सोमवार, 14 सितंबर 2026 सोम, 14 सित |
संस्करण:
पब्लिक इंटरेस्ट

Roopnaolsaud Butter Holi Janmashtami: परियों के देश में मक्खन की होली, रुपनौलसौड में मनाई जाती है अनोखी जन्माष्टमी

Roopnaolsaud Butter Holi Janmashtami:  परियों के देश में मक्खन की होली, रुपनौलसौड में मनाई जाती है अनोखी जन्माष्टमी
तस्वीर: The Rural Press फाइल / सौजन्य

Roopnaolsaud Butter Holi Janmashtami: देहरादून। उत्तराखंड की पहाड़ियों में कई प्राचीन लोक परंपराएं आज भी जीवंत हैं। ऐसी ही एक अनूठी परंपरा उत्तरकाशी और आसपास के पर्वतीय क्षेत्रों से जुड़े रुपनौलसौड में देखने को मिलती है, जहां हर साल कृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर दूध, ताजे मक्खन और छांछ की होली खेली जाती है। करीब छह हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित यह बुग्याल अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के साथ-साथ लोक आस्था और पौराणिक मान्यताओं के लिए विशेष पहचान रखता है।

क्यों खेली जाती है मक्खन की होली

रुपनौलसौड का यह आयोजन सिर्फ उत्सव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्थानीय लोकजीवन और पशुपालन की परंपरा से गहराई से जुड़ा हुआ है। पहाड़ी क्षेत्रों की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सदियों से मवेशियों की अहम भूमिका रही है।

पशुधन के प्रति कृतज्ञता:- स्थानीय मान्यता के अनुसार, जन्माष्टमी पर दूध और मक्खन से होली खेलकर ग्रामीण अपने पशुधन के प्रति आभार व्यक्त करते हैं।

गंगा और यमुना घाटियों का मिलन:- इस पर्व में गंगा घाटी (दशगी और भंडारस्यूं) तथा यमुना घाटी (मुंगरसंती और बड़कोट पट्टियों) के ग्रामीण पारंपरिक अंदाज में एकत्र होते हैं, जो आपसी भाईचारे और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक है।

परियों की रहस्यमयी लोक मान्यताएं और प्राकृतिक सुंदरता

यह इलाका मक्खन की होली के अलावा अपनी रहस्यमयी लोक कथाओं के लिए भी जाना जाता है। स्थानीय लोकविश्वास में यहां 'आच्छरी मातृयां' यानी दिव्य परियों के निवास की मान्यता है, जिन्हें प्रकृति की रक्षक शक्तियों का प्रतीक माना जाता है। हालांकि इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है, लेकिन यह मान्यता इस क्षेत्र की संस्कृति को खास बनाती है।

बुग्यालों का नज़ारा:- छह हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित यह विस्तृत मैदान दूर से किसी गोल्फ कोर्स जैसा दिखाई देता है।
मौसम के बदलते रंग:- गर्मियों में यहां रंग-बिरंगे फूल खिलते हैं, जबकि सर्दियों में पूरा क्षेत्र बर्फ की सफेद चादर से ढक जाता है।
रास्ते:- राड़ी टॉप से मुराल्टू, मंजगांव और कबाटा के पैदल रास्तों से ग्रामीण और श्रद्धालु इस आयोजन तक पहुंचते हैं।

बुग्यालों से जुड़ी मुख्य बातें:-

बुग्याल (Bugyal) हिमालयी क्षेत्रों में, विशेषकर उत्तराखंड में पाए जाने वाले ऊंचे पहाड़ी घास के मैदानों को कहा जाता है। इन्हें पहाड़ों का 'प्राकृतिक अल्पाइन चारागाह' (Alpine Meadow) भी कहा जाता है।

ऊंचाई और स्थिति:- ये आम तौर पर 3,000 मीटर से 4,000 मीटर (लगभग 10,000 से 14,000 फीट) या उससे अधिक की ऊंचाई पर स्थित होते हैं, जहां पेड़-पौधे उगना बंद हो जाते हैं और केवल मखमली घास और मौसमी फूल ही उगते हैं।

मौसम के अनुसार रूप:- गर्मियों के मौसम में इन मैदानों पर रंग-बिरंगे जंगली फूल खिल जाते हैं, जिससे ये किसी प्राकृतिक कालीन (Carpet) की तरह नजर आते हैं। सर्दियों के दिनों में यही बुग्याल बर्फ की मोटी और सफेद चादर से पूरी तरह ढक जाते हैं।

पारिस्थितिकी और पशुपालन:- स्थानीय ग्रामीण सदियों से इन मैदानों का उपयोग अपने मवेशियों (गाय, भेड़, बकरी) को चराने के लिए चारागाह के रूप में करते आए हैं।

पर्यटन और रोमांच:- अपनी अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता, शांत वातावरण और ट्रैकिंग के लिए अनुकूल होने के कारण ये स्थान देश-दुनिया के पर्यटकों और ट्रेकर्स को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।

प्रमुख उदाहरण:- उत्तराखंड में बेदिनी बुग्याल, औली, दयारा बुग्याल, और फूलों की घाटी के पास स्थित बुग्याल इसके प्रसिद्ध उदाहरण हैं।

विज्ञापन