की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। भारत के लिए घरेलू खाद्यान्न भंडार, उर्वरक आपूर्ति, मानसून की निगरानी और किसानों के लिए समय पर इनपुट उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण होगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार मार्ग खुले रखना और आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान कम करना भी खाद्य सुरक्षा के लिए अहम रहेगा। फिलहाल दुनिया के सामने तत्काल सवाल यह नहीं है कि खाद्य संकट निश्चित रूप से कितना बड़ा होगा, बल्कि यह है कि मजबूत होते अल नीनो और भू-राजनीतिक तनाव से पैदा होने वाले संभावित जोखिमों के लिए देश कितनी जल्दी तैयारी करते हैं।



