टीआरपी डेस्क। Faisal Malik Interview : कभी असिस्टेंट तो कभी लाइन प्रोड्यूसर बनकर अपने लिए सही रास्ता खोज रहे फैसल मलिक को तब कहां पता था कि सब कुछ उनकी एक्टिंग से आसान बनेगा। 2012 में फिल्माई गई ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर 2’ से शुरू हुए उनके अभिनय के सफर ने आज उन्हें घर-घर में ‘पंचायत’ के ‘प्रहलाद चा’ के रूप में पहचान दिला दी है। फैसल मलिक हिन्द युग्म उत्सव में शामिल होने रायपुर पहुंचे थे, इस दौरान उन्होंने ‘द रूरल प्रेस’ से खास बातचीत की। फैसल को ‘पंचायत’ के जरिए ख्याति तो मिली लेकिन इसके अलावा भी वे ‘फ्रॉड सैयां’, ‘मस्त में रहने का’, ‘पड़ गए पंगे’ और ‘डेढ़ बीघा ज़मीन’ जैसी फिल्मों में भी काम कर चुके हैं।

सवाल : इंडस्ट्री में एक अलग पहचान बनाने में आपका संघर्ष कैसा रहा ?
- देखो, मेरी मानो तो संघर्ष कुछ नहीं होता, जो भी होता है सब कुछ अनुभव है जो आगे जाकर कभी न कभी इंसान के काम ही आता है। जब आप मेहनत कर रहे होते हैं, तब वक्त आपके लिए बीतता नहीं वक्त आपको कुछ न कुछ सिखा रहा होता है। ये जरूर हो सकता है कि वक्त की सीख तुरंत आपको परेशान करे लेकिन जैसे-जैसे आप खुद को पहचानने लगते हैं, आपको ये समझ आ जाता है कि वक्त की सीखों के जरिए ही आप खुद को पहचान कर जिंदगी में आगे बढ़ रहे हैं। मुझे 22 साल लगे फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में। कई रातें बिना सोए ही बिता दी सिर्फ इस चिंता में कि कल क्या होगा। इस बीच बहुत कुछ किया, सिनेमा से जुड़कर भी और सिनेमा जगत के बाहर भी लेकिन कभी अपना मकसद नहीं भूला, क्योंकि करनी मुझको एक्टिंग ही थी। वक्त बीतता रहा, हम अपना काम करते रहे, फिर एक दिन गैंग्स ऑफ वासेपुर में मौका मिला जहां से पहचान मिलनी शुरु हुई, ऐसा था कि थोड़े बहुत लोग जानने लगे थे कि हां ये कोई है जिसकी अदाकारी अच्छी है। फिर पंचायत में एंट्री हुई अच्छा रोल था तो हमने काम भी किया। लेकिन, ये नहीं सोचा था कि पंचायत हमारे लिए इतनी बड़ी वेब सीरीज साबित होगी कि लोग हमें प्रहलाद चा के नाम से ही पहचानने लगेंगे। आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो समझ आता है कि उस दौर में जब काम नहीं मिलता था, नींद नहीं आती थी। लेकिन, एक्टर बनने की चाहत के चलते मैंने जहां भी हाथ-पैर मारे, जो कुछ भी सीखा वो सब कुछ मेरा संघर्ष नहीं अनुभव है।
सवाल : मुंबई बड़ा महंगा शहर है, शुरुआती दौर में वहां गुजर-बसर करने में परेशानी नहीं आई ?
- जब आप कोई सपना लिए घर से निकलते हैं न तो आपके दिमाग में 2 बाते चल रही होती है। पहली कि मुझे तो सब कुछ आता है तो वहां जाकर खुद को स्थापित कर ही लूंगा। दूसरी की जब मैं कुछ बन जाऊंगा तो घर वाले कितने खुश होंगे, लेकिन जब वही अदमी मुंबई पहुंचता है और खुद को भीड़ में खड़ा पाता है तब उसे समझ में आता है कि जिंदगी का खेल इतना भी आसान नहीं। हर इंसान के लिए एक सीधा नियम है, जो बिना हार माने जितनी मेहनत करेगा उसे जिंदगी उतने ही अच्छे मुकाम पर ले जाकर खड़ा करती है। शुरुआती दौर में मुंबई में मुझे भी बहुत तकलीफें आईं, क्योंकि ऐसा तो था नहीं कि हम कहीं के स्टार थे तो हमें आते ही काम मिल जाएगा। सुना तो था कि मुंबई बहुत महंगा शहर है। लेकिन, जब मुंबई पहुंचे और बिना काम के थोड़ा समय गुजारा तब समझ आया कि मुंबई में जिंदा रहने के लिए भी पैसा देना पड़ता है। फिर मैंने कुछ काम करना शुरू कर दिया फिर सोचा कि एक्टिंग भूल जाता हूं। फिर सोचा मास कॉम कर लेता हूं, उसमें फिल्म मेकिंग भी होती है। इस तरह सीखते-सीखते लाइफ शुरू की और प्रोडक्शन का काम शुरू किया। प्रोमोज में काम किया। 2-3 चैनल्स में काम मिला। इंटरनेशनल शो में भी काम किया। फिल्म बनाई, फिल्म प्रोड्यूस की, यह सब करते-करते एक्टिंग तक पहुंच पाया।

सवाल : सफलता मिलने के बाद जिंदगी बदलती है, जिंदगी पहले ज्यादा अच्छी थी या अब ?
- देखिए बात ऐसी है कि सफलता का सबका अपना-अपना पैमाना होता है, दूर से देखकर किसी को सफल समझ लेना बहुत आसान है। लेकिन, कोई इंसान खुद ही समझ सकता है कि वह सफल है या नहीं। ऐसा नहीं है कि मैं खुश नहीं हूं, मैं बहुत खुश हूं। जो भी मेरे साथ हो रहा है, जो भी मैं कर रहा हूं, जो लोग मेरे साथ हैं, सब कुछ बहुत अच्छा है। बात करें, सफलता की तो मैं खुद को ऐसा समझता ही नहीं कि मैं सफल हो गया हूं। एक्टिंग करनी थी, कर रहे हैं, आगे भी करते रहेंगे। उम्मीद है कि लोगों का प्यार भी ऐसे ही मिलता रहेगा। बात करें जिंदगी बदलने की तो ये सब कुछ खुद के उपर होता है। हम जिन लोगों के साथ पहले मिलते-जुलते थे। आज भी उन्हीं के साथ उठना-बैठना है, हां ये जरूर है कि काम और समय की कमी के कारण उनसे मिलना कम होता है। अगर कुछ बदला है जिंदगी में तो थोड़ी बहुत सुख सुविधा बढ़ गई है। हमें जानने वाले लोग बढ़ गए हैं। पहले हमें कम लोग जानते थे, अब थोड़े ज्यादा लोग जानते हैं तो अब कभी-कभी उनसे भी मिलना-जुलना हो जाता है।
सवाल : आपने एक इंटरव्यू में खुद को काला, मोटा, देहाती एक्टर बताया था, ऐसा क्यों ?
- ऐसा है कि हम बड़े मजाकिया किस्म के इंसान हैं। पहले जब सेट पर काम करते थे तो पूरे टाइम तो शूटिंग होती नहीं थी और न ही लीड रोल में रहते थे कि हर थोड़ी देर में हमें ही सीन रिकॉर्ड करने के लिए बुलाया जाए। तब सेट में अपना सीन रिकॉर्ड करने के बाद अगले सीन की रिकॉर्डिंग के बीच बड़ा समय होता था। इतना समय कि अगले सीन की प्रैक्टिस के बाद भी समय बच जाता था। इंडस्ट्री में नए थे, ज्यादा लोग जानते भी नहीं थे तो क्रू के लोगों से थोड़ी जान पहचान बढ़ाने के लिए मजाकिया अंदाज में बोल दिया करते कि अगर किसी को काला, मोटा, देहाती हीरो चाहिए हो तो मुझे बता देना मैं वो रोल कर लूंगा। हालांकि अपनी इस बात के लिए मैं ये भी कहूंगा कि वह सिर्फ एक मजाक था।
सवाल : थिएटर और फिल्मों की अदाकारी में आप ज्यादा मुश्किल किसे मानते हैं ?
- हम कभी थिएटर का हिस्सा नहीं रहे। थिएटर की एक्टिंग बहुत अलग और सामान्य एक्टिंग से कही ज्यादा कठिन है। एक सामान्य एक्टर जिसे एक्टिंग का थोड़ा बहुत अनुभव है। उसे थिएटर में एक्टिंग, करना तो दूर समझने में ही महीनों बिताने पड़ेंगे।
सवाल : स्कूल में आप टीचर्स की एक्टिंग करते थे, आपको कब लगा कि अब प्रोफेशनल एक्टिंग की ओर आगे बढ़ना चाहिए ?
- हमारी मानें तो एक्टिंग की शुरुआत स्कूल से होनी चाहिए, बच्चों के कोर्स में एक्टिंग को भी शामिल किया जाना चाहिए। वैसे हमारी परवरिश और पढ़ाई-लिखाई प्रयागराज में हुई है। बचपन से ही हमें एक्टिंग का शौक रहा है, हम स्कूल में भी एक्टिंग करते थे। टीचर्स डे पर अपने टीचर्स की एक्टिंग करना मुझे बहुत पसंद था। फिर एक वक्त आया जब मैंने अपने घर पर अपने एक्टिंग के शौक के बारे में बताया। घर वाले मुझे मुंबई भेजने में डर रहे थे क्योंकि परिवार के लिए ये एक्टिंग का कीड़ा ही कुछ नया था लेकिन उस समय मेरे बड़े भाई ने मेरा साथ दिया। वो अब दिल्ली में रहते हैं, उस वक्त वो मुंबई में नौकरी कर रहे थे। मेरे भाई और भाई के दोस्तों को लगता था कि ये कुछ कर लेगा। वही 3-4 लोग मुझे ट्रेन से मुंबई तक छोड़ने आए। एक्टिंग स्कूल में एडमिशन कराया, लेकिन मैं 3-4 महीने में ही फ्लॉप हो गया। मुंबई शहर इतना महंगा है कि वो आपको ठीक कर देता है। यहां आपको मेहनत करनी पड़ती है।
सवाल : युवाओं में इन दिनों रील कल्चर काफी हावी है, एक प्रोफेशनल एक्टर के नजरिेए से आप इसे कैसे देखते हैं ?
- आज हम देख रहे है कि बच्चों से लेकर बूढ़ों को रील्स के जरिए मौका मिला तो उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए अपनी एक अलग पहचान बना ली है, जैसे पहले नेता, अभिनेता, डॉक्टर, इंजीनियर होते थे, पिछले कुछ सालों में सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसर्स पैदा हुए हैं। जो रील्स बनाकर अपने शौक भी पूरे कर रहे हैं और पैसा भी कमा रहे हैं। रील्स से एक्टिंग को बढ़ावा मिला रहा। ऐसे ही ओटीटी प्लैटफॉर्मस के आ जाने से कई अच्छे एक्टर्स को मौका मिला रहा है। इसलिए हमनें पहले ही कह दिया कि बच्चों को स्कूल से ही एक्टिंग सिखाना चाहिए ताकी वे यूज टू हो जाएं। रही बात युवाओं में बढ़ रहे रील कल्चर की तो जहां देर है, वहां अंधेर भी है। चुनना आपको है कि आप देर में रहना चाहते हैं या अंधेर में। एक्टिंग के नजरिए से देखू तो रील्स एक अच्छा जरिया है, सीखने का, खुद को निखारने का। लेकिन जो लोग पॉपुलर होने के लिए खतरनाक स्टंट कर रहे हैं, पहाड़ों की खाई में लटक रहे हैं उससे मैं सहमत नहीं हूं, न कभी रहूंगा।



