निजी अस्पतालों में कोरोना मरीज़ों का मुफ्त इलाज़ हो
निजी अस्पतालों में कोरोना मरीज़ों का मुफ्त इलाज़ हो

श्याम वेताल

पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के परिणाम 2 मई को आ गए और पश्चिम बंगाल को छोड़कर सभी जगह अनुमान के अनुरूप ही परिणाम आए। असम में भाजपा और केरल में एलडीएफ की वापसी स्पष्ट हो गई जबकि, तमिलनाडु में डीएमके ने अपना परचम लहरा दिया। पुडुचेरी में एनडीए आगे है।

इन चुनाव परिणामों सारे देश की निगाहें पश्चिम बंगाल पर ही लगी थी क्योंकि, भाजपा ने बंगाल जीतने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्ढा की 100 से अधिक रैलियों के अलावा कई पार्टी नेताओं ने बंगाल में महीनों से डेरा डाल रखा था।

पार्टी ने बंगाल से ममता बनर्जी और उनकी तृण मूल कांग्रेस को सत्ता से निकाल बाहर करने के लिए सारे घोड़े खोल दिए थे लेकिन, आखिर हुआ वही जो ममता बनर्जी के चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने एक इंटरव्यू में दावा किया था। प्रशांत किशोर ने कहा था कि भाजपा अगर 100 सीटों से ज्यादा हासिल कर पाई तो मैं अपना काम छोड़ दूंगा। मानना पड़ेगा पीके के कैलकुलेशन और सेल्फ कॉन्फिडेंस को।

See also  खबर जरा हट के: जब गाय को साक्षी मानकर हुआ विवाह, हाथ में सीएए समर्थन की मेहंदी लगाकर पहुंचा दूल्हा

बंगाल चुनाव परिणामों के साथ सारे देश की निगाहें नंदीग्राम पर भी टिकी थीं। नंदीग्राम से ममता बनर्जी मैदान में थीं। उनके खिलाफ भाजपा के टिकट पर शुभेंदु अधिकारी लड़ रहे थे, शुभेंदु पहले ममता बनर्जी के ही साथ थे और उनके विश्वस्त भी थे लेकिन, चुनाव से पहले ममता का साथ छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए थे।

नंदीग्राम शुभेंदु का अपना निर्वाचन क्षेत्र रहा है। ममता बनर्जी शायद शुभेंदु को सबक़ सिखाने के लिए ही अपना भवानीपुर क्षेत्र छोड़कर नंदीग्राम आयीं। वे यहाँ से भले चुनाव हार गई लेकिन, उन्होंने शुभेंदु को सबक़ सिखा दिया।

बंगाल में भाजपा ने जिस पैमाने पर चुनाव प्रचार किया था उससे हर कोई यही कह रहा था कि भाजपा अगर जीत न भी पाई तो भी टीएमसी को कड़ी टक्कर जरूर देगी। बंगाल में इस कड़ी टक्कर को ‘हड्डा -हड्डी ‘ कहा गया लेकिन, परिणाम बताते हैं कि यह कोई हड्डा -हड्डी लड़ाई नहीं रही।

See also  Good News : लॉकडाउन के बीच खुले रहेंगे देशभर के बैंक, ताकि समय पर दी जा सके सेलरी और पेंशन

ममता की पार्टी ने डबल सेंचुरी क्रास कर ली और भाजपा को सेंचुरी के काफी पीछे रोक दिया। वर्ष 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 18 सीटें जीती थीं। अतः इन 18 लोकसभा सीटों के हिसाब से भाजपा को 117 विधानसभा सीटें जीतनी चाहिए थी लेकिन? ऐसा हुआ नहीं। इसका अर्थ है कि बंगाल में भाजपा की लोकप्रियता घटी है।

बंगाल में तीसरी बार सरकार बनाने जा रही ममता के सामने राज्य की जनता की अपेक्षाओं को पूरा करने की चुनौती के साथ केंद्र की ओर से खड़ी की जाने वाली दिक्कतें भी होंगी। केंद्र सबसे पहले ममता को कोविड -19 के मामले में घेर सकती है। क्योंकि, चुनाव के बाद बंगाल में भी कोरोना जोर पकड़ रहा है। इसके अलावा बंगाल को मिलने वाली आर्थिक मदद को भी लटकाया जा सकता है।

बहरहाल, बंगाल की शेरनी केंद्र के हर दांव-पेंच से निपटने में सक्षम है। ममता बनर्जी खुद चुनाव भले हार गयीं हों लेकिन, विधायक दल का नेता उन्हें ही चुना जाएगा और वे ही राज्य की मुख्यमंत्री बनेंगी। 6 महीने के अंदर उन्हें कहीं से चुनाव जीतना होगा।

See also  RR vs SRH : क्या आज भी जारी रहेगा राजस्थान का विजय रथ या हैदराबाद की टीम दिखाएगी दम? ऑरेंज आर्मी के सामने वैभव सूर्यवंशी और रवि बिश्नोई की चुनौती

ममता का हारना ही भाजपा की ख़ुशी का एक मात्र कारण बन सकता है वरना, पूरा चुनाव भाजपा के लिए निराशाजनक ही रहा। तृण मूल पार्टी ने गढ़ तो जीत ही लिया, भले शेरनी को हारना पड़ा। शेरनी हार कर भी जीती है।

टीआरपी के लिए विशेष आलेख