थोक व्यापारियों से लेकर आम लोगों को त्योहारी सीजन में महंगाई का दोहरा झटका लगा है। थोक महंगाई दर अपने 5 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है। सितंबर माह में थोक महंगाई दर 11.39 प्रतिशत तक पहुंच गई है। इससे 100 रुपए में मिलने वाले सामान के लिए आपको 111 रुपए देने होंगे।
सरकार ने 14 अक्टूबर को सितंबर की थोक महंगाई की दरें जारी की हैं। अगस्त में थोक महंगाई दर 9.92% थी, जो कि बढ़कर 11.39 प्रतिशत पर पहुंच गई है। खाने-पीने की चीजों से लेकर ईंधन तक सारी जरूरत की चीजें महंगी हुई हैं। आंकड़ों के हिसाब से खाद्य पदार्थों की थोक महंगाई दर अगस्त के 7.05% से बढ़कर सितंबर में 8.66% हो गई। ईंधन और बिजली क्षेत्र की महंगाई दर भी 22.93% से बढ़कर 25.85% पर पहुंच गई। कच्चे माल की महंगाई दर 7.76% से बढ़कर 8.67% और मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स की महंगाई दर 8.37% से बढ़कर 9.76% हो गई है।
₹100 का सामान अब ₹111.39 का?
थोक महंगाई दर 11.39% होने का मतलब समझने के लिए मान लीजिए कि किसी वस्तु की कीमत पिछले साल थोक बाजार में 100 रुपये थी। अगर उसकी कीमत में 11.39% की बढ़ोतरी हुई, तो वह बढ़कर लगभग 111.39 रुपये हो जाएगी। हालांकि, हर वस्तु की कीमत में इतनी ही बढ़ोतरी होना जरूरी नहीं है।
खुदरा महंगाई भी बढ़कर 5.54% हुई
सितंबर में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 5.54% हो गई, जबकि अगस्त में यह 4.82% थी। आलू, प्याज, टमाटर जैसी सब्जियों और दूसरी खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी को इसकी वजह बताया गया है। मध्य पूर्व में तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का भी उल्लेख किया गया है। दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, खुदरा महंगाई लगातार 11वें महीने बढ़ी है।
पेट्रोल-डीजल, गैस और कोयले की कीमतों का असर
महंगाई बढ़ाने वाले प्रमुख कारकों में पेट्रोल-डीजल, कच्चा तेल, गैस, कोयला और टेक्सटाइल शामिल हैं। इन क्षेत्रों में कीमतों में तेजी का असर उत्पादन और कारोबार की लागत पर पड़ सकता है।
थोक महंगाई बढ़ने से आम आदमी पर क्या असर होगा?
थोक महंगाई बढ़ने से कारोबारियों और निर्माताओं की लागत बढ़ सकती है। कच्चे माल, धातु, केमिकल, प्लास्टिक और रबर जैसी वस्तुएं महंगी होने पर तैयार उत्पादों की लागत पर दबाव पड़ता है। अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो कंपनियां बढ़ी हुई लागत का कुछ हिस्सा ग्राहकों पर डाल सकती हैं।
सरकार कैसे नियंत्रित कर सकती है महंगाई?
सरकार करों में बदलाव करके कुछ वस्तुओं की कीमतों पर असर डाल सकती है। उदाहरण के तौर पर, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के दौरान ईंधन पर उत्पाद शुल्क में कटौती की जा सकती है। हालांकि, करों में कटौती की भी एक सीमा होती है। थोक महंगाई पर असर डालने वाले कई कारक उत्पादन लागत और बाजार की कीमतों से जुड़े होते हैं।
थोक महंगाई और खुदरा महंगाई में क्या अंतर है?
भारत में महंगाई को मापने के लिए दो प्रमुख सूचकांकों का इस्तेमाल किया जाता है। थोक मूल्य सूचकांक यानी WPI थोक बाजार में वस्तुओं की कीमतों में बदलाव बताता है। वहीं, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी CPI उन कीमतों में बदलाव दर्शाता है, जिनका भुगतान आम लोग सामान और सेवाएं खरीदते समय करते हैं।
थोक महंगाई के लिए नया बेस ईयर लागू
सरकार ने थोक मूल्य सूचकांक के लिए 2022-23 को नया आधार वर्ष बनाया है। यह नई सीरीज 15 जून 2026 को लागू की गई थी। इससे पहले 2011-12 को आधार वर्ष माना जाता था। आधार वर्ष वह अवधि होती है, जिससे तुलना करके कीमतों में बदलाव का आकलन किया जाता है।
आगे क्या असर पड़ सकता है?
सितंबर के आंकड़ों में थोक और खुदरा, दोनों महंगाई दरों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यदि उत्पादन लागत लंबे समय तक ऊंची रहती है, तो इसका असर तैयार उत्पादों की कीमतों पर पड़ सकता है। हालांकि, आम उपभोक्ताओं पर इसका वास्तविक असर अलग-अलग वस्तुओं की कीमतों में होने वाले बदलाव पर निर्भर करेगा।


