टीआरपी डेस्क। देश में महंगाई लगातार बढ़ रही है, लेकिन क्या लोगों की सैलरी भी उसी रफ्तार से बढ़ी है? एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार बीते सात सालों में भारतीयों की औसत सैलरी सिर्फ ₹4,565 बढ़ी यानी 2017 में सैलरी ₹16,538 थी जो 2024 में बढ़कर ₹21,103 हुई।

सुनने में बढ़ोतरी लगती है, लेकिन जब इसे बढ़ती महंगाई, किराए, शिक्षा और हेल्थकेयर के खर्च से जोड़कर देखा जाए तो सच्चाई सामने आती है आमदनी बढ़ी जरूर, लेकिन जेब खाली की खाली रही।

अगर सैलरी बढ़ी, तो जेब क्यों नहीं भरी?

रिपोर्ट के मुताबिक सात साल में औसतन 27.6% की बढ़ोतरी हुई है, लेकिन इसी अवधि में महंगाई दर और जीवन-यापन की लागत उससे कहीं ज्यादा बढ़ गई।
आज के समय में किराया, स्कूल फीस, मेडिकल खर्च और रोजमर्रा की जरूरतें इस कदर महंगी हो चुकी हैं कि सैलरी की यह बढ़ोतरी नाममात्र रह गई है।

दिहाड़ी मजदूरों की औसत आमदनी 2017 के ₹294 से बढ़कर अब ₹433 हुई है करीब 47% की बढ़ोतरी। लेकिन जब इसे सात साल की लगातार महंगाई से तौला जाए, तो असल फायदा बहुत कम नजर आता है।

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बेरोजगारी घटी, पर सैलरी वहीं की वहीं!

रिपोर्ट में बेरोजगारी दर में सुधार दिखता है 2017-18 में 6% से घटकर अब 3.2% रह गई। युवाओं की बेरोजगारी भी 17.8% से घटकर 10.2% पर आ गई है। अगस्त 2025 तक पुरुषों की बेरोजगारी दर 5% तक गिर गई, जो चार महीने में सबसे कम है। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2024-25 में अब तक 1.29 करोड़ नए सदस्य जुड़े हैं। सिर्फ जुलाई 2025 में ही 21.04 लाख नए लोग EPFO में शामिल हुए, जिनमें 60% युवा हैं। यानी नौकरियां मिल रही हैं, पर ये नौकरियां आर्थिक सुरक्षा नहीं दे पा रही हैं।

लोग अब नौकरी नहीं, खुद का काम चुन रहे हैं

रिपोर्ट के मुताबिक स्वरोजगार करने वालों की हिस्सेदारी 2017 के 52.2% से बढ़कर अब 58.4% हो गई है। इसका मतलब है कि बहुत से लोग स्थिर नौकरी न मिलने के कारण खुद का व्यवसाय, फ्रीलांसिंग या छोटा स्टार्टअप शुरू करने की ओर बढ़ रहे हैं।

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रोजगार बढ़ने के बावजूद, वेतन और क्रय शक्ति (Purchasing Power) के बीच की दूरी बढ़ती जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर निजी क्षेत्र और सरकार ने सैलरी स्ट्रक्चर को महंगाई के अनुरूप नहीं बदला, तो कमाई और खर्च के बीच की खाई इतनी गहरी हो जाएगी कि मध्यमवर्ग उसका भार नहीं झेल पाएगा।