टीआरपी डेस्क। जब देश की बेटियां ओलंपिक और एशियाई खेलों जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तिरंगा लहराती हैं, तो हर जगह तालियां बजती हैं। लेकिन जब वही बेटियां मजबूरी में खेल छोड़ देती हैं और दूसरे राज्यों में रोजगार खोजती हैं, तो सवाल उठता है कि क्या सरकार की जिम्मेदारी सिर्फ मेडल के समय फोटो खिंचवाने तक सीमित है ?

ये कहानी है बलविंदर कौर मेहरा की। दुर्ग की रहने वाली बलविंदर, जिन्होंने भारत को 2 अंतरराष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिताओं में कांस्य पदक दिलाए, आज छत्तीसगढ़ में नौकरी के लिए दर-दर भटकने के बाद ओडिशा में काम कर रही हैं।

एक खिलाड़ी की शुरुआत, जो संघर्ष बन गई

बलविंदर के पिता बस ड्राइवर थे। मां ने हमेशा उन्हें खेल में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। छठवीं कक्षा में हॉकी से जुड़ीं और मेहनत के दम पर 2010 में SAI भोपाल में चयन हुआ। 2012 में उन्होंने अंडर‑18 जूनियर एशिया कप (बैंकॉक) और लाल बहादुर शास्त्री अंडर‑21 इंटरनेशनल टूर्नामेंट (नई दिल्ली) में देश का प्रतिनिधित्व किया। दोनों बार भारत ने कांस्य पदक जीता। इसके बाद ओलंपिक कैंप में जगह मिली, लेकिन पिता की मृत्यु और गंभीर चोट ने इस रफ्तार को रोक दिया।

See also  बरसात के पानी से निपटने के लिए लोगों ने घर के सामने खडी कर दी 4 फीट की दीवार

बलविंदर ने नहीं मानी हार

2013 से 2021 तक बलविंदर लगातार छत्तीसगढ़ की सीनियर महिला हॉकी टीम का हिस्सा रहीं। कई राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में पदक जीते। 2019 में राज्य सरकार ने उन्हें वीर शहीद पंकज विक्रम सम्मान से नवाज़ा। लेकिन, जब नौकरी की बात आई, तब कोई जवाब नहीं आया। स्पोर्ट्स कोटे से आवेदन किए, शिक्षा, खेल, पुलिस हर विभाग में दस्तक दी। फॉर्म लिए गए, आश्वासन मिले, लेकिन नौकरी नहीं मिली।

मजबूरी में छोड़ना पड़ा राज्य

2021 में आर्थिक तंगी बढ़ी तो बलविंदर को छत्तीसगढ़ छोड़कर आंध्र प्रदेश के अनंतपुर में RDT स्पोर्ट्स अकादमी में कोच की नौकरी करनी पड़ी। वहां जूनियर लड़कियों को हॉकी सिखाया। फिर कोचिंग में निखार लाने के लिए बेंगलुरु में NIS का कोर्स किया। अब वो ओडिशा के नवल टाटा हॉकी अकादमी में बतौर असिस्टेंट कोच काम कर रही हैं। उनकी कोचिंग में महिला टीम ने कई राष्ट्रीय टूर्नामेंट जीते। बलविंदर को नीदरलैंड भी भेजा गया, जहां उनके प्रशिक्षण में महिला हॉकी टीम ने बेहतर प्रदर्शन किया।

See also  SUSPENDED : 5 दिनों से गैरहाजिर प्रधान पाठक ने गलत तरीके से डाल दी अपनी हाजिरी, शराब सेवन का भी आरोप, जांच के बाद DEO ने किया सस्पेंड

पीछे छूटी मां, अधूरी उम्मीदें

बलविंदर की मां रायपुर में अकेली रहती हैं। 68 साल की उम्र में अब भी अपनी बेटी के छत्तीसगढ़ लौटने की राह देखती हैं। लेकिन, बलविंदर खुद कहती हैं, यहां मेरे लिए कोई भविष्य नहीं बचा है।

सरकार के वादे बनाम जमीनी सच्चाई

राज्य सरकार कहती है कि राज्य अलंकरण सम्मान पाने वाले खिलाड़ियों को नौकरी मिलती है। लेकिन, बलविंदर की कहानी इस दावे को पूरी तरह खोखला साबित करती है। तो अब सवाल सिर्फ एक खिलाड़ी का नहीं, पूरे सिस्टम का है। क्या सरकार की खेल नीति सिर्फ कागज़ों तक सीमित है ? क्या पदक जीतने के बाद भी नौकरी के लिए भटकना खिलाड़ियों की नियति बन चुकी है ? और क्या भविष्य के खिलाड़ी इसे देखकर मैदान से दूर नहीं भागेंगे ?

बलविंदर की कहानी पूछ रही सवाल

बलविंदर अकेली नहीं हैं। राज्य में ऐसे कई खिलाड़ी हैं जो अपनी प्रतिभा के बावजूद आज किसी निजी संस्थान में कोचिंग दे रहे हैं, या खेल ही छोड़ चुके हैं। अगर ये हाल एक अंतरराष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी का है, तो बाकी खिलाड़ियों की स्थिति समझना मुश्किल नहीं। और अगर ऐसे हालात हैं, तो खेलों के विकास की बातें आखिर किसके लिए हो रही हैं ?

See also  भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री दुष्यंत कुमार गौतम आ रहे हैं छत्तीसगढ़, जमीनी स्तर पर पार्टी को मजबूत करने की होगी कवायद