नई दिल्ली। विधानसभा से पास बिलों पर गवर्नर और राष्ट्रपति की मंजूरी की डेडलाइन तय करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में लगातार सातवें दिन सुनवाई हुई। पश्चिम बंगाल, हिमाचल और तेलंगाना ने गवर्नरों की विवेकाधिकार शक्ति का विरोध करते हुए कहा कि कानून बनाना विधानसभा का अधिकार है, गवर्नरों का नहीं।
कपिल सिब्बल ने दलील दी कि गवर्नर बिलों को अनिश्चितकाल तक नहीं रोक सकते, जबकि हिमाचल सरकार के वकील आनंद शर्मा ने कहा कि यह संघीय ढांचे के खिलाफ है। कर्नाटक सरकार ने भी तर्क दिया कि राज्य में दोहरी सरकार (डायार्की) संभव नहीं। बेंच ने माना कि गवर्नर अनिश्चितकाल तक बिल लंबित नहीं रख सकते। अगली सुनवाई 9 सितंबर को होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रेसीडेंशियल रिफरेंस पर सुनवाई के दौरान अपनी ही शक्तियों पर संदेह व्यक्त किया। विधेयकों पर निर्णय के बारे में कोर्ट द्वारा समय सीमा तय करने और समय के भीतर निर्णय न लेने पर डीम्ड एसेंट (स्वत: मंजूरी ) मान लेने पर सवाल किया। शीर्ष अदालत ने विधेयक पर निर्णय लेने के लिए राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए समय सीमा तय करने का समर्थन कर रहे तमिलनाडु की ओर से पेश वकील अभिषेक मनु संघवी से सवाल किया कि अगर समय सीमा का पालन नहीं किया जाता है तो क्या होगा।
मालूम हो कि सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने तमिलनाडु के मामले में गत आठ अप्रैल को दिए फैसले में राज्य विधानसभा से पास विधेयकों पर निर्णय लेने के संबंध में राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए समय सीमा तय की है। इसके साथ ही कोर्ट ने तमिलनाडु विधानसभा से पारित दस विधेयक जो लंबे समय से राज्यपाल की मंजूरी के इंतजार में लटके हुए थे उन्हें कोर्ट के आदेश से मंजूर घोषित कर दिया था।
राष्ट्रपति ने मांगी है राय
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद ही राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट को रिफरेंस भेज कर 14 संवैधानिक सवालों पर राय मांगी है। रिफरेंस में सीधे तौर पर तो गत आठ अप्रैल के आदेश का जिक्र नहीं किया गया है लेकिन जिन प्रश्नों पर कोर्ट से राय मांगी गई है वे सभी सवाल आठ अप्रैल के फैसले में दी गई व्यवस्था के इर्दगिर्द घूमते हैं।
सिंघवी ने कोर्ट द्वारा समय सीमा तय करने को जायज ठहराते हुए कहा कि जहां संविधान मौन है वहां कोर्ट शून्यता भर सकता है और आदेश दे सकता है उन्होंने इस संबंध में चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के बारे में दिए गए कोर्ट के फैसले का उदाहरण दिया।
‘ऐसा हुआ तो विधेयक मर जायेगा’
सिंघवी ने कहा कि राज्यपाल अनिश्चितकाल तक विधेयकों को नहीं रोक सकते अगर ऐसा होगा तो विधेयक मर जाएगा। राज्यपाल सुपर चीफ मिनिस्टर नहीं हो सकते। विधेयक को समाप्त करने की शक्ति सिर्फ कैबिनेट के पास होती है। राज्यपाल ऐसा नहीं कर सकते। अगर बहुमत से कोई गलत बिल भी पास होता है तो कोर्ट उस पर विचार कर सकता है यही शक्तियों का प्रथकीकरण है।
बिल रोकने का मतलब, यह रद्द हो गया: केंद्र
केंद्र के अनुसार, राज्यपाल किसी बिल को रोक लेते हैं, तो इसका अर्थ होगा कि वह बिल रद्द हो गया। दूसरे शब्दों में, राज्यपाल बिल को रोककर उस पर वीटो लगा सकते है। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट के उस दृष्टिकोण से असहमति जताई जो तमिलनाडु राज्यपाल और पंजाब राज्यपाल मामलों में लिया गया था। उसमें कहा गया था कि राज्यपाल किसी बिल को रोकते हैं, तो उन्हें उसे जरूर विधानसभा को पुनर्विचार के लिए वापस भेजना होगा।
जस्टिस नरसिम्हा ने कहा कि केंद्र कह रहा है कि बिल को रोकने की शक्ति अपने आप में स्वतंत्र है और राज्यपाल बिल को रोक सकते है। अनुच्छेद 200 के प्रावधान में साफ लिखा है कि धन विधेयक को छोड़कर राज्यपाल किसी बिल को विधानसभा को पुनर्विचार के लिए लौटा सकते हैं। अगर, राज्यपाल को बिल रोकने की स्वतंत्र शक्ति मान ली जाती है, तो धन विधेयक भी सीधे रोका जा सकता है।
क्या धन विधेयक भी रोक सकते हैं राज्यपाल?
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने समझाया कि अनुच्छेद 207 के अनुसार, धन विधेयक केवल राज्यपाल के प्रस्ताव पर ही पेश किया जा सकता है। इसलिए राज्यपाल द्वारा धन विधेयक को रोकने का सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि वह उनके अनुशंसा पर ही पेश होता है। साल्वे ने महाराष्ट्र सरकार की ओर से कहा कि राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों को कोर्ट स्वीकृति नहीं दे सकता, क्योंकि यह अधिकार केवल राज्यपाल या राष्ट्रपति के पास है।
कोर्ट की सुनवाई में उठे कई सवाल
राष्ट्रपति रेफरेंस पर सुनवाई के दौरान यह सवाल सबसे अहम बनकर उभरा कि राज्यपाल को विधानसभा से पारित बिल पर कितनी ‘स्वतंत्र शक्ति’ हासिल है। बहस का केंद्र यह रहा कि क्या राज्यपाल बिल पर असहमति जताकर उसे रोक सकते है या यह सिर्फ एक संवैधानिक औपचारिकता है। अदालत ने पूछा कि कोर्ट यह पूछ सकता है कि राज्यपाल ने बिल क्यों रोका? चीफ जस्टिस ने सुनवाई के दौरान बार-बार यह मुद्दा उठाया कि अगर विधानसभा ने बिल को दो बार पास कर दिया है, तो क्या राज्यपाल या राष्ट्रपति उस पर अनिश्चितकाल तक बैठे रह सकते है?
कोर्ट ने कहा, स्थिति समस्या पैदा करने वाली होगी
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस बीआर गवई की अगुआई संवैधानिक बैच के सामने महाराष्ट्र राज्य की ओर से पेश हरीश साल्वे ने दलील पेश की। साल्वे ने कहा कि राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों को कोर्ट स्वीकृति नहीं दे सकता, यह अधिकार केवल राज्यपाल या राष्ट्रपति के पास है।
पीठ के न्यायाधीश जस्टिस विक्रमनाथ ने डीम्ड एसेंट पर पूछा कि क्या कोर्ट राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र में जाकर तीनों विकल्पों विचार कर सकता है।


