टीआरपी डेस्क। लोक आस्था के महापर्व छठ की आज से विधिवत शुरुआत हो चुकी है। चार दिनों तक चलने वाला यह पर्व सूर्य उपासना का प्रतीक है, जिसमें छठी माता का व्रत रखा जाता है और पूजन सूर्यदेव का किया जाता है। वैदिक काल से ही सूर्य को जीवन और ऊर्जा के स्रोत के रूप में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। उन्हें आदित्यों में सबसे बड़ा और देवताओं का प्रथम स्वरूप माना गया है।

ऋग्वेद में सूर्य की उपासना का उल्लेख ‘हिरण्यगर्भ सूत्र’ के रूप में मिलता है, जिसमें सूर्य को ब्रह्मांड की उत्पत्ति का केंद्र बताया गया है। ऋग्वेद (मंडल 10, सूक्त 121) के अनुसार, “हिरण्यगर्भ: समवर्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेक आसीत्” अर्थात्, ब्रह्मांड की उत्पत्ति एक सुनहरे गर्भ से हुई, जिसे हिरण्यगर्भ कहा गया। यही वह बिंदु था, जिससे जीवन और सृष्टि की शुरुआत मानी गई।

हिरण्यगर्भ शब्द का अर्थ है “स्वर्ण अंडा” वह पिंड, जिसके भीतर से ब्रह्मांडीय विस्फोट (आज की वैज्ञानिक भाषा में ‘बिग बैंग’) के समान घटना हुई और धरती, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य तथा चंद्रमा जैसे तत्वों का जन्म हुआ।

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वेदों और पुराणों में सूर्य को जीवन धारक बताया गया है। उनके तेज, प्रकाश और ऊष्मा से समस्त सृष्टि संचालित होती है। इसी कारण उन्हें ‘हिरण्यगर्भ’ कहा गया। ‘हिरण्य’ अर्थात् सुनहरा और ‘गर्भ’ अर्थात् स्रोत।

विष्णु पुराण में सूर्य के जन्म की व्याख्या एक प्रतीकात्मक कथा के माध्यम से की गई है। इसमें बताया गया है कि विराट पुरुष की इच्छा से क्षीर सागर उत्पन्न हुआ, जहां पीपल के पत्ते पर शिशुरूप में भगवान विष्णु प्रकट हुए। उनके नेत्रों से प्रकट हुआ प्रकाश सूर्य कहलाया, मन से चंद्रमा और श्वास से वायु का उद्भव हुआ। इसीलिए सूर्य को नारायण का नेत्र कहा गया और वे ‘सूर्य नारायण’ नाम से पूजित हुए।

यजुर्वेद में भी इसी सिद्धांत का वर्णन मिलता है। “चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत”  अर्थात्, चंद्रमा मन से और सूर्य नेत्रों से उत्पन्न हुए। इसीलिए सूर्य की उपासना को विष्णु की आराधना माना गया है।

ब्रह्म पुराण के अनुसार, सूर्य देवता मन, वाणी या कर्म से किए गए समस्त पापों का नाश करने की शक्ति रखते हैं। इसीलिए छठ पर्व पर सूर्य उपासना का विशेष महत्व है। यह न केवल वैदिक परंपरा की निरंतरता है, बल्कि सूर्य को सृष्टि के रक्षक और जीवनदाता के रूप में स्वीकार करने की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति भी है।

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पुराणों में सूर्य को अदिति के पुत्र के रूप में ‘आदित्य’ कहा गया है। अदिति के बारह पुत्रों में सूर्य को सबसे बड़ा माना गया है। देवताओं में इंद्र को राजा कहा गया है, परंतु सूर्य अपनी तपस्या, ऊर्जा और त्याग के कारण ‘देवश्रेष्ठ’ की उपाधि प्राप्त करते हैं। इस प्रकार छठ महापर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के उस वैदिक दर्शन की जीवंत परंपरा है, जिसमें सूर्य को सृष्टि, ऊर्जा और जीवन का मूल माना गया है।