Cancer Drug Price Cap India: कैंसर की महंगी दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण के लिए सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। सरकार की अधिसूचना के मुताबिक, 137 कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन की सीमा अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के 30% तक तय की गई है। इस फैसले के दायरे में 1,000 से अधिक दवा ब्रांड आएंगे। संशोधित कीमतें 9 नवंबर से लागू होनी हैं। हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि मरीजों को वास्तव में कितनी बचत होगी, यह नई व्यवस्था के पालन और अस्पतालों के दूसरे शुल्कों की निगरानी पर निर्भर करेगा।
कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कई दवाएं बेहद महंगी हैं। कुछ दवाओं के एक वायल या पैक की कीमत 5 लाख रुपये तक बताई गई है। ऐसे में ट्रेड मार्जिन पर सीमा लगाने का उद्देश्य दवाओं की वितरण शृंखला में लगने वाले मार्जिन को नियंत्रित करना और मरीजों पर आर्थिक बोझ कम करना है। लेकिन विशेषज्ञों के सामने एक बड़ा सवाल है। क्या दवाओं की कीमतों में संभावित राहत से मरीज का पूरा इलाज सस्ता होगा या अस्पतालों के दूसरे खर्च इस बचत को कम कर सकते हैं?
5 लाख रुपये तक की दवाओं पर भी पड़ेगा असर
इस फैसले के दायरे में कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कई महंगी दवाएं भी शामिल हैं। इनमें पर्टुजुमैब और ट्रास्टुजुमैब का कॉम्बिनेशन, एटेजोलिजुमैब, टेकेलिस्टामैब, इनोटुजुमैब ओजोगामिसिन और डाराटुमुमैब जैसी दवाएं शामिल हैं। इनमें से कुछ दवाओं की कीमत एक वायल या पैक के लिए 5 लाख रुपये तक पहुंचती है। ऐसे में इनकी संशोधित कीमतों का सही तरीके से लागू होना मरीजों के लिए महत्वपूर्ण होगा। इन दवाओं की आपूर्ति का बड़ा हिस्सा सीधे अस्पतालों को होता है। इसलिए अस्पतालों की भी जिम्मेदारी होगी कि मरीजों से निर्धारित कीमत के अनुसार ही शुल्क लिया जाए।
दवाएं सस्ती होने पर भी क्यों नहीं घट सकता पूरा बिल?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि दवाओं पर ट्रेड मार्जिन घटने के बाद कुछ अस्पताल दूसरे मदों में शुल्क बढ़ा सकते हैं। इनमें मेडिकल कंज्यूमेबल्स, जांच और इलाज की प्रक्रियाओं से जुड़े खर्च शामिल हैं।
अगर ऐसा होता है, तो मरीजों को दवाओं की कीमतों में राहत मिलने के बावजूद कुल इलाज खर्च में अपेक्षित कमी नहीं दिख सकती। हालांकि, यह विशेषज्ञों की आशंका है। उपलब्ध जानकारी में ऐसे बदलाव के व्यापक स्तर पर होने की पुष्टि नहीं दी गई है। इसी वजह से विशेषज्ञों का मानना है कि केवल दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण करना पर्याप्त नहीं होगा। अस्पतालों के अन्य शुल्कों पर भी नजर रखनी होगी, ताकि दवाओं से मिलने वाली राहत मरीजों तक पहुंच सके।
30% ट्रेड मार्जिन का मतलब अस्पताल का 30% मुनाफा नहीं
एसोसिएशन ऑफ हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स के महानिदेशक गिरिधर ज्ञानी ने टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में कहा कि फैसले की सफलता दवा कंपनियों, वितरकों और अस्पतालों की ओर से इसे समय पर लागू करने पर निर्भर करेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि 30% ट्रेड मार्जिन को अस्पतालों का 30% मुनाफा नहीं समझना चाहिए। यह मार्जिन पूरी वितरण शृंखला पर लागू होता है। इसलिए यह स्पष्ट होना जरूरी है कि मार्जिन की गणना किस आधार पर होगी और दवाओं की आपूर्ति के अलग-अलग चरणों में यह व्यवस्था कैसे लागू की जाएगी। इससे नियमों को समझने और उनका पालन करने में होने वाला भ्रम दूर किया जा सकेगा।
कैंसर के इलाज पर अस्पतालों की कमाई भी होगी प्रभावित?
कैंसर का इलाज अस्पतालों के लिए राजस्व का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। महंगी दवाओं के साथ जांच और उपचार से जुड़ी सेवाओं के कारण ऑन्कोलॉजी यानी कैंसर उपचार पर खर्च अधिक रहता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, दवाओं पर ट्रेड मार्जिन सीमित होने से अस्पतालों की कमाई पर दबाव पड़ सकता है। ऐसे में इस बदलाव का असर कैंसर उपचार सेवाओं की आर्थिक व्यवहार्यता पर भी नजर रखना होगा। हालांकि, अस्पतालों की कमाई पर कितना असर पड़ेगा और इसका मरीजों को मिलने वाली सेवाओं पर क्या प्रभाव होगा, इस बारे में उपलब्ध जानकारी में कोई निश्चित आंकड़ा नहीं दिया गया है।
स्टेंट की कीमतों पर नियंत्रण का उदाहरण क्यों दिया जा रहा है?
विशेषज्ञों ने वर्ष 2017 में हार्ट में इस्तेमाल होने वाले स्टेंट की कीमतों पर लगाई गई सीमा का उदाहरण दिया है। उस समय स्टेंट की कीमतें नियंत्रित किए जाने के बाद कुछ निजी अस्पतालों ने एंजियोप्लास्टी के पैकेज रेट बढ़ा दिए थे। विशेषज्ञों को आशंका है कि कैंसर की दवाओं पर ट्रेड मार्जिन सीमित करने के बाद भी दूसरे शुल्कों में बदलाव की स्थिति पैदा हो सकती है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि अस्पतालों में ऐसा होना तय है। इस उदाहरण के जरिए विशेषज्ञ यह बताना चाहते हैं कि दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण के साथ इलाज से जुड़े अन्य खर्चों की निगरानी भी जरूरी है।
9 नवंबर से लागू होनी हैं संशोधित कीमतें
सरकार की अधिसूचना के अनुसार, संशोधित कीमतें 9 नवंबर से लागू होनी हैं। इस फैसले का असर 137 कैंसर दवाओं और 1,000 से अधिक ब्रांड पर पड़ेगा। अब अहम सवाल यह है कि नई कीमतों का पालन कितनी प्रभावी तरीके से होता है। साथ ही, यह भी देखना होगा कि दवाओं की कीमतों में होने वाली संभावित बचत मरीजों के कुल इलाज खर्च में कितनी दिखाई देती है।



