बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने जल संसाधन अभियांत्रिकी एवं भूवैज्ञानिक सेवा भर्ती नियम, 2014 पर बड़ा फैसला सुनाया है। सहायक भू-जल विज्ञानी पद के लिए शैक्षणिक योग्यता को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने साफ किया कि भर्ती के लिए योग्यता तय करना राज्य सरकार का अधिकार है। इसके साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि इस पद पर अब केवल भूविज्ञान में स्नातकोत्तर डिग्री को ही मान्यता मिलेगी।

यह प्रकरण तब शुरू हुआ जब मधुकर पटेल, श्रुति वर्मा और कर्णिका द्विवेदी सहित कई उम्मीदवारों ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनका कहना था कि उन्होंने इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर से बी.टेक (कृषि अभियांत्रिकी) और एम.टेक (मृदा एवं जल अभियांत्रिकी) की डिग्री ली है, जो भू विज्ञान के बराबर मानी जानी चाहिए। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि फरवरी 2020 में जारी विज्ञापन में केवल भूविज्ञान को ही पात्रता के रूप में तय कर दिया गया, जिससे वे चयन प्रक्रिया से बाहर हो गए। उन्होंने भर्ती नियम 2014 की अनुसूची-तीन को चुनौती देते हुए एम.टेक (मृदा एवं जल अभियांत्रिकी) को भी मान्यता देने की मांग की थी।

See also  संदेशखाली मामला : गिरफ्तार पत्रकार को कलकत्ता हाई कोर्ट ने दी जमानत, आगे की कार्यवाही पर भी रोक लगाने का दिया आदेश

राज्य सरकार के वकीलों ने दी ये दलील

राज्य सरकार की ओर से पेश हुए वकीलों ने कहा कि भूविज्ञान और मृदा-जल अभियांत्रिकी दो अलग-अलग विषय हैं। भूविज्ञान का संबंध पृथ्वी की संरचना, खनिज, पेट्रोलियम, कोयला, बांध और जलाशयों से है, जबकि मृदा एवं जल अभियांत्रिकी कृषि क्षेत्र तक सीमित है। इसलिए दोनों को समान मानना संभव नहीं है। सरकार ने यह भी कहा कि किसी पद के लिए योग्यता तय करना नियोक्ता का अधिकार है और इसमें किसी तरह का भेदभाव नहीं है।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद माना कि भूविज्ञान और मृदा-जल अभियांत्रिकी अलग-अलग क्षेत्र हैं। इसलिए राज्य सरकार का निर्णय सही है और भर्ती नियम पूरी तरह संवैधानिक हैं।

गौरतलब है कि 2020 में जारी विज्ञापन के आधार पर चयन प्रक्रिया पहले ही पूरी हो चुकी है और चयनित उम्मीदवारों को नियुक्ति आदेश भी दिए जा चुके हैं।

See also  चुनाव से पहले ये 5 नगरपालिका अध्यक्ष अयोग्य घोषित, जानें पूरी खबर