Mann Ki Baat, PM Modi remembered hockey magician Major Dhyan Chand
चौंक गया था तानाशाह हिटलर जब देखा था हॉकी के जादूगर का खेल, जन्मदिन पर मोदी ने दिया स्लोगन, कही यह ख़ास बात

नई दिल्ली। पीएम मोदी ने मन की बात में हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को उनकी जयंती पर याद किया।वहीं पीएम मोदी ने हाल ही में संपन्न हुए टोक्यो ओलंपिक में भारत की पुरुष और महिला हॉकी टीमों का प्रदर्शन शानदार और पदक जीतने का भी जिक्र किया, वहीं इस ऐतिहासिक प्रदर्शन ने एक बार फिर भारतीय हॉकी में नई जान फूंक दी है।

महिला टीम ने बेहतरीन प्रदर्शन किया लेकिन पदक से चूक गई। साथ ही ने इस बार चार दशक बाद भारत को ओलिंपिक में हॉकी का पद मिला। उन्होंने कहा कि इससे मेजर ध्यानचंद जी आज जहां भी कहीं होंगे कितने खुश होंगे। पीएम मोदी ने कहा कि 41 साल बाद हॉकी में जान आई है। आज हॉकी को लेकर आकर्षण नजर आ रहा है। उन्होंने कहा कि आज जो खेल को लेकर देश में जो ललक नजर आ रही है, ये ही मेजर ध्यानचंद जी को श्रद्धांजलि है।

मोदी ने दिया नया नारा- खेलें भी, खिलें भी

पीएम मोदी ने कहा कि मेरे प्यारे नौजवानों, हमें अलग-अलग प्रकार के खेलों में महारत हासिल करनी चाहिए। गांव-गांव खेलों की स्पर्धाएं निरंतर चलती रहनी चाहिए। उन्होंने कहा कि स्पर्धा से ही खेलों का विस्तार होता है। खेल का विकास होता है तो खिलाड़ी भी उसी में से निकलते हैं। पीएम मोदी ने कहा कि आइए देशवासियों हम सभी इस मोमेंटम को आगे बढ़ा सकते हैं, जितना योगदान हम दे सकते हैं, सबका प्रयास से इस मंत्र से साकार करके दिखाएं। सबके प्रयास से ही भारत खेलों में वो ऊंचाई प्राप्त कर सकेगा जिसका वो हकदार है। पीएम मोदी ने इस मौके पर एक नया नारा- खेलें भीं, खिलें भी दिया।

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देश में ऐसे बहुत से लोग हुए हैं, जिन्होंने अपने क्षेत्र में इतनी महारत हासिल कि उनका नाम इतिहास के पन्नों में सदा के लिए दर्ज हो गया। भारत में हॉकी के स्वर्णिम युग के साक्षी मेजर ध्यानचंद का नाम भी ऐसे ही लोगों में शुमार है। बिजली की तेजी से दौड़ने वाले ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त 1905 को हुआ था। उनके जन्मदिन को देश में राष्ट्रीय खेल दिवस के तौर पर मनाया जाता है।

ध्यान सिंह से ध्यानचंद बनने तक का सफर

ध्यानचंद साल 1926 में पहली बार विदेश (न्यूजीलैंड) गए थे। यहां टीम ने एक मैच में 20 गोल कर दिया, जिसमें से 10 गोल तो अकेले ध्यानचंद ने किये थे। न्यूजीलैंड में भारत ने 21 मैचों में से 18 मैच जीते और पूरी दुनिया ध्यानचंद को पहचानने लगी। कुमार विश्वास कहते हैं,‘ऐसा कहा जाता है कि उस समय ध्यानचंद का ऐसा खौफ था कि 1928 में ब्रिटेन की टीम ने ध्यानचंद की टीम से हार के डर से ओलंपिक से अपना नाम ही वापस ले लिया था।

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चौंक गया था तानाशाह हिटलर

तानाशाह हिटलर जर्मनी की टीम को किसी भी कीमत पर जीतते देखना चाहता था। भारत को हराने के लिए मैदान गीला कर दिया गया, ताकि सस्ते जूते पहनने वाले भारतीय खिलाड़ी अपने पांव नहीं जमा सकें। ब्रेक तक उनकी यह रणनीति काम भी आई, मगर ब्रेक के बाद स्टेडियम में बैठे दर्शक तब चौंक गये जब उन्होंने ध्यानचंद को नंगे पांव खेलते देखा। भारत ने जर्मनी को हिटलर की आंखों के सामने 8-1 से रौंद दिया था।

हिटलर ने दे दिया था फील्ड मार्शल बनाने का ऑफर: हिटलर बीच मैच से ही उठकर चला गया, मगर ध्यानचंद के प्रदर्शन से काफी प्रभावित हुआ और भारतीय टीम को भोजन पर बुलाया। ध्यानचंद से हिटलर ने पूछा, ‘हॉकी खेलने के अलावा क्या करते हो? तो जवाब मिला ‘मैं इंडियन आर्मी में लांस नायक हूं…।’ इसपर हिटलर ने कहा, ‘मेरे यहां आ जाओ, मैं तुम्हें फील्ड मार्शल बना दूंगा…। ध्यानचंद ने बड़ी विनम्रता से इनकार कर दिया था।’

हॉकी के जादूगर माने जाते हैं ध्यानचंद

ध्यानचंद को भारत में हॉकी का जादूगर कहा जाता है। 1926 से 1949 तक के करियर में ‘दद्दा’ ने देश को हॉकी में 1928, 1932 और 1936 का ओलिंपिक गोल्ड दिलाया। इलाहाबाद में पैदा होने वाले ध्यानचंद की कर्मस्थली झांसी रहा। विदेशी समझते थे कि उनकी हॉकी स्टिक से बॉल चिपक जाती है। जब वह बॉल लेकर आगे निकलते तो हॉकी में बॉल ऐसे चलती थी, जैसे चिपक गई हो, इसलिए उन्हें हॉकी का जादूगर कहा जाता था।

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सर्वोच्च खेल पुरस्कार का नाम होगा ध्यानचंद

हाल ही में पीएम नरेंद्र मोदी ने एक क्रांतिकारी फैसला लिया था। भारत के सर्वोच्च खेल सम्मान खेल रत्न पुरस्कार का नाम राजीव गांधी की जगह मेजर ध्यानचंद के नाम पर किया गया। जब ओलिंपिक में चार दशक बाद भारतीय हॉकी टीम ने मेडल लाया, उसके बाद ही यह क्रांतिकारी फैसला लिया गया था।

जुनून में तब्दील हुआ शौक

मेजर ध्यानचंद के पिता हॉकी के एक अच्छे खिलाड़ी थे, मगर ध्यानचंद को बचपन में हॉकी से कोई लगाव नही था। उन्हें रेस्लिंग पसंद थी। जब वे सेना में भर्ती हुए तो शारीरिक गतिविधि के लिए उन्होंने हॉकी खेलना शुरू किया और यहीं से उन्हें हॉकी से लगाव हुआ और यही लगाव पहले शौक में और फिर जुनून में तब्दील हो गया।