टीआरपी। Coal transport tender stuck in CSPDCL for two months : कोयला ट्रांसपोर्टिंग के लिए भरे गए टेंडर को लेकर इन दिनों ट्रांसपोर्टरों की चिंता बढ़ गई है। लगभग दो महीने पूर्व ट्रांसपोर्टरों ने टेंडर भरा था। टेंडर की प्रक्रिया अब तक हो जानी चाहिए थी। लेकिन, टेंडर नहीं खुलने से ट्रांसपोर्टर पेशोपेश में हैं। टेंडर में देरी से छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत कंपनी लिमिटेड की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा हो रहा है।
सीएसईबी के कोल प्लांटों तक अडानी की खदानों से जो कोयला ट्रांसपोर्ट किया जाता है, उसका ट्रांसपोर्टिंग खर्चा सीएसईबी वहन करता है। ट्रांसपोर्ट के लिए दूसरे प्लांटों द्वारा दिए जा रहे प्रचलित दर से अधिक दर सीएसईबी दे रही थी, इस पर सवाल उठ रहा था। सरकार और विभाग को अध्ययन करके यह बताया गया था कि पिछले साल 100-150 करोड़ रुपए ट्रांसपोर्टिंग का अतिरिक्त दिया गया था। अन्य पांवर प्लांट बहुत कम दरों पर ट्रांसपोर्ट सेवा कर ले रहे हैं। वहीं सीएसईबी अधिक दर दे रही है। जब, विस्तृत अध्ययन करके सरकार और विभाग को बताया गया कि सरकार को कितना नुकसान हो रहा है, तब विभाग द्वारा नया टेंडर निकाला गया। इस प्रक्रिया में काफी प्रतिस्पर्धाएं हुई। अनेक लोगों ने टेंडर भरा और खुलकर अपनी दरें भरीं।

पैसा बचाने में सरकार की रुचि नहीं
उम्मीद थी कि दर नीचे आएंगे और उसी पर काम हो रहा था, लेकिन पिछले दो महीने से टेंडर को खोला नहीं गया है। जबकि, यह मात्र चार दिनों का काम था। अध्ययन करने वालों का भी यही उद्देश्य था कि विभाग को कम दर मिले। सरकार का पैसा बचाने के लिए ये सब किया गया था, लेकिन सरकार अपना पैसा बचाने में खुद ही रुचि नहीं ले रही है। यही कारण है कि इस टेंडर को दबाकर रखने का प्रयास किया गया।
करोड़ों रुपए बचते तो नहीं बढ़ती बिजली दर
जानकारों का कहना है कि सरकार आखिर चाहती क्या है, यह समझ से बाहर है। सीएसईबी 500 -700 करोड़ रुपए ट्रांसपोर्टिंग का भुगतान करती है। अध्ययन करने वालों ने सरकार को बताया कि ट्रांसपोर्टिंग का करोड़़ों रुपए बचाया जा सकता है। इन रुपयों का अन्य जनहित की योजनाओं में लाभ लिया जा सकता है। यदि करोड़ों रुपए बचाए जाते तो सरकार को चुनाव में फायदा हो सकता था। बिजली दर बढ़़ाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। बिजली दर जो बढ़ी हुई है, इसका बड़ा कारण यह है कि बड़े बड़े संस्थानों से विभाग पैसा वसूल नहीं कर पा रहा है। कम से कम अपना पैसा ही बचा लिया जाए तो शायद बिजली की दरें कम बढ़े। सरकार को और आम जनता को ज्यादा फायदा हो। यह नौबत ही न आए कि सरकार को बिजली की दर बढ़ानी पड़े। लोगों का कहना है कि सरकार की यदि मदद भी करना चाहें तो सरकार को यह स्वीकार नहीं होता।

सरकार की मंशा पर प्रश्नचिन्ह
बताया जा रहा है कि ट्रांसपोर्टिंग के लिए निकाले गए टेंडर को जिस समिति द्वारा स्वीकृति दी जाएगी। उस समिति में उद्योगपति अडानी के दो सदस्य रहेंगे। वे सदस्य तय करेंगे कि यह ट्रांसपोर्ट का टेंडर किसके पास जाए। अजीब स्थिति बन रही है कि पैसा सरकार का है, कोयला सरकार का है, खदान सरकार की है और उद्योगपति अडानी के लोग यह निर्णय ले रहे हैं कि यह टेंडर किसको जाएगा। पिछली बार भी यही हुआ था कि गुजरात की एक पार्टी को यह टेंडर दिया गया था। इससे सरकार की मंशा पर प्रश्नचिन्ह लगता है। कम से कम सरकार को यह क्लियर करना चाहिए। जो लोग ईमानदारी से अध्ययन करके सरकार को बता रहे हैं कि सरकार का करोड़ों रुपए बच जाए। जो लोग शासन का हित चाहते हैं, ऐसे लोगों की ईमानदारी से की गई मंशा का सरकार को ध्यान रखना चाहिए। सरकार को चाहिए कि ऐसे लोगों को बताएं कि सरकार सुशासन का और सुझावों का सम्मान करती है।

ये है ट्रांसपोर्टिग प्रक्रिया
गौरतलब है कि कोयला खदानों से कोयला निकालकर उस कोयले को बिजली प्लांट तक रेलवे वैगन, ट्रक अथवा अन्य मालवाहक वाहनों से पहुंचाया जाता है। खदान से प्लांट तक कोयला पहुंचाने का खर्च बिजली कंपनी ही उठाती है। इसके लिए ट्रांसपोर्टिंग कंपनी को ठेका दिया जाता है। हालांकि, इसका भार बिजली उपभोक्ताओं पर ही पड़ता है। क्योंकि, ट्रांसपोर्टिंग का खर्च उपभोक्ताओं की बिजली लागत में शामिल होता है। उसे बिजली बिल के साथ वसूल किया जाता है।
वर्जन
जल्द खोला जाएगा टेंडर
छत्तीसगढ़ स्टेट पॉवर जनरेशन कंपनी लिमिटेड, सिविल परियोजना के मुख्य अभियंता देवेंद्र नाथ का कहना है कि कोयला ट्रांसपोर्टिंग के लिए टेंडर आमंत्रित किया गया था। टेंडर संबंधित प्रक्रिया के लिए बैठक हो चुकी है और जल्द ही टेंडर खोलकर उपयुक्त ट्रांसपोर्टिग कंपनी को जिम्मेदारी दी जाएगी।
विभाग यह सुनिश्चित करना चाहता है कि कोयला खदान से निकाला गया कोयला सही ढंग से प्लांट तक पहुंचे। कहीं, यह न हो कि खदान से कोयला अच्छी क्वालिटी का निकले और प्लांट तक किसी और क्वालिटी का कोयला पहुंचे। कोयले की सप्लाई में धांधली न हो, इसलिए संबंधित कोयला खनन कंपनी के दो सदस्य भी टेंडर पारित करने की प्रक्रिया में शामिल होते हैं।


