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RSS Chief Mohan Bhagwat Vijayadashami: पश्चिम की आंधी से जेन-जी की चिंता तक, नागपुर में क्या बोले भागवत?

RSS Chief Mohan Bhagwat Vijayadashami Speech: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने शताब्दी वर्ष के पावन अवसर पर नागपुर में आयोजित श्री विजयादशमी उत्सव को संबोधित किया। इस पारंपरिक और भव्य उत्सव की शुरुआत स्वयंसेवकों के अनुशासित पथ संचलन के साथ हुई। इस अवसर पर देश के वर्तमान सामाजिक परिवेश, सांस्कृतिक […]

RSS Chief Mohan Bhagwat addressing volunteers during the Vijayadashami celebrations in Nagpur.
तस्वीर: The Rural Press फाइल / सौजन्य

RSS Chief Mohan Bhagwat Vijayadashami Speech: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने शताब्दी वर्ष के पावन अवसर पर नागपुर में आयोजित श्री विजयादशमी उत्सव को संबोधित किया। इस पारंपरिक और भव्य उत्सव की शुरुआत स्वयंसेवकों के अनुशासित पथ संचलन के साथ हुई।

इस अवसर पर देश के वर्तमान सामाजिक परिवेश, सांस्कृतिक मूल्यों और भविष्य की चुनौतियों पर संघ प्रमुख ने खुलकर अपने विचार रखे। उनके इस संबोधन में पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण से लेकर आज की युवा पीढ़ी (जेन-जी) के सामने आ रही गंभीर समस्याओं तक कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर गहरी चिंता और समाधान की बात की गई।

पश्चिम से चल रही सांस्कृतिक आंधी और विरोध-प्रदर्शनों की हकीकत

अपने संबोधन की शुरुआत में मोहन भागवत ने दुनिया भर में और खासतौर पर भारत में चल रहे पश्चिमी सांस्कृतिक प्रभावों पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि पश्चिम से एक वैचारिक और सांस्कृतिक आंधी चल रही है, जिससे समाज को बचकर रहने की आवश्यकता है। फ्रांस और अल्बानिया जैसी जगहों के हालातों का हवाला देते हुए उन्होंने चेताया कि भारत में भी इसी तर्ज पर गलत प्रयास किए जा रहे हैं, जिन्हें कतई स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने राजनीतिक लाभ के लिए होने वाले हिंसक या भ्रामक आंदोलनों पर भी बात की। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल सत्ता बदलने के उद्देश्य से किए जाने वाले विरोध-प्रदर्शन समाज की बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं करते, बल्कि आपसी बंटवारे को बढ़ावा देते हैं।

‘पंच परिवर्तन’ की पांचों पहलों पर जोर

संघ प्रमुख ने समाज के सर्वांगीण विकास के लिए ‘पंच परिवर्तन’ की अवधारणा को रेखांकित किया। इन पांच पहलों में सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्व-बोध व स्वदेशी, और नागरिक अनुशासन शामिल हैं। उन्होंने संतोष व्यक्त किया कि समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा इन पहलों का खुले दिल से स्वागत किया गया है। केवल भारत ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी इन मानवीय मूल्यों की आवश्यकता महसूस की जा रही है। मोहन भागवत ने इसे केवल एक साल का कार्यक्रम न मानकर दैनिक जीवन और आचरण में उतारने की बात कही, जो एक सुसंस्कृत समाज के निर्माण की कुंजी है।

नई पीढ़ी और जेन-जी के सामने मंडराते डिजिटल खतरे

आज की नई पीढ़ी यानी जेन-जी को लेकर डॉ. भागवत ने अत्यंत महत्वपूर्ण और सामयिक चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि इंटरनेट और सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों से युवा बिना किसी उचित-अनुचित के विवेक के हर तरह की जानकारी ग्रहण कर रहे हैं। इसके नकारात्मक प्रभावों को देखते हुए दुनिया के कई देशों ने कड़े अनुशासन और प्रतिबंध लागू किए हैं। भारत में भी इस बात की सख्त आवश्यकता महसूस की जा रही है कि विशेषकर ‘ओटीटी प्लेटफॉर्म्स’ और डिजिटल सामग्री पर शासन-प्रशासन और समाज मिलकर विचार करे, ताकि नई पीढ़ी के भविष्य को सुरक्षित किया जा सके।

नशीली दवाओं की बढ़ती लत और अभिभावकों की भूमिका

विवेक के अभाव में आज की युवा पीढ़ी तेजी से नशीली दवाओं (ड्रग्स) की गिरफ्त में आ रही है, जिसे संघ प्रमुख ने एक गंभीर राष्ट्रीय समस्या बताया। उन्होंने कहा कि इस संकट से निपटने के लिए केवल कानून या शासन-प्रशासन काफी नहीं है, बल्कि समाज और विशेषकर अभिभावकों को आगे आना होगा। माता-पिता और वर्तमान अभिभावक पीढ़ी को समय रहते अपने बच्चों में सही-गलत की समझ विकसित करनी होगी ताकि वे इस भंवर जाल में फंसने से बच सकें। समाज और प्रशासन के संयुक्त प्रयासों से ही इस समस्या का स्थायी समाधान निकाला जा सकता है।

संतुलित विकास और नेपाल त्रासदी से सबक

विज्ञान और तकनीक की तेज प्रगति पर बात करते हुए भागवत ने कहा कि तकनीक मानव जीवन को सुगम और तर्कसंगत बनाने का एक साधन मात्र है। यदि विकास का दृष्टिकोण केवल उपभोगवादी या जड़वादी बन जाए, तो भौतिक सुख-सुविधाओं के साथ-साथ समाज और प्रकृति को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने नेपाल की भयंकर त्रासदी का जिक्र किया, जहां हजारों लोगों की जान चली गई। उन्होंने स्पष्ट किया कि संपूर्ण हिमालयी क्षेत्र (भारत, तिब्बत, भूटान और चीन से जुड़ा क्षेत्र) में एकांगी और अनियंत्रित विकास के गंभीर परिणाम सामने आ रहे हैं, इसलिए विकास की एक समग्र और संतुलित दृष्टि का होना अनिवार्य है।

कैप्टन स्मित मच्छार के साहस और संस्कारों की सराहना

अपने संबोधन के दौरान मोहन भागवत ने कैप्टन स्मित मच्छार के हालिया साहसिक कार्यों की विशेष रूप से सराहना की। उन्होंने कहा कि विपरीत परिस्थितियों में कैप्टन स्मित मच्छार ने जो निर्णय लिया और जो वीरता दिखाई, वह उनके भीतर निहित संस्कारों और परंपराओं का स्वाभाविक परिणाम था। ऐसी संकट की घड़ी में क्या करना चाहिए, इसके लिए कोई अलग से विशेष प्रशिक्षण नहीं दिया जाता, बल्कि व्यक्ति के अंदर के जन्मजात संस्कार और राष्ट्र के प्रति निष्ठा ही उसे सही मार्ग दिखाती है। यह प्रसंग समाज के युवाओं के लिए प्रेरणा का एक बड़ा स्रोत है।

राज नारायण बसु का स्मरण और स्वदेशी मेलों की महत्वपूर्ण प्रासंगिकता

बंगाली पुनर्जागरण के पुरोधा और ‘हिंदू मेला’ के प्रेरक स्वर्गीय राज नारायण बसु के जन्म के 200 वर्ष पूरे होने पर संघ प्रमुख ने उनके योगदान को याद किया। उन्होंने कहा कि राज नारायण बसु ने स्व के आत्मबोध को जागृत करने के लिए स्वदेशी मेलों की नींव रखी थी। आज के समय में हमें अपनी ऐतिहासिक विस्मृति को दूर करना होगा। देश की स्वाधीनता के समय जितनी तपस्या, त्याग और समर्पण की आवश्यकता थी, आज की बदलती और जटिल परिस्थितियों को देखते हुए उससे भी अधिक समर्पण के साथ राष्ट्र निर्माण में जुटने की जरूरत है।

Shravan Sharma
लेखक / पत्रकार:

Shravan Sharma

विशेष संवाददाता (Special Correspondent)

वरिष्ठ न्यूज़ रिपोर्टर, The Rural Press

The Rural Press के लिए निष्पक्ष और निर्भीक रिपोर्टिंग।

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