टीआरपी डेस्क। भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक ओंकारेश्वर, धार्मिक आस्था और परंपराओं की अनूठी नगरी है। यहां विजयादशमी (दशहरा) का पर्व बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, लेकिन खास बात यह है कि ओंकारेश्वर और आसपास के गांवों में कभी रावण दहन नहीं होता।
रावण दहन न होने की परंपरा
किवदंती और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, ओंकारेश्वर से 10 किलोमीटर के दायरे में किसी भी गांव में रावण दहन की परंपरा नहीं रही। साल 2013 में समीपवर्ती ग्राम शिवकोठी में कुछ युवाओं ने रावण का पुतला जलाया था, जिससे पूरे गांव में विवाद खड़ा हो गया। महिलाओं और पुरुषों के बीच मेल-मिलाप टूट गया और धार्मिक कार्यक्रमों में आने-जाने पर भी असर पड़ा। अंततः बुजुर्गों ने समझौता कराया और संकल्प लिया कि भविष्य में रावण दहन नहीं होगा।
क्यों नहीं जलाया जाता रावण?
ओंकारेश्वर के लोगों का मानना है कि रावण भगवान शिव का परम भक्त था और उसने भगवान को प्रसन्न करने के लिए अपने ही सिर अर्पित कर दिए थे। इसी भक्ति के कारण यहां रावण दहन की परंपरा नहीं रही। पंडा संघ के अध्यक्ष पंडित निलेश पुरोहित और मंदिर के पुजारी पंडित डंकेश्वर दीक्षित के अनुसार, यह परंपरा बहुत पुरानी है और आर्थिक कारणों के साथ-साथ नगरवासियों की आस्था से जुड़ी हुई है।
दशहरा उत्सव की अनूठी परंपरा
रावण दहन न होते हुए भी ओंकारेश्वर में विजयादशमी धूमधाम से मनाई जाती है। शाम को 7 बजे भगवान की भव्य सवारी मंदिर परिसर से निकलती है, मुख्य बाजारों और खेड़ापति हनुमान मंदिर से होकर गुजरती है, जहां शमी वृक्ष की पूजा होती है। इसके बाद सवारी मंदिर लौटती है और नगरवासी राजमहल पहुंचकर राजा राव पुष्पेंद्रसिंह से शुभकामनाएं लेते हैं। राजा अपनी प्रजा को श्रीफल और प्रसाद देकर आशीर्वाद देते हैं।
बुराइयों का प्रतीकात्मक दहन
ओंकारेश्वर में दशहरे का संदेश यही है कि रावण जलाने की बजाय, इंसान को अपने भीतर की बुराइयों को खत्म करना चाहिए। यहां प्रतीकात्मक रूप से केवल बुराइयों का नाश होता है, जबकि पुतला दहन की परंपरा नहीं निभाई जाती।
ओंकारेश्वर की यह अनूठी परंपरा हमें याद दिलाती है कि त्योहार का असली महत्व दिखावे या पुतला जलाने में नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे संदेश को समझने में है। यहां दशहरा भगवान ओंकारेश्वर की सवारी, राजपरिवार के साथ मिलन और आपसी भाईचारे का पर्व बनकर मनाया जाता है, जो आस्था और विश्वास का प्रतीक है।



