crows in the sky टीआरपी न्यूज।
पितृ पक्ष में गाय, कुत्ता, कौआ को भोजन कराने की परंपरा चली आ रही है, लेकिन शहर के विस्तारीकरण के नाम पर अनेक मोहल्लों में पीपल, बरगद, नीम जैसे विशाल वृक्षों को काट दिए जाने से कौआ का बसेरा लगभग खत्म हो चुका है। कहीं भी कौआ दिखाई नहीं देता। यही कारण है कि इन दिनों पितृ पक्ष में कौआ को ढंूढने के लिए लोगों की नजरें आकाश की ओर लगी रहती है लेकिन दूर दूर तक कौआ नजर नहीं आता। इसके बावजूद पितरों को खाना खिलाने के लिए लोग कौआ के नाम पर ग्रास यानी भोजन निकालने की परंपरा निभा रहे हैं। ऐसे लोग मन ही मन में पितरों को याद करते हुए कौआ के आने का इंतजार करते हैं और कौआ के न आने पर निराश हो जाते हैं।
घर में कर रहे पूर्वजों को याद
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य नारायण जब कन्या राशि में विचरण करते हैं तब पितृलोक पृथ्वी लोक के सबसे अधिक नजदीक आता है। इन दिनों पितृ पक्ष मनाया जा रहा है, जो 21 सितंबर अमावस्या तिथि तक श्रद्धा भाव से घर-घर में मनाया जाएगा। 15 दिनों तक मनाए जाने वाले श्राद्ध पर्व में प्रत्येक घर में पूर्वजों को श्रद्धा भाव से याद किया जा रहा है। सामर्थ्य के अनुसार फल फूल, अन्न, मिष्ठान से ब्राह्मणों को भोज कराया जा रहा है। जिस तिथि को पूर्वज की मृत्यु हुई हो, उस तिथि पर श्राद्ध मनाया जा रहा है। अनेक परिवारों में पितृ पक्ष के 16 दिनों तक प्रतिदिन पितरों के निमित्त जल अर्पित करने की परंपरा निभाई जा रही है। धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि पितरों का पिण्ड दान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु, सुख-साधन तथा धन-धान्य आदि की प्राप्ति करता है।
पितृ ऋण से मिलती है मुक्ति
ऐसी मान्यता है कि श्राद्ध पक्ष में पूर्वज आस लगाए रहते हैं कि पुत्र-पौत्रादि पिण्ड दान करके तिलांजलि देंगे। इसी आशा के साथ पूर्वज पितृलोक से पृथ्वीलोक पर आते हैं। अपने परिवार को सुख, समृद्धि का आशीर्वाद देकर वापस लौट जाते हैं। यह भी मान्यता है कि जो लोग पूर्वजों को याद नहीं करते उन्हें पितृ दोष लगता है। पितृ दोष के कारण परिवार में अनेक समस्याएं आतीं हैं। श्राद्ध के द्वारा व्यक्ति पितृऋण से मुक्त होता है और पितरों को संतुष्ट करके स्वयं की मुक्ति के मार्ग पर बढ़ता है।
इस वर्ष, इन तिथियों पर श्राद्ध
7 सितम्बर – मूकबधिर (गूंगे बहरे पितृ का श्राद्ध, पूर्णिमा तिथि
08 सितम्बर प्रतिपदा (पड़वा) तिथि का श्राद्ध।
09 सितम्बर द्वितीया तिथि का श्राद्ध।
10 सितम्बर तृतीया एवं चतुर्थी तिथि का श्राद्ध।
11 सितम्बर पंचमी तिथि का श्राद्ध
12 सितम्बर षष्ठी तिथि का श्राद्ध।
13 सितम्बर सप्तमी तिथि तिथि का श्राद्ध।
14 सितम्बर अष्टमी तिथि का श्राद्ध।
15 सितम्बर नवमी तिथि का श्राद्ध, सौभाग्यवती (मातृ नवमी) श्राद्ध।
16 सितम्बर दशमी तिथि का श्राद्ध।
17 सितम्बर एकादशी तिथि का श्राद्ध।
18 सितम्बर द्वादशी तिथि का श्राद्ध (संन्यासियों का श्राद्ध)।
19 सितम्बर त्रयोदशी तिथि का श्राद्ध।
20 सितम्बर चतुर्दशी तिथि का श्राद्ध – अकाल मृत्यु (शस्त्र अथवा दुर्घटना में मृत्यु)
21 सितम्बर अमावस्या तिथि का श्राद्ध / सर्वपितृ श्राद्ध



