रायपुर।अयोध्या में आगामी 22 जनवरी को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम को भव्य बनाने के लिए जोरशोर से तैयारियां चल रही हैं । श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की तरफ से रामलला की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल होने के लिए गणमान्य लोगों को आमंत्रण भेजा जा रहा है । इसी कड़ी में प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम का आमंत्रण छत्तीसगढ़ की प्रयाग नगरी राजिम के वार्ड नंबर एक गांधीनगर की रहने वाली 80 वर्षीय बिहुलाबाई को भी न्यौता भेजा है। बिहुलाबाई नगर के गली-मोहल्लों में कचरा बीनकर अपना गुजर-बसर करती हैं। रोज 40 से 50 रुपये कचरा बेचकर कमा लेती हैं। सबसे बड़ी और खास बात ये है कि उन्होंने अपनी इस 50 रुपए की आमदनी में से 20 रुपये भगवान श्रीराम मंदिर अयोध्या के निर्माण के लिए दान की थीं पर हैरानी की बात ये है कि उनके अयोध्या जाने के लिए अब तक कोई इंतजाम नहीं हो पाया है। ऐसे में वो शासन स्तर पर या किसी दानदाता की बांट जोह रही हैं।

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विश्व हिंदू परिषद के प्रांत अध्यक्ष चंद्रशेखर वर्मा ने खुद राजिम आकर उन्हें अयोध्या मंदिर जाने का आमंत्रण पत्र दिया है। इसके बाद बिहुलाबाई के घर परिवार में खुशियां छा गई हैं। सभी भारी खुश हैं। अपने वो इस नेक कार्य की वजह से राजिम नगर समेत देश-प्रदेश में चर्चा का विषय बनी हुई हैं। जैसे ही ये खबर लोगों को मिल रही है, सभी उनसे मिलने के लिए उनके घर पहुंच रहे हैं। घर पर सामाजिक पदाधिकारियों की भीड़ उमड़ रही है पर हैरानी की बात ये है कि अभी तक कोई जनप्रतिनिधि या जिला मुख्यालय से कोई भी प्रशासनिक अधिकारी उन्हें अयोध्या जाने का प्रबंध नहीं किए हैं। उनके पास जाने के लिए फूटी कौड़ी भी नहीं है। ऐसे में वो किसी दानदाता की बांट जोह रही हैं। फिलहाल, उनके अयोध्या जाने को लेकर भी संशय बना हुआ है।

अयोध्या जाना चाहती हैं पर पैसा न होना रास्ते में बनी रुकावट
बिहुलाभाई का कहना है कि वो अयोध्या जाना चाहती हैं पर पैसा न होना रास्ते में रुकावट बन रही है। न ही कोई दानदाता सामने नजर आ रहे हैं, जो उन्हें रामलला का दर्शन कराए। उन्होंने बताया कि वो प्रतिदिन सुबह 2 घंटा कचरा बीनने का काम करती हैं। कचरा मिल जाए तो अच्छी बात ना मिले तो सीधे राजीवलोचन मंदिर जाती हैं और वहां भिखारियों की कतार में बैठकर भिक्षा मांगती हैं। कहने के लिए उनके तीन बेटे एवं तीन बेटियां हैं पर सभी अपने-अपने परिवार में व्यस्त रहते हैं और वो अकेले झोपड़ी में रहने को मजबूर हैं। कचरा बीनने और भीख मांगने से जो रुपए इकट्ठे हो जाते हैं, उसी से दो वक्त की रोटी का इंतजाम हो जाता है।

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पति ने बंदर की याद में बनवाया था हनुमान मंदिर
बिहुला बाई ने बताया कि उनके पति माकडु देवार एक बंदर पाले हुए थे। इस बंदर को गली-मोहल्लो में ले जाकर नचाते थे और उससे जो पैसे मिलते थे, उसी से परिवार का गुजर-बसर होता था। एक दिन अचानक बंदर की मृत्यु हो गई। इसका उन्हें बहुत गहरा दुख हुआ। उसकी याद में उनके पति ने घर के सामने ही छोटा सा हनुमान मंदिर बनवाया है, जहां पर वो रोज पूजा-पाठ करती हैं और दीया जलाती हैं। इस दौरान उनके परिवार के सभी लोग मौजूद रहते हैं।

पेंशन और राशन ही सहारा
उन्होंने बताया कि उन्हें 500 रुपये वृद्धापेंशन और सोसाइटी से 35 किलो चावल मिलता है। महंगाई के इस दौर में 500 रुपए में गुजारा नहीं हो पाता। मजबूरन कचरा बीनने और भीख मांगने का काम करना पड़ता है। उनके बेटे भी कबाड़ी का काम करते हैं पर कोई उनका सहारा नहीं है।

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