रायपुर। राजधानी के अंबेडकर अस्पताल (Ambedkar Hospital Raipur) में रेडियोडायग्नोसिस (Radiodiagnosis Department) तथा मेडिसीन विभाग के डाॅक्टरों ने विशेष चिकित्सा प्रक्रिया के जरिये मरीज को नई जिंदगी दी है। मरीज को लीवर एब्सेस (Liver Abscess) नामक बीमारी थी जिसका उपचार पिन होल तकनीक (Pinhole Technology) से करते हुए लीवर में स्थित फोड़े से मवाद निकाला गया। इस प्रक्रिया को रिअल टाइम अल्ट्रासाउंड गाइडेड ट्रीटमेंट (Real Time Ultrasound Guided Treatment) कहते हैं। जिसमें अल्ट्रासाउंड मशीन के जरिये वास्तविक स्थिति का पता लगाने के साथ उपचार किया जाता है।

क्या है लीवर एब्सेस बीमारी

लीवर का फोड़ा या एब्सेस (Liver Abscess) एक ऐसी बीमारी है जिसमें लीवर में कोई गांठ या फोड़ा हो जाता है। इसे लीवर एब्सेस या जिगर का फोड़ा भी कहते हैै। इस दौरान लीवर में बहुत अधिक मात्रा में मवाद या पस एकत्रित हो जाता है। इसके लक्षण आमतौर पर लोगों को समझ नहीं आते क्योंकि वो इसे सामान्य पेट दर्द समझ लेते हैं जबकि ऐसा नहीं है।

मरीज को थी पेट दर्द की शिकायत

बैकुंठपुर कोरिया का 52 वर्षीय एक मरीज पेट दर्द और तेज बुखार के साथ 16 जुलाई को अम्बेडकर अस्पताल (Ambedkar Hospital Raipur) के मेडिसीन रोग विशेषज्ञ डाॅ. आर. के. पटेल के पास पहुंचा। मरीज की स्थिति को देखते हुए डाॅ. पटेल ने तुरंत प्रारंभिक जांच व सोनोग्राफी की सलाह दी। रेडियोडायग्नोसिस के इंटरवेंशन रेडियोलाॅजिस्ट डाॅ. विवेक पात्रे ने मरीज की सोनोग्राफी की जिसमें मरीज के लीवर के अंदर बहुत बड़ा फोड़ा (एब्सेस) दिखाई दिया। मरीज की स्थिति बेहद गंभीर होने के कारण डाॅ. पात्रे ने लीवर में स्थित फोड़े से मवाद को तुरंत निकालने का निर्णय लिया।

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पिन होल तकनीक से उपचार

मरीज का इलाज पिन होल तकनीक (Pinhole Technology) से किया गया। पिन होल तकनीक अर्थात् बिना चीर-फाड़ के नीडिल की सहायता से लीवर के मवाद निकालने की एक प्रक्रिया। अल्ट्रासाउंड मशीन में देखते हुए फोड़े पर नीडिल डालते हुए वायर की सहायता से नली डालकर मवाद को बाहर निकाला। मवाद अत्यंत गाढ़ा था इसलिए उसको पतला करने के लिए डाॅ. विवेक पात्रे ने नई तकनीक का किया। यदि मवाद को पतला नहीं करते तो वह ट्यूब की सहायता से बाहर नहीं निकलता। फोड़े से करीब ढाई से तीन लीटर मवाद निकला।

पूरी तरह से स्वस्थ है मरीज

पिन होल तकनीक के लिए मरीज को बेहोशी की जरूरत नहीं पड़ी। केवल उसी स्थान को सुन्न किया गया जहां से मवाद निकालना था। उपचार से संतुष्ट मरीज की पत्नी मीना द्विवेदी का कहना है कि मेरे पति यहां बेहोशी की हालत में आये थे। उपचार के बाद आज वे बिलकुल स्वस्थ्य हैं और डाॅक्टरों ने उनका त्वरित इलाज किया इससे हम लोग खुश हैं।

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 30 से 40 साल की उम्र के बाद लीवर फंक्शन टेस्ट जरूरी

अंबेडकर अस्पताल रायपुर (Ambedkar Hospital Raipur) के मेडिसीन रोग विशेषज्ञ डाॅ. आर. के. पटेल का कहना है कि लीवर से संबंधित बीमारियों का कोई लक्षण नजर नहीं आते इसलिए 30 से 40 साल की उम्र के बाद सभी को साल में एक बार लीवर फंक्शन टेस्ट और सोनोग्राफी जरूर करवाना चाहिए। बैक्टीरिया के लिए रक्त का कल्चर परीक्षण, लीवर बायोप्सी, लीवर इन्फेक्शन परीक्षण, सीबीसी इत्यादि जांच महत्वपूर्ण होते हैं। पेट के अल्ट्रासाउंड और सीटी स्कैन से लीवर एब्सेस की जांच की जाती है।

रेडियोडायग्नोसिस उपकरणों से जांच के साथ उपचार संभव

वर्तमान में नई तकनीक के आ जाने से रेडियोडायग्नोसिस उपकरणों जैसे- एक्स रे, सोनोग्राफी तथा सीटी स्कैन जैसी मशीन का उपयोग न केवल जांच में बल्कि उपचार में भी किया जा रहा है। इनकी सहायता से जोड़ो-मांसपेशियों , किडनी व पित्ताशय की पथरी, एबलेशन, ट्यूमर और सिस्ट इत्यादि बीमारी का उपचार तथा जांच के लिए उत्तकों के नमूने लेने की सुविधा भी उपलब्ध है।
डाॅ. एस. बी. एस. नेताम 
अध्यक्ष रेडियोडायग्नोसिस विभाग, अंबेडकर अस्पताल रायपुर

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