Satellite view of expanding glacial lakes in the Himalayan mountain region
Satellite view of expanding glacial lakes in the Himalayan mountain region

Glacial Lakes in Himalayas: हिमालय की बर्फीली चोटियों के बीच तेजी से फैलती ग्लेशियर झीलें अब बड़ी चिंता बन रही हैं। इसरो के सैटेलाइट अध्ययन में सामने आया है कि उच्च हिमालयी एशिया में ग्लेशियर झीलों का कुल क्षेत्रफल 2016-17 के मुकाबले 5.5 प्रतिशत बढ़ चुका है। भारत के हिमालयी हिस्से में मौजूद 130 झीलों का भी विस्तार हुआ है। इनमें से 601 झीलों का आकार अपने शुरुआती क्षेत्रफल से दोगुने से ज्यादा हो चुका है।

ये सिर्फ पानी से भरी झीलें नहीं हैं। ज्यादातर झीलें ग्लेशियरों के पीछे हटने से बनी हैं और मोरेन के कमजोर प्राकृतिक बांधों के सहारे टिकी हैं। पहाड़ों पर भारी बारिश हो, भूस्खलन हो या चट्टानों का बड़ा हिस्सा झील में गिरे, तो इन प्राकृतिक बांधों पर अचानक दबाव बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में नीचे की ओर बसे इलाकों में अचानक बाढ़ का खतरा पैदा हो सकता है।

10 साल में बदली हिमालय की तस्वीर

इसरो के आंकड़ों में 10 हेक्टेयर से बड़ी 676 ग्लेशियर झीलों का विस्तार दर्ज किया गया है। इनमें 130 झीलें भारत में हैं। यानी जिस क्षेत्र को लंबे समय तक बर्फ और ग्लेशियरों के लिए जाना जाता था, वहां अब तेजी से बढ़ती झीलें भी एक अहम बदलाव बन रही हैं। भारत की इन 130 झीलों में सबसे ज्यादा 65 सिंधु नदी बेसिन में हैं। ब्रह्मपुत्र बेसिन में 58 और गंगा बेसिन में 7 झीलें हैं। इन तीनों नदी तंत्रों का सीधा संबंध हिमालय से निकलने वाली नदियों और नीचे बसे बड़े इलाकों से है।

See also  बड़ी खबर : NTPC प्लांट में बड़ा हादसा, टैंक गिरने से 2 की मौत, कई घायल…

सबसे चौंकाने वाली बात 601 झीलों की

अध्ययन में सबसे बड़ा संकेत उन 601 झीलों से मिलता है, जिनका क्षेत्रफल दोगुने से भी ज्यादा बढ़ चुका है। 10 झीलों का आकार 1.5 से 2 गुना और 65 झीलों का आकार 1.5 गुना तक बढ़ा है। इनमें 314 झीलें 4,000 से 5,000 मीटर और 296 झीलें 5,000 मीटर से अधिक ऊंचाई पर हैं। यानी बड़ी संख्या में ऐसी झीलें बेहद ऊंचे और कठिन भौगोलिक इलाकों में मौजूद हैं, जहां मौसम में बदलाव का असर तेजी से दिखाई देता है।

पूर्वी हिमालय में सबसे ज्यादा बदलाव

पूर्वी हिमालय इस बदलाव का सबसे अहम हिस्सा बनकर सामने आया है। यहां ग्लेशियर झीलों का क्षेत्रफल 14.1 वर्ग किलोमीटर तक बढ़ा है। इसी हिमालयी रेंज में 80 हजार से ज्यादा भूस्खलन की घटनाएं भी दर्ज की जा चुकी हैं। भारी बारिश और भूस्खलन का असर सिर्फ पहाड़ी रास्तों तक सीमित नहीं रहता। अगर मलबा या चट्टान किसी ग्लेशियर झील में गिरती है, तो पानी के प्राकृतिक तटबंध पर दबाव बढ़ सकता है। यही वजह है कि ग्लेशियर झीलों की निगरानी अब आपदा प्रबंधन का भी अहम हिस्सा बन गई है।

See also  दुतकैया हिंसा मामले में गरियाबंद कलेक्टर सख्त: मजिस्ट्रियल जांच के आदेश जारी, SDM करेंगे पड़ताल

2,024 झीलों पर इसरो की नजर

इस खतरे को देखते हुए इसरो मानसून के दौरान एनएचपीसी की 26 प्रमुख जलविद्युत परियोजनाओं के जलग्रहण क्षेत्रों में मौजूद 2,024 ग्लेशियर झीलों की सैटेलाइट से निगरानी कर रहा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियर लगातार सिकुड़ रहे हैं। ऐसे में झीलों में होने वाले बदलावों की समय रहते पहचान करना जरूरी है। पूर्व चेतावनी प्रणाली और जल निकासी व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर इसी वजह से बढ़ रहा है। यानी हिमालय में खतरा सिर्फ उन ग्लेशियरों के पिघलने का नहीं है, जो आंखों के सामने दिखाई देते हैं। असली चिंता उन झीलों की भी है, जो उनके पीछे बन रही हैं और लगातार अपना आकार बढ़ा रही हैं।

रंजना वर्मा पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया से जुड़ी अनुभवी न्यूज राइटर हैं। उन्होंने देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर से मास्टर ऑफ मास कम्युनिकेशन की शिक्षा प्राप्त की है। रायपुर के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम करते हुए उन्होंने छत्तीसगढ़ और देश से जुड़े समसामयिक मुद्दों के साथ राजनीति, शिक्षा, सरकारी योजनाओं, कारोबार, तकनीक और लाइफस्टाइल जैसे विषयों पर लेखन किया है। समाचार लेखन के साथ SEO आधारित कंटेंट तैयार करने में भी उनकी अच्छी पकड़ है। सरल भाषा में तथ्यों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना और पाठकों तक विश्वसनीय जानकारी पहुंचाना उनकी लेखन शैली की प्रमुख विशेषता है।