क्या आज का दौर आपातकाल से भी बद्दतर?

मो. अजहरूद्दीन जोया, रायपुर। समाजवादी पार्टी के फायर ब्रांड नेता आजम खां ( Azam Khan )  का कहना है “सन् 1975 के आपातकाल में जेल गया, लेकिन आज का दौर इंदिरा गांधी के घोषित आपातकाल से भी बद्दतर है।” आज मीडिया विकास के चरम पर है और सोशल मीडिया ( Social Media ) से हर आदमी जुड़ा है लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मुद्दे पर चर्चा का बाजार गर्म है। सत्ता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाम कसने की इच्छुक दिख रही है और विपक्ष इसे दबा हुआ बता रहा है।

सन् 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ( Former Prime Minister Indira Gandhi ) ने भारत की स्वतंत्रता के बाद तीसरी बार आपातकाल ( Emergency ) की घोषणा की थी। मीडिया के साथ नागरिकों के अधिकारों पर प्रतिबंध लगा दिए गए। विपक्षी नेताओं, विचारकों, लेखकों, पत्रकारों को मीसा एक्ट के तहत जेलों में डाल दिया गया। जो बच गए वह भूमिगत हो गए थे। 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक 21 महीने पूरे भारत में आपातकाल लागू रहा। लोग इसे भारतीय इतिहास का काला अध्याय कहते हैं। इससे सबक लेने की जरुरत है, न कि आपातकाल जैसी घटना को दोहराया जाए।

आज के इस दौर में भी विपक्ष द्वारा अघोषित आपातकाल की स्थिति बताई जा रही है। मीडिया और आम लोगों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर संकट का दौर बताया जा रहा है। कुछ वर्ष पूर्व भाजपा के शीर्षस्थ नेता लालकृष्ण आडवाणी ( Lal Krishna Advani ) ने अंग्रेजी अखबार को दिए साक्षात्कार में कहा था “लोकतंत्र को कुचलने वाली ताकतें पहले से अधिक ताकतवर है। पूरे विश्वास के साथ नहीं कहा जा सकता कि आपातकाल जैसी घटना फिर नहीं दोहराई जा सकती है। आपातकालीन परिस्थितियां पैदा कर नागरिक अधिकारों का हनन किया जा सकता है। आज मीडिया अधिक सतर्क है लेकिन वह लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्ध है?” एक अनुभवी व वरिष्ठ नेता तक में भविष्य में इसके दोहराए जाने का डर साफ दिखाई दे रहा है।

मौजूदा दौर में इसकी घोषणा तो नहीं हुई है। लेकिन वैसा दहशत भरा माहौल साफ दिखाई देता है। कलबुर्गी, गौरी लंकेश जैसे सत्ता विरोधी विचारकों की मौत , सत्ता विरोधी पत्रकारों को सोशल मीडिया खुलेआम धमकियां और अपशब्द अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ( Freedom of Expression ) पर सवाल जरूर खड़ा करते हैं। सार्वजनिक टिप्पणी या कटाक्ष पर डर बना रहता है। पत्रकारों और विचारकों पर संवैधानिक मर्यादा को तोड़ सार्वजनिक तौर गरजने बरसने वालों पर सत्ता और शासन का जोर नहीं है या इसे मौन समर्थन कहा जा सकता है।

मीडिया समूहों पर पूंजीवाद और बाजारवाद हावी है। सब सत्ता के महीमा मण्डन में लीन है। पत्रकार सत्ता और मालिक की कठपुतली बन गए हैं। जो विरोधी या स्वतंत्र बनना चाहता है, वह निकाल दिया जाता है। एक मीडिया चैनल पर सत्ता द्वारा प्रतिबंध के प्रयास का मुद्दा भी चर्चाओं में रहा। जब सत्ता की विचारधारा ही सर्वोपरि है और लेखनी गुलाम, तब इसे स्वतंत्रता नहीं कहा जा सकता है। वास्तविक मुद्दे और जनहित से भटकी मीडिया ने जनमानस में अपना विश्वास खो दिया है। सत्ता के सरकारी विज्ञापनरुपी अनुदान के बोझ तले दबी मीडिया ( Media ) को स्वतंत्र नहीं कहा जा सकता है।

मो. अजहरूद्दीन जोया
लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।

 

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