टीआरपी डेस्क। फैटी लिवर बीमारी आज तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य समस्या बनती जा रही है, जिसकी चपेट में अब बच्चे और किशोर भी आने लगे हैं। शोध में सामने आया है कि कई जेनेटिक म्यूटेशन के कारण यह बीमारी तेजी से गंभीर रूप ले रही है। हालांकि टीनएजर्स में फैटी लिवर के मामले अभी भी कम हैं, लेकिन इसके बावजूद ऐसे प्रकरण सामने आने लगे हैं, जो चिंता बढ़ाने वाले हैं।

फैटी लिवर अब क्रॉनिक लिवर डिजीज का सबसे आम कारण बन चुका है। यह मोटापे से ग्रस्त लगभग 10 से 17 प्रतिशत किशोरों को प्रभावित करता है। हालांकि 18 वर्ष से कम उम्र में लिवर ट्रांसप्लांट की आवश्यकता बहुत ही दुर्लभ मानी जाती है, लेकिन गुजरात के सूरत के एक 14 वर्षीय किशोर के मामले ने इस खतरे की गंभीरता को उजागर कर दिया है।

यह किशोर फैटी लिवर डिजीज के एडवांस्ड स्टेज में एक्यूट लिवर फेलियर के साथ मुंबई के सर एच. एन. रिलायंस फाउंडेशन हॉस्पिटल पहुंचा था। हालत गंभीर होने पर उसका लिवर ट्रांसप्लांट किया गया। फिलहाल वह घर पर स्वस्थ हो रहा है और उसके सभी मेडिकल पैरामीटर सामान्य बताए जा रहे हैं। एक महीने पहले हुए ट्रांसप्लांट में उसके पिता ने डोनर के रूप में आगे आकर अपना दाहिना लोब दिया।

See also  Aadhar card अपडेट कराना है जरूरी, जल्दी करें ये काम, नहीं तो लगने लगेगी फीस

डॉक्टर्स के मुताबिक, बच्चे को पीलिया, पेट में अत्यधिक पानी भरना और शरीर में फ्लूइड रिटेंशन जैसी गंभीर समस्याएं थीं, जिससे उसका वजन अचानक 15 से 20 किलोग्राम तक बढ़ गया था। सर्जरी के बाद सूजन में धीरे-धीरे कमी आई।

इस बीमारी के पीछे एक जेनेटिक म्यूटेशन था, जो लिवर में फैट जमा होने की प्रक्रिया को तेज करता है। हालांकि सिर्फ जेनेटिक्स ही जिम्मेदार नहीं थे। खराब खानपान, मोटापा और इंसुलिन रेजिस्टेंस जैसे पर्यावरणीय कारणों ने स्थिति को और बिगाड़ दिया। अधिक जेनेटिक जोखिम वाले व्यक्ति यदि स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं तो गंभीर बीमारी से बचा जा सकता है, लेकिन इस किशोर की तरह कई टीनएजर्स अत्यधिक प्रोसेस्ड और जंक फूड का सेवन करते हैं, जिससे नुकसान तेजी से बढ़ता है।

डॉक्टर्स के अनुसार लिवर फेल होने की स्थिति में लिवर शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालने, प्रोटीन बनाने और ग्लूकोज को स्टोर करने जैसे जरूरी कार्य नहीं कर पाता। बच्चे को अत्यधिक पीलिया और पैरों व पेट में सूजन थी, जिससे सांस लेने और भोजन करने में भी दिक्कत हो रही थी। कई जांचों में अनेक जेनेटिक म्यूटेशन सामने आए, जिसके चलते लिवर ट्रांसप्लांट ही एकमात्र विकल्प बचा।

See also  करूर भगदड़ मामला : हादसे में मारे गए लोगों के परिवार से मुलाकात करेंगे विजय, CBI ने फिर दर्ज की FIR

सर्जरी के समय फ्लूइड ओवरलोड के कारण बच्चे का वजन करीब 84 किलोग्राम था, जो अब घटकर 60 किलोग्राम के आसपास आ गया है। पहले उसका बिलीरुबिन स्तर 10 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर से अधिक था, जो अब सामान्य हो चुका है। चूंकि यह समस्या जेनेटिक थी, इसलिए डॉक्टरों ने रिश्तेदारों को भी जेनेटिक जांच कराने की सलाह दी है।

जेनेटिक परीक्षण में PNPLA3 और GCKR जीन में हाई रिस्क वेरिएंट पाए गए, जो फैटी लिवर डिजीज के खतरे को बढ़ाते हैं और भारतीय आबादी में अपेक्षाकृत सामान्य माने जाते हैं। हॉस्पिटल की चीफ पीडियाट्रिक हेपेटोलॉजिस्ट डॉ. आरती पावरिया के अनुसार, इस मामले में केवल जेनेटिक्स ही नहीं, बल्कि अनहेल्दी डाइट, अधिक कैलोरी का सेवन और कम शारीरिक गतिविधि ने भी बीमारी को गंभीर बना दिया।

डॉक्टर्स का कहना है कि बच्चों और किशोरों में प्रोसेस्ड फूड, पैकेज्ड स्नैक्स, चिप्स, बर्गर, कुकीज, नूडल्स और सोडा के बढ़ते सेवन पर नियंत्रण बेहद जरूरी है। इसके लिए स्कूलों, अभिभावकों और नीति निर्माताओं को मिलकर प्रयास करने की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में ऐसे गंभीर मामलों को रोका जा सके।

See also  अटकलें शुरू… गुलाम नबी भाजपा में जाएंगे या बनाएंगे नई क्षेत्रीय पार्टी ?