बड़ी खबर: 2 रुपए की डेक्सामेथासोन भी बचा सकती है कोरोना के गंभीर मरीज की जान, रेमडेसिवीर के पीछे न करें 20 हजार खर्च, SGPGI Expert Opinion
बड़ी खबर: 2 रुपए की डेक्सामेथासोन भी बचा सकती है कोरोना के गंभीर मरीज की जान, रेमडेसिवीर के पीछे न करें 20 हजार खर्च, SGPGI Expert Opinion

लखनऊ । कोरोना से संक्रमित अपने परिजन की जान बचाने के लिए रेमडेसिवीर की मुंह मागी कीमत लोग देने को तैयार जिन्होंने किसी तरह पा लिया और लगवा भी दिया क्या वह बच गए यह बडा सवाल है। इस बारे में विशेषज्ञ कहते है कि इस इंजेक्शन का कोई खास फायदा नहीं है, इसलिए इस दवा को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मान्यता नहीं दिया।

क्या कहते हैं विश्षेज्ञ

रिसर्च सोसाइटी ऑफ एनेस्थीसिया एंड क्लीनिकल फार्माकोलॉजी के सचिव और संजय गांधी पीजीआई के आईसीयू एक्सपर्ट प्रो, संदीप साहू ने साफ शब्दों में कहा कि रेमेडिसवीर के पीछे भागने से कोई फायदा नहीं है। रेमडेसिवीर का वहीं हाल है जैसे वायरल फीवर में एंटीबायोटिक खाओ तो सात दिन में ठीक न खाओ तो भी सात दिन में ठीक,.एआरडीएस रोकने में इसकी कोई भूमिका नहीं है।

कई मरीजों की बची है जान

न्यू इंग्लैंड जर्नल आफ मेडिसिन के हाल के शोध का हवाला देते हुए प्रो. साहू कहते है कि डेक्सामेथासोन सबसे सस्ती और आसानी से मिलने वाली दवा है। यह दवा एआरडीएस रोकने में काफी कारगर साबित होती है। ऐसा हमने में भी कोरोना मरीजों में देखा है खास तौर पर जिनमें लो ऑक्सीजन की जरूरत है। इनमें यह आठ से दस मिली ग्राम 24 घंटे में एक बार देने से वेंटिलेटर पर जाने के आशंका काफी कम हो जाती है।

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दो हजार कोरोना सक्रमित मरीजों पर किया गया शोध

शोध वैज्ञानिकों ने दो हजार कोरोना संक्रमित ऐसे मरीजों पर शोध किया जिनमें आक्सीजन लेवल 90 से कम था इन्हें डेक्सामेथासोन देने के बाद 28 दिन बाद परिणाम देखा गया तो पता चला कि इनमें मृत्यु दर कम थी इसके साथ ही वेंटिलेटर की जरूरत कम पडी।

रेमडेसिवीर केवल एक खास वर्ग में राहत दे सकती है। हाई ऑक्सीजन की जरूरत होती है। यह केवल पहले सप्ताह में ही देने से राहत की संभावना होती है। इस दवा का कोई खुली स्टडी नहीं है केवल फार्मा इंडस्ट्री द्वारा प्रायोजित शोध ही सामने आए है।

जानें क्या है एआरडीएस सिंड्रोम


तीव्र श्वसन संकट सिंड्रोम (एआरडीएस) एक ऐसी स्थिति है जिसमें फेफड़ों की हवा की थैलियों में तरल जमा हो जाने के कारण अंगों को ऑक्सीजन नहीं मिल पाती है। गंभीर रूप से बीमार या कोरोना संक्रमित लोगों में सांस संबंधित तंत्र में गंभीर समस्या का सिंड्रोम हो सकता है।

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यह अकसर घातक होता है। उम्र के साथ खतरा और बीमारी की गंभीरता से बढ़ती जाती है। एआरडीएस से पीड़ित लोगों को गंभीर रूप से सांस की तकलीफ होती है और वेंटीलेटर के सहारे के बिना वे खुद सांस लेने में असमर्थ होते हैं।

एआरडीएस रोकने में कारगर रहा है डेक्सामेथासोन

डेक्सामेथासोन नान कोविड मेंरू प्रो.संदीप साहू कहते है कि नान कोविड मरीज जो आईसीयू में भर्ती होते है उनमें डेक्सामेथासोन एआरडीएस रोकने में कारगर रहा है। ऐसा हजारों मरीजों में देखा गया है। इस दवा की सही मात्रा देने से साइटोकाइन स्टार्म रोकने में सफलता मिलती है। यह एंटी इंफ्लामेटरी गुण वाली दवा है।

डेक्सामेथासोन , प्रेडनिसोन भी कारगर

क्लीनिकल इम्यूनोलॉजी विभाग संजय गांधी पीजीआई के हेड प्रो.अमिता अग्रवाल ने बताया कि रेमडेसिविर कोरोना संक्रमित मरीजों में देने से कोई खास फायदा नहीं है ऐसे विश्व स्वास्थ्य संगठन सॉलिडेटरी स्टडी में सामने आयी है। कोरोना संक्रमित मरीजों में एआरडीएस की परेशानी होती है जिसमें फेफडे की कार्य शक्ति कम हो जाती है। आक्सीजन स्तर कम होने के साथ डेक्सामेथासोन , प्रेडनिसोन दवा सही मात्रा में देने से काफी हद कर फेफड़े को बचाया जा सकता है।

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रंजना वर्मा पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया से जुड़ी अनुभवी न्यूज राइटर हैं। उन्होंने देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर से मास्टर ऑफ मास कम्युनिकेशन की शिक्षा प्राप्त की है। रायपुर के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम करते हुए उन्होंने छत्तीसगढ़ और देश से जुड़े समसामयिक मुद्दों के साथ राजनीति, शिक्षा, सरकारी योजनाओं, कारोबार, तकनीक और लाइफस्टाइल जैसे विषयों पर लेखन किया है। समाचार लेखन के साथ SEO आधारित कंटेंट तैयार करने में भी उनकी अच्छी पकड़ है। सरल भाषा में तथ्यों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना और पाठकों तक विश्वसनीय जानकारी पहुंचाना उनकी लेखन शैली की प्रमुख विशेषता है।