रायपुर। पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के मीडिया प्रभारी व पूर्व प्रदेश कार्यसमिति सदस्य भाजपा आईटी सेल देवेंद्र गुप्ता के सोशल मीडिया फैसबुक जारी पोस्ट से भाजपा संगठन में बवाल मच गया है।

खुशबू को मुट्ठी में कैद कर पाना नामुमकिन है….टैग से जारी इस पोस्ट में पूर्व मुख्यमंत्री डा रमन सिंह और तत्कालीन भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष धरमलाल कौशिक पर सनसनीखेज आरोप लगाते हुए उन कारणों का जिक्र किया गया है जिसकी वजह से 15 साल से प्रदेश में काबिज भाजपा सरकार को विधाानसभा चुनाव में शर्मनाक हाल का सामना करना पड़ा। इस पोस्ट में पार्टी के कददावर नेताओं को विधानसभा चुनाव में हरा कर किस तरीके से निपटाया गया है उसकी पूरी पोल बेवाकी से खुल गई है।

 

ये है पूरा खुलासा,देवेंद्र गुप्ता की पोस्ट का मजमून

 

खुशबू को मुट्ठी में कैद कर पाना नामुमकिन है….
आका और गुलाम की जोड़ी अगर विजय बघेल जी को पाटन विधानसभा की टिकट दे देती तो शायद भूपेश बघेल चुनाव नहीं जीत पाते।विधानसभा में आका-गुलाम (रमन-कौशिक) ने एक तीर से कई निशाने लगाए थे। अपने इस निशानेबाजी के शौक में राज्य की सत्ता ही गंवा बैठे।

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अब मेरी बातों को समझियेगा…कुर्मी समाज के तात्कालिक प्रदेश विजय बघेल को उनके गृह क्षेत्र पाटन से टिकट नहीं दिया था,जबकि वे मजबूत दावेदार थे और उनके जीतने की संभावना प्रबल थी। उनके स्थान पर साहू समाज के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष मोतीलाल साहू जी को टिकट दिया गया।

जबकि श्री साहू पाटन से लड़ना ही नहीं चाह रहे थे। उनके लिए सुविधाजनक सीट रायपुर ग्रामीण या बलौदाबाजार थी। मैं मूलतः दुर्ग का हूं,इसलिए पाटन के समीकरण से भलीभांति परिचित हूं। साहू जी का स्नेह मेरे साथ रहा है इसलिए मैंने माध्यम से उन्हें कहा कि आप टिकट लौटा दीजिए। आपके साथ साजिश हो रही है। उनका जवाब था अगर टिकट लौटाया तो दोबारा कभी टिकट नहीं मिलेगा।

आखिरकार वे चुनाव लड़े और भूपेश बघेल जी के हाथों परास्त हो गए।

इस चुनाव में 2 दिग्गज एक साथ निपटा दिए गए। मोती साहू जी चुनाव हार गए और विजय बघेल जी बाहर ही रहे। दो बड़े समाजों के मुखियाओं को रमन-कौशिक ने तरीके से निपटा दिया।

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अगर इन दोनों को मनचाहे जगह से टिकट मिलती तो निश्चित तौर पर जीतते और अगर भाजपा की सरकार बनती तो मंत्री भी बनते। आगे बढ़ने की संभावना प्रबल होती।

पर आका इन्हें अपना गुलाम कभी नहीं बना पाते क्योंकि ये दोनों अपनी-अपनी जगह शेर हैं। इसलिए यह षड्यंत्र हुआ। ऐसा समीकरण लगभग पूरे प्रदेश में निपटने और निपटाने के हिसाब से टिकट बांटे गए। इस चक्कर मे पूरी पार्टी को ही निपटा दिए।

मैंने तो एक विधानासभा सीट का उदाहरण सामने रखा है। दर्जनों विधानसभा की सत्यकथा मेरे पास है।
अब मैं अपनी पहली पंक्ति “खुशबू को मुट्ठी में कैद कर पाना नामुमकिन है…” में यानी विजय बघेल जी पर आता हूँ। विजय बघेल जी को योग्यता-पात्रता के बावजूद आका-गुलाम ने उन्हें विधानसभा जाने से रोका था। परंतु लोकसभा चुनाव के सभी सर्वे में विजय बघेल पहले नंबर पर थे। टिकट दिल्ली ने तय की।
लोकसभा के पहले मेरे पोस्ट में भी आप देख सकते है। स्पष्ठ लिखा था। कि विजय बघेल जी की जीत का आंकड़ा 2 लाख के पार होगा।

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वे जीते भी। अब सांसद के रूप में वे दिल्ली पहुंच चुके हैं। उनसे उम्मीद करूँगा की वे निश्चित रूप से राज्य संगठन में हो रही गड़बड़ियों से शीर्ष नेतृत्व को अवगत कराएंगे।

शेष:- विधानासभा चुनाव में आका ने संतोष पांडे जी को भी कवर्धा से टिकट न देकर अपने एक गुलाम को टिकट दिया था। जिसने मोहम्मद अकबर के हाथों करारी हार का कीर्तिमान रच डाला। आखिरकार दमदार संतोष पांडे जी मोदी-शाह से राजनांदगांव लोकसभा का टिकट लाने में सफल रहे और शानदार जीत दर्ज की। कुल मिलाकर यह कह सकते हैं कि राज्य भाजपा के कर्ताधर्ताओं ने तश्तरी में कांग्रेस को सत्ता भेंट की है।

(देवेंद्र गुप्ता-पूर्व प्रदेश कार्यसमिति सदस्य भाजपा आईटी सेल)

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