रायपुर। प्रदेश के मुखिया भूपेश बघेल ने डीएमएफ के तहत खर्च किए गए पैसों का हिसाब क्या मांगा, कई कलेक्टर्स की तो नींद ही उड़ गई। ये उन जिलों के जिलाधीश हैं जहां मनमाना खर्च हुआ है।

तो वहीं कुछ जिलों में अच्छा काम तो हुआ है मगर हिसाब नहीं तैयार हुआ है। इसकी वजह से वहां के भी कलेक्टर परेशान हैं कि कैसे हिसाब दिया जाए?

क्या कहते हैं जानकार:

महानदी भवन के उच्च पदस्थ सूत्रों की मानें तो कोरबा, दंतेवाड़ा जैसे जिलों में कलेक्टरों में मनमाने तौर पर खर्च किया हैं। वहीं, कुछ जिलों में कलेक्टरों ने बेहतर काम भी किया है, लेकिन डीएमएफ की उपयोगिता से अलग काम करने के कारण वे भी हिसाब देने में परेशान हो रहे हैं।

कुछ कलेक्टरों ने स्थानीय जरूरतों को देखते हुए फंड को खर्च किया है। ऐसे में बेहतर इस्तेमाल करने वाले कलेक्टर भी खर्च की जानकारी देने के दायरे में आ गये हैं। बताया जा रहा है कि बीजापुर में डीएमएफ से स्पोर्टस अकादमी और सरकारी अस्पताल में सुविधाओं का विस्तार किया गया है। प्रदेश में कांग्रेस सरकार आने के बाद डीएमएफ पर सबसे ज्यादा फोकस है।

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कांग्रेस सरकार ने ये किया बदलाव:

भाजपा सरकार में डीएमएफ की कमेटी से जनप्रतिनिधियों को बाहर कर दिया था और कलेक्टर को सभी अधिकार दे दिये गये थे। भूपेश सरकार ने इसे बदलते हुए जनप्रतिनिधियों की स्वीकृति को अनिवार्य किया है।

प्रदेश में लोकसभा चुनाव निपटने के बाद डीएमएफ पर रिकार्ड तलब करके सरकार ने यह संकेत देने की कोशिश की है कि वो किसी प्रकार की गड़बड़ी को बर्दाश्त नहीं करेगी।

क्या था पुराना नियम :

भाजपा सरकार में डीएमएफ मद से सरकारी भवन गार्डन, अफसरों के लिए लिफ्ट लगाने जैसे कई काम किए जा रहे थे। इन सारे कार्यों को भौतिक संरचना वाले काम की श्रेणी में रखा जाता है।

इस तरह के काम डीएमएफ से करवाने के पीछे वजह ये थी कि खुद सरकार ने तय किया था कि भौतिक संरचना के काम 60 फीसदी तथा अभौतिक संरचना के सभी कार्य स्वीकृत होंगे। अब कांग्रेस सरकार ने साफ किया है कि डीएमएफ से केवल वही काम किए जाएंगे, जिनका लाभ सीधे खनन प्रभावित लोगों को मिले।

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पैसों से क्या-क्या कर रहे थे अफसर :

अब तक डीएमएफ से खदान प्रभावित ग्रामों में महिलाओं को Ujjvala yojana के तहत शत प्रतिशत रसोई गैस, चूल्हा तथा पहला सिलेंडर देने की योजना पर खर्च हो रहा था।

कई परियोजनाओं के लिए वित्तीय राशि के लिए बैंकों तथा वित्तीय संस्थाओं से लोन लेकर विकास कार्य करवाए जाने के लिए ईएमआई का भुगतान न्यास निधि से करने के लिए नियमों में प्रावधान प्रस्तावित किया था। ऐसे में अब उन लोगों को परेशानी होगी ही। देखना ये होगा कि प्रदेश के 27 जिलों में से कितने जिलों के कलेक्टर्स अपने डीएमएफ का हिसाब कायदे से दे पाते हैं।

 

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