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Chhattisgarh Politics: दो दिनों में BJP संगठन में बड़ी हलचलें, अब आ सकती है सरकार की बारी?

Chhattisgarh Politics: पिछले एक दशक में विभिन्नि राज्यों में अपना लोहा मनवाने वाली BJP अब बैकफुट में जाती दिखाई दे रही है। SIR को लेकर उपजे विवाद ने देश की राजनीति को एक अलग ही दिशा दे दी है। इसकी आंच देश के विभिन्न राज्यों से होते हुए छत्तीसगढ़ तक भी पहुंचती दिख रही है। […]

Smriti Irani and Karmveer Singh amidst organizational changes in the Chhattisgarh BJP.
तस्वीर: The Rural Press फाइल / सौजन्य

Chhattisgarh Politics: पिछले एक दशक में विभिन्नि राज्यों में अपना लोहा मनवाने वाली BJP अब बैकफुट में जाती दिखाई दे रही है। SIR को लेकर उपजे विवाद ने देश की राजनीति को एक अलग ही दिशा दे दी है। इसकी आंच देश के विभिन्न राज्यों से होते हुए छत्तीसगढ़ तक भी पहुंचती दिख रही है। पिछले दो दिनों में दो बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। स्मृति ईरानी को प्रदेश की कमान सौंपी गई है और दूसरा बदलाव कर्मवीर सिंह को प्रदेश महामंत्री संगठन बनाया गया है। ऐसे में अब सरकारों की बारी सामने आती दिख रही है।

स्मृति ईरानी को छग का प्रभार सौंपना संगठनात्मक दृष्टिकोण से बड़े नेताओं पर लगाम कसने के कयासों को बल दे रहा है। वहीं, कर्मवीर सिंह को पवन साय से रिप्लेस किया गया है और दोनों की जगह बदली गई है। इसके पीछे का गणित छत्तीसगढ़ की रिपोर्ट के बाद अब झारखंड में भाजपा को मजबूत करना दिख रहा है। वहीं, पूर्व में संगठन महामंत्री के दौरे के समय खराब सड़कों, खराब प्रशासनिक व्यवस्था की झलक दिखी और संभागवार इन पर विस्तृत चर्चा भी हुई है। यानी कि छग की रिपोर्ट पहले ही तैयार कर सौंपी जा चुकी है।

क्या पढ़ ली गई है छत्तीसगढ़ की नब्ज

पवन साय के दौरों, समीक्षाओं से सरकार का रिपोर्ट कार्ड तैयार दिख रहा है। ऐसे में अब संगठनात्मक ढांचे में परिवर्तन से साफ है कि केंद्रीय नेतृत्व ने छत्तीसगढ़ की नब्ज पढ़ ली है और अब सरकार का भी रिपोर्ट कार्ड खोलने की तैयारी है? मामला इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि ये बदलाव ऐसे समय हुए हैं, जब दिल्ली में भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व राज्यों को लेकर लगातार बैठकों में जुटा है। कुछ महीनों के फीडबैक को सामने रखकर राज्यों की स्थिति की समीक्षा की जा रही है और छत्तीसगढ़ भी उस समीक्षा के दायरे में है।

संगठन में बदलाव कहानी का आधा हिस्सा

भाजपा की राजनीति में संगठन और सरकार दो अलग-अलग कमरे जरूर हैं, लेकिन दोनों के बीच दरवाजा हमेशा खुला रहता है। संगठन में बदलाव कई बार सरकार की कार्यशैली, जनता के बीच पकड़ और आने वाले चुनावी तैयारी का भी संकेत होता है। इसीलिए छत्तीसगढ़ में हुई इन नियुक्तियों को केवल सामान्य संगठनात्मक फेरबदल मानकर छोड़ देना शायद कहानी का आधा हिस्सा ही पढ़ना होगा।

पवन साय ने बनाई मजबूत रिपोर्ट

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक पिछले तीन महीनों में राज्यों के संगठन और सरकार के कामकाज को लेकर विस्तृत फीडबैक जुटाया गया है। इसमें संगठन की सक्रियता, कार्यकर्ताओं के साथ संवाद, सरकार की योजनाओं का जमीनी असर, मंत्रियों और विधायकों की सक्रियता और जनता के बीच सरकार की स्थिति जैसे पहलुओं को शामिल किया गया। इसमें बड़ी और अहम भूमिका पवन साय की रही।

स्मृति को प्रभार से बड़े नेताओं पर शिकंजा

स्मृति ईरानी को छग का प्रभारी बनाए जाने के कई मायने हैं। पहला तो स्मृति ईरानी जैसी तेज तर्रार नेत्री के आने के बाद प्रदेश के बड़े नेताओं पर शिकंजा कसना आसान होगा। दूसरा राहुल गांधी को चुनाव में हराने के बाद उनका कद और बढ़ गया है। ऐसे में विभिन्न मुद्दों को लेकर बीजेपी पर हमला बोलने वाली कांग्रेस और पूर्व सीएम भूपेश बघेल का भी बड़ी ही मुखरता, तथ्यों के साथ विरोध करती आई हैं। तीसरा महिला कार्ड।

अब नए हाथों से जाएगा फीडबैक

स्मृति, कर्मवीर के अलावा एक और बदलाव सिद्धार्थ शंभू को सह-प्रभारी की जिम्मेदारी सौंपते हुए किया गया है। यानी कि अब सीधे तौर पर रायपुर में बैठकर दिल्ली को जाने वाला फीडबैक भी नए हाथों से जाएगा। और यहीं से कहानी का अगला अध्याय शुरू होता है। सूत्रों के अनुसार बैठकों में संगठन की स्थिति, सरकार के कामकाज, चुनावी तैयारियों और जनता के बीच राजनीतिक स्वीकार्यता पर भी चर्चा हुई है। अगर यह आकलन सही, तो यह एक बड़ी राजनीतिक पटकथा का पहला दृश्य हो सकता है।

नवरात्रि की चर्चा ने बढ़ाई बेचैनी

पहले संगठन को दुरुस्त करना, फिर सरकार के कामकाज का आकलन और उसके बाद जरूरत के मुताबिक राजनीतिक फैसले लिए गए हैं। राजनीतिक गलियारों में अब नवरात्रि के आसपास संभावित बड़े फैसलों को लेकर भी चर्चा है। कुछ सूत्रों का दावा है कि संगठनात्मक बदलाव के बाद राज्यों में सरकारों के स्तर पर भी समीक्षा और आवश्यक फेरबदल का दौर शुरू हो सकता है। इसी वजह से कई राज्यों के सत्ता गलियारों में बेचैनी की चर्चा है। कौन रहेगा? किसका विभाग बदलेगा? किस मंत्री का कद बढ़ेगा? किसकी जिम्मेदारी घटेगी? और क्या कहीं नेतृत्व परिवर्तन की नौबत आएगी? इन सवालों के जवाब अभी दिल्ली की फाइलों में बंद हैं।

2029 की लड़ाई का आधार 2026-27 में

किसी भी हाल में भाजपा 2029 से पहले कोई जोखिम नहीं उठाना चाहेगी। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल मौजूदा सरकारें चलाना नहीं, बल्कि 2029 के पहले राज्यों में राजनीतिक जमीन को मजबूत रखना भी है। उत्तर प्रदेश में लगातार बदलते राजनीतिक समीकरण, विपक्ष की सक्रियता और अलग-अलग राज्यों से आने वाले फीडबैक ने भाजपा के लिए यह स्पष्ट कर दिया है कि बड़े चुनाव की तैयारी आखिरी साल में शुरू करने का दौर अब पीछे छूट चुका है।

Vikas Soni
लेखक / पत्रकार:

Vikas Soni

विशेष संवाददाता (Special Correspondent)

वरिष्ठ न्यूज़ रिपोर्टर, The Rural Press

The Rural Press के लिए निष्पक्ष और निर्भीक रिपोर्टिंग।

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