भारत सरकार के एक फैसले से टल सकती थीं एक लाख मौतें- अमेरिका, ब्रिटेन में हुई स्टडी में विशेषज्ञों ने किया आकलन
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टीआरपी डेस्क। अगर भारत में लॉकडाउन लगाने को लेकर मार्च की शुरुआत में ही फैसला हो गया होता, तो कोरोना के 90 लाख से 1.3 करोड़ केस रोके जा सकते थे। इसके अलावा तकरीबन 1 लाख मौतों को भी होने से रोका जा सकता था। यह अमेरिका और ब्रिटेन में हुई स्टडी में कहा गया है।

बता दें कि भारत में कोरोना वायरस की दूसरी लहर ने जमकर कहर बरसाया। अप्रैल-मई तक तो कोरोना के केस प्रतिदिन तीन लाख के आंकड़े के पार पहुंच गए वहीं मौतों का आंकड़ा 6 हजार तक पहुंच गया था। हालांकि, जून के मध्य से कोरोना संक्रमण की रफ्तार धीमी पड़ी है।

गौरतलब है कि कई पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स कोरोना की दूसरी लहर के दौरान चुनावी रैलियों, कुंभ मेला और सामाजिक कार्यक्रमों पर रोक लगाने को लेकर तर्क दे चुके हैं। हालांकि, यह पहली ऐसी स्टडी है, जिसमें दूसरी लहर के दौरान रोकी जा सकने वाली मौतें और केसों के बारे में जानकारी दी गई है।

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लॉकडाउन का फैसला राज्य सरकारों को लेना था

बता दें कि भारत में दूसरी लहर आने के बाद केंद्र सरकार की तरफ से लॉकडाउन का ऐलान नहीं किया गया, बल्कि यह फैसला राज्यों पर छोड़ दिया गया था। पूर्ण लॉकडाउन का ऐलान सबसे पहले महाराष्ट्र में हुआ था, जहां 14 अप्रैल से प्रतिबंध लगाए गए। कई राज्यों में तो कोरोना में जबरदस्त बढ़ोतरी होने के बावजूद प्रतिबंध से पहले चुनाव प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार किया गया।

अमेरिका और ब्रिटेन के रिसर्च ग्रुप की तरफ से की गई इस स्टडी में यह पता लगाया गया है कि कैसे महाराष्ट्र में दिसंबर 2020 में ही डेल्टा वैरिएंट की पहचान के बाद केस बढ़ना शुरू हो गए। विश्लेषण में कहा गया है कि 1 मार्च से 15 मई तक कोरोना के पीक समय के दौरान आंशिक प्रतिबंधों के जरिए भी भारत में हुई 1,09,000 में से 90 फीसदी मौतें रोकी जा सकती थीं।

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कोरोना की दूसरी लहर में ढाई गुना तक बढ़ गए थे कोरोना केस: भारत में कोरोना की दूसरी लहर फरवरी के मध्य में शुरू हुई थी। तब तक देश में करीब 1 करोड़ 8 लाख केस थे, जो कि 15 मई तक बढ़कर 2.43 करोड़ तक पहुंच गए। 1 मार्च से 15 मई तक देश में हुई मौतों का आंकड़ा भी 1.57 लाख से बढ़कर 2.66 लाख के पार चला गया था।

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