Ganesh Puja: सनातन धर्म में किसी भी शुभ कार्य, धार्मिक अनुष्ठान या पूजा की शुरुआत सबसे पहले भगवान गणेश की वंदना से की जाती है। उन्हें विघ्नहर्ता और मंगलकर्ता माना जाता है। उनकी पूजा से कार्य की बाधाएं दूर होती हैं. इसी वजह से उन्हें प्रथम पूज्य देवता का दर्जा मिला है।
आखिर धार्मिक अनुष्ठानों में सबसे पहले भगवान गणेश की पूजा क्यों की जाती है? आइए जानते हैं इससे जुड़ी पौराणिक कथाएं।
शुभ कार्य से पहले क्यों होती है भगवान गणेश की पूजा?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान गणेश का संबंध भगवान शिव और माता पार्वती से है। एक कथा के मुताबिक माता पार्वती ने गणेश जी को अपने द्वार की रक्षा के लिए नियुक्त किया था। जब भगवान शिव वहां पहुंचे, तो गणेश जी ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया। इसके बाद भगवान शिव और गणेश जी के बीच युद्ध हुआ। इस दौरान भगवान शिव ने गणेश जी का सिर काट दिया। माता पार्वती के आग्रह पर भगवान शिव ने गणेश जी को हाथी का सिर प्रदान किया और उन्हें पुनर्जीवित किया।
श्रेष्ठता की परीक्षा और बुद्धि
भगवान गणेश को प्रथम पूज्य बनाए जाने के पीछे एक और महत्वपूर्ण कथा जुड़ी है। एक बार भगवान गणेश और उनके भाई कार्तिकेय के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद हुआ। दोनों ने खुद को श्रेष्ठ बताया। तब भगवान शिव ने एक शर्त रखी। उन्होंने कहा कि जो सबसे पहले पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा करके आएगा, उसे ही श्रेष्ठ माना जाएगा।
माता-पिता के चरणों में पूरा संसार
कार्तिकेय जी अपने वाहन मयूर पर सवार होकर ब्रह्मांड की परिक्रमा करने निकल पड़े। दूसरी ओर, भगवान गणेश का वाहन मूषक था। गणेश जी ने अपनी बुद्धि का उपयोग किया। उन्होंने भगवान शिव और माता पार्वती की सात परिक्रमा की और उनके सामने खड़े हो गए। गणेश जी ने कहा कि माता-पिता के चरणों में ही संपूर्ण संसार का वास होता है।
गणेश जी को क्यों मिला प्रथम पूज्य का सम्मान?
भगवान शिव और माता पार्वती गणेश जी की बुद्धि और भक्ति से प्रसन्न हुए। उन्होंने गणेश जी को श्रेष्ठता का सम्मान दिया। इसी प्रसंग से भगवान गणेश के प्रथम पूज्य होने की मान्यता को जोड़ा जाता है।
मान्यता है कि विघ्नहर्ता भगवान गणेश की पूजा और स्तवन के बिना धार्मिक अनुष्ठान को पूर्ण नहीं माना जाता। गणेश जी का आह्वान करने से अन्य देवी-देवताओं की उपासना भी निर्विघ्न संपन्न होने की मान्यता है। इसी वजह से आज भी किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत ‘श्री गणेशाय नमः’ से करने की परंपरा चली आ रही है।



