Raksha Bandhan 2026: रक्षा बंधन का त्योहार इस बार 28 अगस्त को मनाया जाएगा। सावन की पूर्णिमा पर मनाए जाने वाले इस पर्व में बहन भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती है और भाई उसकी रक्षा का वचन देता है। लेकिन राखी की परंपरा
सिर्फ भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं रही। वैदिक परंपरा में रक्षा सूत्र बांधने का उल्लेख मिलता है। समय के साथ इससे कई धार्मिक कथाएं, लोककथाएं और सामाजिक परंपराएं जुड़ती गईं।
वैदिक परंपरा से जुड़ा है रक्षा सूत्र
रक्षा सूत्र को कलावा भी कहा जाता है। वैदिक परंपरा में ऋषि अपने शिष्यों और यजमानों की रक्षा के लिए रक्षा सूत्र बांधते थे। इसे बांधते समय वैदिक मंत्रों का उच्चारण किया जाता था। अथर्ववेद में भी रक्षा सूत्र बांधते समय पढ़े जाने वाले मंत्र का उल्लेख मिलता है। मंत्र है—“येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबल:, तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल।” इसका भाव है कि जिस रक्षासूत्र से शक्तिशाली दानव राजा बलि को बांधा गया था, उसी रक्षा सूत्र से तुम्हें बांधता हूं। राजा बलि से जुड़ी कथा स्कंद पुराण में मिलती है।
राजा बलि और भगवान विष्णु का वामन अवतार
स्कंद पुराण, पद्म पुराण और श्रीमद्भागवत में राजा बलि से जुड़ी कथा मिलती है। मान्यता के अनुसार, असुर राजा बलि ने देवताओं को पराजित कर देवलोक पर अधिकार कर लिया था। तब भगवान विष्णु ने अदिति के गर्भ से वामन रूप में जन्म लिया। वामन भगवान ब्राह्मण का वेश धारण कर राजा बलि के पास पहुंचे। उन्होंने बलि से तीन पग जमीन मांगी। बलि ने उनकी मांग स्वीकार कर ली। इसके बाद भगवान ने विशाल रूप धारण किया। पहले पग में धरती और दूसरे में आकाश तथा पाताल को ले लिया। तीसरे पग के लिए भगवान ने बलि से स्थान पूछा। तब बलि ने अपना सिर उनके चरणों में रख दिया। भगवान ने तीसरा पग उनके सिर पर रखा और उन्हें रसातल में पहुंचा दिया। भगवान ने उन्हें अजर-अमर होने का वरदान भी दिया।
लक्ष्मी जी ने बलि को बनाया भाई
कथा के अनुसार, भगवान विष्णु वामन रूप में राजा बलि के साथ रहने लगे। इससे माता लक्ष्मी परेशान हुईं। उन्होंने देवर्षि नारद से अपनी परेशानी बताई। नारद ने उन्हें राजा बलि को रक्षा सूत्र बांधकर भाई बनाने का सुझाव दिया। माता लक्ष्मी ने राजा बलि को राखी बांधी और उन्हें अपना भाई बनाया। इसके बाद उनसे भगवान विष्णु को वापस ले जाने का वचन लिया। इस तरह वे भगवान विष्णु को अपने साथ वापस ले आईं।
इंद्र की कलाई पर भी बंधा था रक्षा सूत्र
भविष्य पुराण से जुड़ी कथा में देवताओं के राजा इंद्र और उनकी पत्नी शची का प्रसंग मिलता है। देवताओं और दैत्यों के बीच युद्ध के दौरान दैत्य भारी पड़ने लगे थे। इंद्र गुरु बृहस्पति के पास पहुंचे। कथा के अनुसार, बृहस्पति ने इंद्र को अपनी पत्नी शची के हाथों मंत्रबिद्ध धागा बंधवाने की सलाह दी। यह श्रावण पूर्णिमा का दिन था। इसके बाद इंद्र विजयी हुए। मान्यता है कि इसी कथा से पत्नियों द्वारा पति की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा भी जुड़ी। बाद में लोक परंपरा में सावन की पूर्णिमा पर बहनों द्वारा भाइयों की कलाई पर राखी बांधना प्रमुख हो गया। मान्यता है कि द्रौपदी ने भी भगवान कृष्ण को राखी बांधी थी। इसी कारण कृष्ण को द्रौपदी के संकट के समय उनकी रक्षा करने वाला माना जाता है।
कर्णावती और हुमायूं की राखी की कहानी
रक्षा बंधन से जुड़ी एक चर्चित लोककथा रानी कर्णावती और मुगल बादशाह हुमायूं की है। लोककथा के अनुसार, वर्ष 1535 में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने मेवाड़ पर हमला किया था। तब मेवाड़ की रानी कर्णावती ने हुमायूं को राखी भेजकर मदद मांगी थी। कहा जाता है कि हुमायूं ने अपने सलाहकारों से राखी का अर्थ पूछा। उनके हिंदू सहयोगियों ने बताया कि रानी ने उन्हें अपना भाई माना है। इसके बाद हुमायूं चित्तौड़ की मदद के लिए रवाना हुआ। हालांकि उसके पहुंचने से पहले ही रानी कर्णावती ने जौहर कर लिया। कर्णावती मेवाड़ के राणा सांगा की पत्नी थीं। राणा की मृत्यु के बाद उनके नाबालिग पुत्र विक्रमादित्य गद्दी पर बैठे और कर्णावती उनकी संरक्षक थीं। हालांकि तत्कालीन फारसी दस्तावेजों में इस राखी की घटना का उल्लेख नहीं मिलता।
सिकंदर और राजा पोरस से जुड़ी एक और लोककथा
रक्षा बंधन से जुड़ी एक अन्य प्रचलित लोककथा सिकंदर की पत्नी रोक्साना और सिंध के राजा पोरस से संबंधित है। कथा के अनुसार, 326 ईसा पूर्व सिकंदर के भारत पर आक्रमण के समय रोक्साना ने पोरस को राखी का भाई मानकर सिकंदर को न मारने का अनुरोध किया था। कहा जाता है कि इसी कारण पोरस ने सिकंदर को कई बार युद्ध मैदान से हटने दिया। बाद में पोरस स्वयं पराजित हुआ। यह कथा अमेरिका के बोस्टन प्रांत में स्थित एक पब्लिक लाइब्रेरी में मिलने की बात कही गई है। हालांकि यह प्रसंग भी लोककथा के रूप में ही प्रचलित है।
राजा से लेकर आम लोगों तक पहुंचा त्योहार
सामंती काल में प्रजा भी रक्षा बंधन के दिन राजा को राखी बांधती थी। राजा को प्रजा का रक्षक माना जाता था। पुरोहित आज भी अपने यजमानों के घर जाकर रक्षा सूत्र बांधते हैं और यजमान उन्हें दक्षिणा देते हैं। रक्षा बंधन सिर्फ सगे भाई-बहनों तक सीमित नहीं है। चचेरे, ममेरे, फुफेरे और मौसेरे भाई-बहन भी यह त्योहार मनाते हैं। महिलाएं जिसे भाई मानती हैं, उसे राखी बांधती हैं। कई जगह हिंदू बहनें मुस्लिम भाइयों को भी राखी बांधती हैं। इस तरह यह त्योहार धर्म और जाति की सीमाओं से आगे भी मनाया जाता है।
बंगाल में राखी ने लिया सामाजिक आंदोलन का रूप
वर्ष 1905 में बंगाल विभाजन के दौरान कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर ने रक्षाबंधन को भाईचारे के प्रतीक के रूप में सामूहिक तौर पर मनाने का आह्वान किया था। इसी दौर में राखी ने सामाजिक और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक का रूप भी लिया। 16 अक्टूबर 1905 को लॉर्ड कर्जन ने बंगाल विभाजन को अंतिम रूप दिया था। इसी दौरान बंगाल में लोगों ने एक-दूसरे को राखी बांधकर एकता और भाईचारे का संदेश दिया। इस तरह त्योहार को स्वतंत्रता आंदोलन से भी जोड़ा गया।
जैन और सिख परंपराओं में भी राखी
महाभारत से जुड़ी एक कथा में कहा गया है कि जब अर्जुन का मनोबल कौरवों की विशाल सेना को देखकर कमजोर हुआ, तब भगवान कृष्ण ने पांडव सेना को रक्षा सूत्र से बांधा था। जैन परंपरा में मुनि विष्णुकुमार द्वारा 700 जैन मुनियों की रक्षा करने की कथा मिलती है। इसी से जैनाचार्यों द्वारा रक्षाबंधन मनाने की परंपरा जुड़ी मानी जाती है। सिख समुदाय में भी राखी का त्योहार उत्साह से मनाया जाता है। हालांकि वहां इसे लेकर कोई धार्मिक बंधन नहीं है। खालसा सेना अपनी रियाया की रक्षा के लिए राखी कर लेती थी। महाराजा रणजीत सिंह की महारानी जिंदां कौर द्वारा नेपाल के राजा को राखी भेजने की कथा भी प्रचलित है।
बौद्ध परंपरा में रक्खा सूत
बौद्ध इतिहास में रक्षा सूत्र को ‘रक्खा सूत’ कहा जाता है। भगवान बुद्ध के परिनिर्वाण के बाद उनके उपदेशों को सहेजने के लिए रक्खा सूत के चलन की बात कही जाती है। सावन पूर्णिमा पर बौद्ध भिक्षु भगवान बुद्ध के उपदेशों को याद रखने और उनके अनुसार चलने की शपथ लेते थे। इसके लिए रक्षा सूत्र बांधा जाता था। आदिवासी परंपराओं में भी रक्षा बंधन प्रकृति से जुड़ा है। आदिवासी लोग वृक्षों को अपना भाई मानकर उनके चारों ओर धागा लपेटते हैं। ओडिशा और छत्तीसगढ़ में कई जगह खेतों में राखी खूंटा बांधने की परंपरा भी है।
अब बदल रहा है राखी का स्वरूप
समय के साथ रक्षा बंधन का स्वरूप भी बदल गया है। भारत के अलावा यूरोप और अमेरिका समेत उन देशों में भी राखी मनाई जाती है, जहां भारतीय रहते हैं। राखियों का विश्व व्यापार करीब 30 हजार करोड़ रुपये का बताया गया है। पहले चीन में बनी राखियों का चलन अधिक था। अब भारत में कई तरह की डिजाइनर राखियां तैयार की जाती हैं। जो बहनें रक्षा बंधन पर भाई के घर नहीं पहुंच पातीं, वे राखी कोरियर से भेजती हैं। वीडियो कॉल के जरिए भी भाई को राखी बांधने की रस्म में शामिल होती हैं। संपन्न परिवारों में मिठाई की जगह भाई को ड्राई फ्रूट्स देने का चलन भी बढ़ा है। इस तरह रक्षा बंधन की परंपरा समय के साथ बदलती रही है। इसकी धार्मिक कथाओं के साथ लोक परंपराएं, सामाजिक रिश्ते और भाईचारे का संदेश भी जुड़ता गया।


